24 मार्च 1946 सोवियत रूस ने ईरान से अपनी सेना को वापस बुलाने की घोषणा की थी. ईरान में रूसी सेना की तैनाती दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हुई थी. जब 1942 में ईरान ने एक समझौते के तहत ब्रिटिश और सोवियत सैनिकों को जर्मनी के हमलों से बचाव के लिए अपने देश बुलाया था.
ईरान संकट द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान शुरू हुआ था. 1942 में, ईरान ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत ब्रिटिश और सोवियत सैनिकों को देश में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी. अमेरिकी सैनिक भी जल्द ही ईरान में पहुंच गए. 1942 की संधि में कहा गया था कि युद्ध समाप्त होने के छह महीने के भीतर सभी विदेशी सैनिक वापस चले जाएंगे.
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ईरान में तैनात की गई थी रूसी सेना
हालांकि, 1944 में, ग्रेट ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों ने ईरानी सरकार पर तेल रियायतों के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया और इसके जवाब में सोवियत संघ ने भी अपनी रियायतों की मांग की. 1945 तक, तेल की स्थिति अभी भी अनिश्चित थी, लेकिन युद्ध समाप्त होने वाला था और सोवियत संघ के प्रति अमेरिकी दृष्टिकोण में नाटकीय रूप से बदलाव आ चुका था.
विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद हालात बदलने लगे और अमेरिका को रूस की विस्तारवादी नीति का डर सताने लगा. इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाना शुरू किया. अमेरिका के दबाव में रूस के ईरान से बाहर निकलना पड़ा और यहीं से शीत युद्ध का दौर शुरू हुआ था.
शीत युद्ध का पहला अखाड़ा बना था ईरान
शीत युद्ध के प्रारंभिक दौर की अत्यंत तनावपूर्ण स्थिति के अंत में, सोवियत संघ ने घोषणा की कि ईरान में तैनात उसकी सेना छह सप्ताह के भीतर वापस बुला ली जाएगी. ईरानी संकट युद्ध के बाद के समय अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शक्ति प्रदर्शन की पहली परीक्षाओं में से एक था.
अप्रैल 1945 में फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट की मृत्यु के बाद सत्ता में आई हैरी एस. ट्रूमैन की नई सरकार ने यह निर्णय लिया कि सोवियत संघ पर भरोसा नहीं किया जा सकता और वह विस्तारवादी नीतियों पर तुला हुआ है. इसलिए, पूर्व युद्धकालीन सहयोगी के प्रति कठोर ति अपनाई गई. ईरान इस नई नीति का परीक्षण स्थल बन गया.
अमेरिका को सोवियत रूस से किस बात का था डर
सोवियत संघ ने ईरान में कार्रवाई करने का निर्णय लिया था. इस आशंका से कि ब्रिटिश और अमेरिकी ईरान में रूस के उचित प्रभाव क्षेत्र को नकारने की साजिश रच रहे हैं. इसी वजह से सोवियत संघ ने देश के उत्तरी क्षेत्रों में एक ईरानी विद्रोही समूह की सहायता की. इससे ईरान के अंदर अलगाववादी कुर्द समूह ने एक अलग देश की घोषणा कर दी थी. 1946 की शुरुआत में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान की स्थिति को लेकर संयुक्त राष्ट्र में शिकायत दर्ज कराई और सोवियत संघ पर एक संप्रभु राष्ट्र के मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया.
जब ईरान से विदेशी सैनिकों की वापसी की 2 मार्च, 1946 की समय सीमा बीत गई और सोवियत संघ फिर भी वहां मौजूद था, तो एक संकट उत्पन्न होने लगा. तब 24 मार्च, 1946 को सोवियत संघ ने छह सप्ताह के भीतर अपनी सेना वापस बुलाने की घोषणा की. इससे एक बड़ा राजनयिक टकराव टल गया.
कैसे शुरू हुआ शीत युद्ध
राष्ट्रपति ट्रूमैन ने दावा किया कि संभावित सैन्य टकराव की उनकी धमकियां ही निर्णायक कारक थीं, लेकिन ऐसा होना असंभव लगता है. सोवियत संघ और ईरान के बीच एक समझौता हुआ था जिसके तहत सोवियत संघ को ईरान में तेल का अधिकार प्राप्त हुआ था.
इस वादे के चलते सोवियत संघ ने अपना वादा निभाया और अप्रैल 1946 में ईरान से अपनी सेना वापस बुला ली. लगभग तुरंत ही, ईरानी सरकार ने तेल समझौते का उल्लंघन किया और अमेरिका की मदद और सलाह से उत्तरी ईरान में विद्रोह को कुचल दिया. इससे सोवियत संघ बेहद गुस्से में था, लेकिन अमेरिका और ग्रेट ब्रिटेन के साथ संघर्ष बढ़ने के डर से उसने ईरान में अपनी सेना दोबारा नहीं भेजी.
ईरानी संकट और इससे अमेरिका और सोवियत संघ के बीच पैदा हुए संदेह और गुस्से ने शीत युद्ध की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई. यहीं से शीत युद्ध का दौर शुरू हुआ.