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कभी 10 वेटिंग अटक जाती है और कभी 100 भी कंफर्म हो जाती है! क्या है रेलवे का टिकट कंफर्म का सिस्टम?

जानते हैं कि आखिर किस आधार पर रेलवे यात्रियों को सीट अलॉट करता है और क्यों कई बार 100 वेटिंग भी क्लियर हो जाती है और कई बार 10 वेटिंग भी अटक जाती है?

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रेलवे में कई आधार पर वेटिंग लिस्ट क्लियर होती है. (Photo: PTI)
रेलवे में कई आधार पर वेटिंग लिस्ट क्लियर होती है. (Photo: PTI)

आपने नोटिस किया होगा कि ट्रेन टिकट में कई बार 60-70 की वेटिंग भी कुछ ही दिन में क्लियर हो जाती है और कई बार 5 वेटिंग भी लंबे वक्त तक क्लियर नहीं हो पाती है.कोई कहता है कि 30 तक तो पक्का कन्फर्म हो जाता है. कोई दावा करता है 100 भी क्लियर हो सकता है. कई लोग 10 वेटिंग लिस्ट कंफर्म होने पर भी सवाल खड़े कर देते हैं.  वेटिंग टिकट कंफर्म होने को लेकर हर किसी का अपना-अपना फॉर्मूला है. लेकिन, आज समझते हैं कि आखिर रेलवे का फॉर्मूला क्या है और किस आधार पर रेलवे यात्रियों को सीट देता है या फिर ये सिर्फ किस्मत का खेल है...

कैसे काम करता है रेलवे का सिस्टम?

पहले तो आपको बता दें कि ऐसा नहीं है कि ट्रेन में जितनी सीटें हैं, उतनी सीट रेलवे को बेचनी होती है. रेलवे उतनी सीट बिकने के बाद आएसी और वेटिंग दिखाना शुरू कर देता है. हकीकत ये है कि रेलवे  सिर्फ सीट नहीं बेचता जबकि वो सीट की बिक्री रूट के आधार पर करता है. यानी दिल्ली से मुंबई जाने वाली सीट, बीच के हर स्टेशन के लिए अलग-अलग हिस्सों में बंटी होती है. इसी वजह से एक ही ट्रेन में कुछ स्टेशन से टिकट कंफर्म मिल जाती है तो कुछ जगह से वेटिंग दिखाने लगता है. 

स्टेशन के आधार पर यात्रियों के लिए सीट का कोटा तय होता है. उनके आधार पर ही यात्रियों को सीट दी जाती है यानी कंफर्म सीट का आधार ये भी है कि आप सीट कहां से बुक कर रहे हैं और उस स्टेशन के हिस्से में कितनी सीटें हैं.  इसके अलावा आपकी यात्रा का एंड स्टेशन, ट्रेन में उस रूट पर उपलब्ध सीटें, दूसरे यात्रियों की बुकिंग, कोटा लिमिट, कैंसिलेशन पैटर्न भी देखा जाता है. इसके बाद वेटिंग टिकट कंफर्म होती है. इस सिस्टम के जरिए कोशिश की जाती है कि एक सीट कई लोगों के काम आए, जैसे दिल्ली से जयपुर एक यात्री को मिल जाए, फिर जयपुर से आबू किसी को मिल जाए, फिर सूरत तक किसी और को मिल जाए, फिर आगे मुंबई तक किसी को मिल जाए. 

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क्यों 8-10 वेटिंग लिस्ट भी क्लियर नहीं हो पाती?

जब लोग कहते हैं कि 100 तक क्लियर हो गया, तो WL 10 क्यों फंसा रह गया. इसका जवाब है पैटर्न. वेटिंग क्लियर होने के तीन पैटर्न देखने को मिलते हैं. 

इसमें पहला फैक्टर है रूट की डिमांड. अगर आप ऐसे रूट पर जा रहे हैं जहां डिमांड बहुत ज्यादा है, जैसे दिल्ली से पटना या मुंबई से वाराणसी, तो कैंसिलेशन कम होता है. कम कैंसिलेशन मतलब वेटिंग क्लियर होने की संभावना कम.

दूसरा फैक्टर है कोटा ब्लॉक. कुछ सीटें VIP कोटा, लेडीज कोटा, डिफेंस कोटा में ब्लॉक होती हैं. ये सीटें आखिरी समय में ही रिलीज होती हैं या कभी-कभी होती ही नहीं. इससे वेटिंग आगे नहीं बढ़ती.

चौथा फैक्टर है चार्ट. चार्ट बनने से पहले अगर ज्यादा कैंसिलेशन नहीं हुआ, तो वेटिंग वहीं अटक जाती है.

इसके साथ ही रेलवे की ओर से स्टेशन आदि के आधार पर अलग अलग तरह की वेटिंग लिस्ट भी अलॉट की जाती है और उनके कंफर्म होने का सिस्टम भी अलग होता है. जैसे एक वेटिंग होती है RLWL यानी रिमोट लोकेशन वेटिंग लिस्ट. ये उन यात्रियों के लिए होती है जो ट्रेन के सोर्स स्टेशन से नहीं, बल्कि बीच के किसी स्टेशन से यात्रा शुरू करते हैं और किसी दूसरे बीच के स्टेशन तक जाते हैं. इसका कोटा कम होता है, इस वजह से कम वेटिंग भी कंफर्म नहीं हो पाती है. कोटे के हिसाब से उस खास सेक्शन में सीट खाली ही नहीं होती. 

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ऐसे ही एक PQWL वेटिंग होती है यानी पूल्ड कोटा वेटिंग लिस्ट. ये उन यात्रियों के लिए बनती है जो ट्रेन के अलग-अलग बीच के स्टेशनों के बीच यात्रा कर रहे होते हैं और उन्हें एक साझा (pooled) कोटे से सीट अलॉट होती है. इस कोटे में सीटें बहुत कम होती हैं और कई स्टेशनों के यात्रियों के बीच इन्हीं सीटों को बांटा जाता है. इस वजह से ये कम कंफर्म हो पाती है. 

100 वेटिंग क्लियर होने के पीछे का कारण?
100 वेटिंग क्लियर के पीछे अहम कारण तो ये है कि जर्नी डेट और बुकिंग डेट के बीच कितना वक्त है. इसके अलावा ज्यादा कैंसिलेशन, ग्रुप बुकिंग का कैंसिल होना, स्पेशल कोटा सीटों का रिलीज होना, यात्रा की तारीख का कम लोकप्रिय होना आदि फैक्टर भी इस पर काम करते हैं. ऐसा अधिकतर GNWL के मामले में ही होता है और ये कुछ ही रूट की ट्रेन में देखने को मिलता है. इसके अलावा किसी रूट पर और भी कई ट्रेन हैं तो भी ऐसा देखने को मिलता है.

(रिपोर्ट- Lallantop)

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