24 अप्रैल, 1980 को तेहरान में बंधक बनाए गए 52 अमेरिकी नागरिकों को बचाने के लिए चलाया गया ऑपरेशन के दौरान हेलिकॉप्टर नीचे गिर गया था और आठ अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई थी. इसके बाद अमेरिका ने तेहरान में फंसे अपने नागरिकों को छुड़ाने के लिए कोई मिलिट्री ऑपरेशन नहीं किया. बंधकों को अगले 270 दिनों तक रिहा नहीं किया गया था.
ईरान बंधक संकट छह महीने से चल रहा था और ईरानी सरकार से सभी राजनयिक अपीलें विफल हो चुकी थीं. ऐसे में राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने बंधकों को बचाने के अंतिम प्रयास के रूप में मिलिट्री ऑपरेशन का आदेश दिया. अभियान के दौरान आठ में से तीन हेलीकॉप्टर खराब हो गए, जिससे महत्वपूर्ण हवाई प्लानिंग बाधित हो गईं.

ईरान में निर्धारित सैन्य शिविर स्थल पर अभियान रद्द कर दिया गया, लेकिन वापसी के दौरान एक हेलीकॉप्टर छह सी-130 परिवहन विमानों में से एक से टकरा गया, जिसमें आठ सैनिक मारे गए और पांच घायल हो गए. अगले दिन, गंभीर मुद्रा में जिमी कार्टर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें उन्होंने इस त्रासदी की पूरी जिम्मेदारी ली. बंधकों को अगले 270 दिनों तक रिहा नहीं किया गया.
4 नवंबर 1979 को संकट तब शुरू हुआ जब अमेरिकी सरकार ने अपदस्थ शाह को इलाज के लिए अमेरिका आने की अनुमति दी. इससे नाराज उग्रवादी ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया. ईरान के राजनीतिक और धार्मिक नेता अयातुल्ला खुमैनी ने बंधक संकट को अपने हाथ में ले लिया. उन्होंने अमेरिकी दूतावास के गैर-अमेरिकी बंधकों, महिला और अल्पसंख्यक अमेरिकियों को रिहा कर दिया. शेष 52 बंधक अगले 14 महीनों तक खुमैनी की दया पर रहे.

राष्ट्रपति कार्टर कूटनीतिक रूप से संकट का समाधान करने में असमर्थ रहे और अप्रैल 1980 में बंधक बनाने का प्रयास एक बड़ी विफलता में परिणत हुआ. तीन महीने बाद, मिस्र में पूर्व शाह की कैंसर से मृत्यु हो गई, लेकिन संकट जारी रहा. अल्जीरियाई मध्यस्थों की सहायता से, संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच सफल वार्ता शुरू हुई. रीगन के शपथ ग्रहण समारोह के दिन, 20 जनवरी 1981 को, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान की लगभग 8 अरब डॉलर की जब्त संपत्ति छोड़ दी और 52 बंधकों को 444 दिनों के बाद रिहा कर दिया गया.