
डूरंड लाइन एक बार फिर चर्चा में है. वजह है पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तेज होती झड़पें. हालात इतने तनावपूर्ण हो चुके हैं कि पाकिस्तान की हालिया एयरस्ट्राइक के बाद शुक्रवार तड़के अफगान तालिबान ने बड़ा जवाब दिया. अफगान तालिबान ने दावा किया कि डूरंड लाइन के आसपास स्थित पाकिस्तान सेना के दो बेस और 19 पोस्ट पर उन्होंने कब्जा कर लिया है. यह दावा मौजूदा संघर्ष को और गंभीर बना देता है, क्योंकि यह इलाका पहले से ही लगातार तनाव का केंद्र रहा है.
अब खबर यह है कि डूरंड लाइन की ओर दोनों देशों की तरफ से भारी सैन्य तैनाती की जा रही है. बताया जा रहा है कि तालिबान फोर्सेज बख्तरबंद वाहनों, मशीन गन और भारी हथियारों के साथ सीमा की ओर बढ़ रही हैं. तालिबान की रणनीति हमेशा से गुरिल्ला तकनीक पर आधारित रही है और अक्टूबर 2025 की हिंसा में भी यही देखा गया था, जब उनकी मजबूत स्थिति ने पाकिस्तान के कई ठिकानों को चुनौती दी थी.
इस बीच अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी स्थिति पर नज़र बनाए हुए है. पाकिस्तान ने काबुल सहित अफगानिस्तान के कई बड़े शहरों में हवाई हमले किए और इसे “ओपन वॉर” की स्थिति बताते हुए कहा कि उनका धैर्य अब समाप्त हो चुका है. पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने साफ कहा कि यह अब खुला युद्ध है. उधर अफगान तालिबान ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पाकिस्तान की पहले की घातक एयरस्ट्राइक के जवाब में उन्होंने सीमा चौकियों को निशाना बनाया. रिपोर्टों का दावा है कि डूरंड लाइन पर बमबारी जारी है और दोनों देशों की सेना आमने-सामने है. ऐसे में समझते हैं क्या है डूरंड लाइन और क्या है इसका विवादित इतिहास.
दुनिया की सबसे विवादित सीमा
हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब डूरंड लाइन पर तनातनी हुई हो. इतिहास बताता है कि दोनों देशों के बीच सबसे लंबा और जटिल विवाद इसी रेखा को लेकर है. 2,640 किलोमीटर लंबी यह सीमा पश्तून और बलूच जनजातीय इलाकों को दो हिस्सों में बांटते हुए गुजरती है और 1893 में ब्रिटिश इंडिया व अफगानिस्तान के बीच बने समझौते का परिणाम है. इस रेखा ने स्थानीय समुदायों को विभाजित कर दिया और यही वजह है कि इसे दुनिया की सबसे विवादित सीमाओं में गिना जाता है. पश्तून समुदाय का आरोप है कि इस रेखा ने उनके घर, परिवार और कबीले को अलग-अलग देशों में बांटकर रख दिया.
तालिबान के सत्ता में आने के बाद से यह विवाद और गहरा हुआ है. तालिबान डूरंड लाइन को अफगान संप्रभुता का उल्लंघन मानता है, जबकि पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा का दर्जा देता है. यह विरोधाभास ही सीमा विवाद को लगातार हिंसक बनाता है.
क्यों कहते हैं इसे नफरत की रेखा
दरअसल, यह रेखा ब्रिटिश शासन के समय ‘ग्रेट गेम’ की उपज थी, जब ब्रिटिश और रूसी साम्राज्य के बीच संघर्ष चल रहा था और अफगानिस्तान को बफर ज़ोन की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था. 12 नवंबर 1893 को ब्रिटिश अधिकारी सर हेनरी मॉर्टिमर डूरंड और अमीर अब्दुर रहमान के बीच हुए समझौते में इसे तय किया गया. कहा जाता है कि डूरंड ने बातचीत के दौरान अफगानिस्तान के नक्शे पर ही खड़ी रेखा खींचकर इस सीमा को निर्धारित कर दिया. इस रेखा ने पश्तून और बलूच क्षेत्रों को दो हिस्सों में बांट दिया, परिवारों, गांवों और कबीलों को अलग कर दिया. यही कारण है कि इसे “नफरत की रेखा” भी कहा जाता है.

तालिबान के आने के बाद और बढ़ा विवाद
1947 में पाकिस्तान बनने के बाद यह विवाद नए रूप में उभर आया. अफगानिस्तान ने इस रेखा को मानने से इनकार कर दिया और पाकिस्तान के संयुक्त राष्ट्र में प्रवेश पर भी विरोध जताया. पश्तूनिस्तान की मांग और खान अब्दुल गफ्फार खान की भारत के प्रति नजदीकी ने दोनों देशों के बीच अविश्वास और बढ़ा दिया. पाकिस्तान ने पश्तून पहचान को इस्लामी पहचान में बदलने के इरादे से तालिबान को मजबूत किया, लेकिन जब तालिबान सत्ता में आया, उसने भी डूरंड लाइन को अस्वीकार कर दिया. उनकी विचारधारा ने सीमावर्ती इलाकों में चरमपंथ को बढ़ाया और तहरीक-ए-तालिबान जैसे संगठनों को मज़बूती दी, जिनके हमलों ने 2007 के बाद पाकिस्तान को बुरी तरह झकझोरा.
आज जब डूरंड लाइन पर फिर विस्फोट, कब्जे के दावे और सैन्य तैनाती की खबरें आ रही हैं, यह साफ है कि यह सीमा सिर्फ एक रेखा नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति, जनजातीय पहचान और अविश्वास का वह घाव है जो हर संघर्ष के साथ फिर से खुल जाता है.