11 अप्रैल, 1909 को जाफा के प्राचीन बंदरगाह के पास यहूदी 66 परिवार समुद्र तट पर इकट्ठा हुए. इन परिवारों ने मिलकर अपने लिए एक नए शहर को बसाने का फैसाल किया. इसके बाद समुद्र से सीपियां निकालकर उससे तय किया कि किस परिवार को जमीन का कौन सा टुकड़ा मिलेगा. इस तरह अहुजात बायित शहर की नींव पड़ी जो बाद में तेल अवीव कहलाया.
इजरायल की राजधानी आज तेल अवीव में आज बड़ी आबादी बसती है. करीब 117 साल पहले तेल अवीव की नींव रखी गई थी. इसकी शुरुआत सिर्फ 66 परिवार के घरों से हुआ था, जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से यहां आकर बसे थे. तब इस शहर का नाम कुछ और ही था.
यूरोप से उजड़कर आने वाले वैसे यहूदी परिवार जिनका घर-बार सबकुछ पीछे छूट गया था. उन्हें एक ऐसे आशियाने की जरूरत थी, जो उन्हें अपने पुराने घर की याद दिलाता हो. 1909 में जायोनिस्ट नेता आर्थर रुपिन ने ऐसे ही 66 परिवार के लिए एक शहर बसाने का फैसला किया.
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इस नए शहर के लिए उन्होंने जाफा के प्राचीन बंदरगाह के पास एक इलाके को चुना. इस शहर का नाम उन्होंने 'अहुजात बायित' कहा, जिसका मतलब 'घर'होता है. रुपिनअहुजात बायित को यूरोप में छोड़े गए उन छोटे शहरों जैसा बनाना चाहते थे, जो कभी यहूदी समाज का घर था. अहुजात बायित के रूप में रुपिन इस शहर को जायोनिस्ट संस्कृति का केंद्र बनाना चाहते थे.
ऐसे नाम पड़ा तेल अवीव
एक साल बाद यानी की 1910 में इस छोटे से शहर को एक ऐसा नाम दिया गया जो इसके प्राचीन इतिहास और यहूदी रिनुअल या पुनर्उत्थान को दर्शाता हो. इस लिए अहुजात बायित की जगह इसका नाम तेल अवीव रखा गया. तेल अवीव शब्द हिब्रू बाइबिल के यहेजकेल की पुस्तक से लिया गया था.
तेल अवीव, हर्जल की 1902 में लिखी पुस्तक 'अल्टन्यूलैंड' (पुरानी नई भूमि) का हिब्रू शीर्षक भी था. हिब्रू में 'तेल ' का मतलब उस प्राचीन टीले से है जिसके नीचे अतीत की सभ्यता यानी पुरानी विरासतें होती हैं. वहीं 'अवीव' का अर्थ स्प्रिंग (वसंत) यानी नया जीवन होता है.