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समुद्र में किसका राज... किस देश की कहां तक सीमा? आखिर ये तय कैसे होता है

दुनिया भर के देशों के बीच समुद्र को UNCLOS के तहत अलग-अलग जोन में बांटा गया है और हर जोन में तटीय देशों के अधिकार अलग-अलग होते हैं. ऐसे में समझते हैं कि समुद्र में देशों के बीच सरहदें कैसे तय की गई हैं.

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देशों के बीच समुद्र का भी हुआ है बंटवारा (Photo - Pexels)
देशों के बीच समुद्र का भी हुआ है बंटवारा (Photo - Pexels)

दुनिया के महासागर किसी एक देश के नहीं हैं. उनका इस्तेमाल और कंट्रोल इंटरनेशनल लॉ के मुताबिक होता है. इसके लिए संयुक्त राष्ट्र यूनाइटेड कन्वेंशन ऑन लॉ ऑफ सी (UNCLOS) संधि के तहत समुद्री जलक्षेत्रों का बंटवारा करती है. साथ ही उनसे जुड़े विवादों को निपटाने के उपाय भी इसी संधि में दिए गए हैं. ऐसे में समझते हैं कि अलग-अलद देशों के बीच समुद्री जल कैसे बंटा हुआ है. 

दुनिया के महासागर भले ही सबके लिए खुले हों, लेकिन इनके इस्तेमाल और नियंत्रण को लेकर UNCLOS के तहत मैरीटाइम नियम बनाए गए हैं. यही तय करती है कि कौन सा समुद्री इलाका किस देश के अधिकार में होगा और कहां तक उसकी ताकत चलेगी.

सबसे पहले समझिए कि समुद्री सीमा की शुरुआत बेसलाइन से होती है. अलग-अलग देशों के  तट के किनारे खींची गई एक काल्पनिक रेखा होती है. इसके अंदर का पानी उस देश का आंतरिक जल यानी इंटरनल वाटर  कहलाता है और इस पर उस देश का पूरा कंट्रोल होता है—जैसे उसकी अपनी जमीन पर होता है.

बेस लाइन से आगे देशों के बीच महासागर टेरिटोरियल समुद्र में बंटा होता है. यह तट के किनारे किसी भी देश के बेसलाइन से 12 नॉटिकल मील तक समुद्र में फैला होता है. इस टेरिटोरियल समुद्र पर उस देश का पूरा अधिकार होता है, लेकिन दूसरे देशों के जहाज भी इस टेरिटोरियल समुद्र से गुजर सकते हैं. यह दूसरे देश के लिए जहाजों इनोसेंट पैसेज होता है. 

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इससे आगे होता है कंटिजियस जोन. यह टेरिटोरियल समुद्र से भी आगे की एक पट्टी होती है, जो बेसलाइन से अधिकतम 24 नॉटिकल मील तक फैली होती है. यहां देश को कुछ खास नियम लागू करने का अधिकार मिलता है—जैसे टैक्स, इमिग्रेशन या सुरक्षा से जुड़े नियम.

समुद्र से निकलने वाले खनिज पर किसका हक 
इसके अलावा समुद्र में विशेष आर्थिक क्षेत्र  यानी एक्सक्लूसिव इकॉनोमिक जो (EEZ) भी होता है.  यह तट से 200 नॉटिकल मील तक फैला होता है. इस इलाके में तटीय  देश को समुद्र के अंदर मौजूद संसाधनों—जैसे तेल, गैस और मछलियों—पर पूरा अधिकार मिलता है. हालांकि, दूसरे देश यहां से जहाज चला सकते हैं.

एक्सक्लूसिव इकॉनोमिक जोन के आगे भी इलाका बंटा होता है. किसी भी देश से सटे समुद्रीय इलाके में 200 नॉटिकल मील से भी आगे का जोन कॉन्टिनेंटल शेल्फ कहलाता है. यह समुद्र के नीचे का वह हिस्सा है जहां देश को खनिज और अन्य संसाधनों पर अधिकार मिल सकता है. कुछ मामलों में यह सीमा 200 नॉटिकल मील से भी आगे बढ़ सकती है.

इससे भी दूर का इलाका समुद्र हाई सीज (High Seas) कहलाता है. यह किसी एक देश का नहीं होता. यहां सभी देशों को बराबरी का हक होता है—चाहे जहाज चलाना हो, मछली पकड़नी हो या रिसर्च करनी हो.

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ऐसे होता है विवादों का निपटारा
अगर दो देशों के बीच समुद्री सीमा को लेकर विवाद हो जाए, तो UNCLOS इसके समाधान का रास्ता भी बताता है. बातचीत, समझौता या अंतरराष्ट्रीय अदालत के जरिए ऐसे विवाद सुलझाए जाते हैं. सीधी भाषा में कहें तो, समुद्र को हिस्सों में बांटने का यह पूरा सिस्टम इसलिए बनाया गया है ताकि कोई देश मनमानी न कर सके और समुद्री संसाधनों का सही और संतुलित इस्तेमाल हो सके.

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