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मणिपुर हिंसा का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, 8 मई को मेंशन हो सकती है याचिका

मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किए जाने को लेकर याचिका पर मणिपुर हाईकोर्ट ने सरकार से चार हफ्ते में फैसला लेने के लिए कहा था. इसके बाद सूबे में हिंसा भड़क उठी थी. अब हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

मणिपुर में मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने और आरक्षण को लेकर मणिपुर हाईकोर्ट के फैसले के बाद पूर्वोत्तर के इस राज्य में हिंसा भड़क उठी थी. मणिपुर में भड़की हिंसा में 54 लोगों की मौत हो गई थी. अब ये मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है. मणिपुर में मैतेई समुदाय को जनजाति के दर्जे और आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट के फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.

मैतेई समुदाय के अनुसूचित जनजाति के दर्जे को लेकर मणिपुर हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. मणिपुर की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता और मणिपुर पर्वत क्षेत्रीय परिषद के अध्यक्ष डिंगांगलुंग गंगमेई ने ये याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की है. याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट ने इस समस्या की असली जड़ को नहीं समझा.

याचिकाकर्ता ने ये भी कहा है कि यह पूरी तरह से राजनीतिक और सरकार से जुड़ा नीतिगत मुद्दा था. इसमें कोर्ट की कोई भूमिका थी ही नहीं. उन्होंने ये भी कहा है कि सरकार के आदेश से किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की केंद्रीय सूची में शामिल करवाए जाने की संविधान सम्मत प्रक्रिया में कोर्ट का कोई जिक्र नहीं है.

याचिकाकर्ता ने कहा है कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में बुनियादी गलती की है. कई अन्य भूलें भी हाईकोर्ट के आदेश में हैं जो संवैधानिक प्रक्रिया के पूरी तरह उलट हैं. याचिका में दलील दी गई है कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तीन गलतियां की हैं.

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  1. पहली गलती राज्य को यह निर्देश देना है कि वह मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश करे.
  2. दूसरी गलती यह निष्कर्ष निकालना है कि मैतेइयों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने का मुद्दा लगभग 10 साल से लंबित है.
  3. तीसरी गलती यह निष्कर्ष निकालना है कि मैतेई समुदाय जनजाति है.

याचिकाकर्ता के मुताबिक मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार के पास राज्य सरकार की कोई भी सिफारिश लंबित नहीं है. याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में मामले की जल्द सुनवाई करने की अपील की है. माना जा रहा है कि डिंगांगुलुंग गंगमेई की ओर से दाखिल ये याचिका अर्जेंसी के आधार पर सोमवार को सुनवाई के लिए मेंशन की जा सकती है. 

मणिपुर में कैसे भड़की हिंसा

दरअसल, मैतेई समुदाय की ओर से अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर मणिपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी. मैतेई समुदाय की ओर से दायर याचिका में दलील दी गई थी कि मणिपुर के साल 1949 में भारत का हिस्सा बनने तक समुदाय अनुसूचित जनजाति के तहत आता था लेकिन उसे बाद में इस लिस्ट से बाहर कर दिया गया.

मणिपुर हाईकोर्ट में याचिका पर सुनवाई के दौरान शेड्यूल ट्राइब डिमांड कमेटी मणिपुर ने केंद्र सरकार के साल 2013 में समुदाय से जुड़ी सामाजिक और आर्थिक सर्वे के साथ ही एथनोग्राफिक रिपोर्ट्स भी राज्य सरकार से मांगने का दावा किया और कहा कि सूबे की सरकार ने इस पर कोई कदम नहीं उठाया. मणिपुर हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार को चार हफ्ते के भीतर मैतेई समुदाय की मांग पर विचार करने के लिए कहा था.

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हाईकोर्ट के इसी आदेश के बाद बवाल शुरू हुआ. हाईकोर्ट के आदेश के बाद ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर (एटीएसयूएम) ने 3 मई को आदिवासी एकता मार्च का आह्वान किया. चुरचांदपुर के तोरबंग इलाके में निकले इस मार्च के दौरान ही आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच हिंसक झड़प हुई और इसके बाद ये आग पूरे सूबे में फैल गई. हालात बद से बदतर होते चले गए और कई जिलों में कर्फ्यू लगाने के साथ ही इंटरनेट, ब्रॉडबैंड बैन करना पड़ा.

 

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