सुप्रीम कोर्ट ने गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है, जिसमें राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर सीमा निर्धारित करने की मांग की गई है. याचिका में बताया गया है कि चुनावी दौर में राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित धनबल का इस्तेमाल लोकतंत्र की प्रक्रिया को प्रभावित करता है और चुनावी प्रतिस्पर्धा को असंतुलित बना देता है.
अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत में यह तर्क पेश किया कि चुनाव प्रचार में बेलगाम खर्च लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करता है और मतदाताओं के सूचना के अधिकार को प्रभावित करता है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के इलेक्टोरल बॉन्ड मामले का हवाला देते हुए कहा कि अनियंत्रित धनबल से लोकतांत्रिक व्यवस्था विकृत होती है.
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉय माल्या बागची ने कहा कि चुनावी खर्च पर नियंत्रण करना व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी खर्च की सीमा होती है, लेकिन तीसरे पक्ष या उम्मीदवारों के सहयोगियों द्वारा अप्रत्यक्ष खर्च की समस्या उत्पन्न होती रहती है.
यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट में Hamdard की बड़ी जीत... Rooh Afza को माना फ्रूट ड्रिंक, 12.5% की जगह देना होगा 4% VAT
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में छह हफ्तों के भीतर केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है, ताकि चुनावी खर्च को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी नियम बनाए जा सकें.
इसी प्रकार, कोर्ट ने झूठी गवाही देने पर सख्त सजा के प्रावधान के लिए अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की दायर दूसरी जनहित याचिका पर भी केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. इसमें अदालत से साफ कानूनी प्रावधान लाने की मांग की गई है, जिससे न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता और सच्चाई सुनिश्चित की जा सके.