इन दिनों गर्मी ने अपना रूप दिखाना शुरू कर दिया है.मौसम विज्ञानियों के पूर्वानुमान भी आने वाले दिनों में प्रचंड गर्मी की ओर इशारा कर रहे हैं. इसके साथ ही कूलर, एसी और पंखे की बिक्री बढ़ने लगी है. लोग अपनी सहूलियत के हिसाब से गर्मी दूर भगाने के इंतजाम में लग गए हैं.
आज के समय में गर्मी भगाने के तो कई सारे उपाय मौजूद हैं, लेकिन कभी आपने सोचा है, जब बिजली नहीं थी और एसी, कूलर, पंखों का आविष्कार नहीं हुआ था, तब घरों को कैसे ठंडा रखा जाता था. खासकर राजा-महाराजाओं के बड़े-बड़े आलीशान महल गर्मी के दिनों में कैसे ठंडे रहते थे?
आप कह सकते हैं कि राजा-महाराजा तालाब, झरनों और पहाड़ों के पास महल बनवाते थे या महलों के आसपास बगीचा लगाकर हरियाली बढ़ाते थे. इससे आसपास का वातावरण ठंडा रहता था. लेकिन, भारत के राजस्थान, ईरान, अरब देशों और इजिप्ट जैसे गर्म और रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाले आम लोग और राजा, बादशाह के महल और किले कैसे ठंडे रहते थे?
एसी, कूलर और इलेक्ट्रिसिटी के आविष्कार से पहले प्राचीन समय में भी घरों और महलों को ठंडा करने वाले यंत्र थे. ये यंत्र भवनों और महलों की इमारत का हिस्सा होते थे. चलिए जानते हैं कि पुराने के समय में घरों में ऐसी कौन सी एसी होती थी, जो भीषण गर्मी में भी सुकून देती थी.
बिना AC घरों को ठंडा रखने की टेक्निक
प्राचीन मिस्र से लेकर फारसी साम्राज्य तक, हवा को इकट्ठा करने की एक अनोखी विधि ने सदियों तक लोगों को ठंडक पहुंचाई. इस कूलिंग सिस्टम की खोज शायद ईरान में हुई थी. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले के जमाने में रेगिस्तानी इलाकों में बनने वाले घरों में एक 'पवन यंत्र' या 'विंड कैचर'बनाया जाता था. यह घर व इमारतों का अहम हिस्सा होता था.
मध्य ईरान के रेगिस्तान में स्थित यज़्द शहर लंबे समय से ऐसी रचनात्मक संरचनाओं का केंद्र रहा है. याज़्द की प्राचीन तकनीकों में से एक पवन संग्रहण यंत्र है, जिसे फ़ारसी में बादगीर कहते हैं. ये अद्भुत संरचनाएं याज़्द की इमारतों की छतों के ऊपर आसमान छूती हुई मीनार या गुंबद के जैसी दिखाई देती थीं. ये अक्सर आयताकार या वर्गाकार मीनारें, गोलाकार, अष्टकोणीय और अन्य अलंकृत आकृतियों की गुंबद जैसी होती थी.
ये विंड कैचर हवा को इमारतों के भीतर ले जाते थे. हवा ऊपर से नीचे की ओर गुजरने के दौरान ठंडी होती थी और इमारत के भीतरी हिस्से में बहती थी. कभी-कभी और अधिक ठंडक के लिए नीचे इमारतों के आंगन में जलकुंडों या बड़े-बड़े पात्रों में पानी भरकर भी रखे जाते थे. कहा जाता है कि घरों को ठंडा रखने के लिए भवन निर्माण के दौरान पवन यंत्र बनाने की यह तकनीक यज्द से ही पूरी दुनिया में फैली.
पुराने जमाने में घरों को ठंडा रखने के ये थे उपाय
ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल राजस्थान के जयपुर, जैसलमेर, उदयपुर व अन्य शहरों के महलों में भी किया गया. इसके अलावा भारत के इन शहरों में 'स्टेप वेल' या बड़ी-बड़ी बाउड़ी का निर्माण भी कराया जाता था. इन स्टेप वेल की वजह से सिर्फ एक घर नहीं बल्कि आसपास का इलाके को भी ठंडा रखने में आसानी होती थी.
इनके अलावा और भी कई ऐसे उपाय थे, जिनसे भीषण गर्मी में भी घर ठंडे रहते थे. इनमें घरों की मोटी दीवारें, जालीदार बड़ी-बड़ी खिड़कियां, आम घरों में बड़े और खुले आंगन और हवादार बरामदे. चूना-पत्थर से बने मोटे दीवारों वाले घर, घरों में हर जगह वेंटिलेशन की पर्याप्त व्यवस्था. इन उपायों से पुराने जमाने में घरों को ठंडा रखा जाता था.
इमारतों की विशेष बनावट के अलावा महलों के आसपास बड़े-बड़े तालाब बनवाए जाते थे और बगीचे लगवाए जाते थे. इस वजह से ठंडी हवा महलों के विंड कैचर यानी वायु यंत्र के जरिए अंदर जाती थी. वहीं मुगल बादशाह के महलों में बड़े-बड़े गलियारों और कक्षों में बड़े-बड़े जलपात्र रखे जाते थे. यह सजावट का काम भी करते थे और महलों के बड़े-बड़े झरोखों और खिड़कियों से अंदर आने वाली गर्म हवा को ठंडा करते थे.
पहले गांव व शहरों में भी आम लोगों के घर भी ऐसे ही होते थे. हर गांव के अंदर दो-तीन तालाब होते थे और घरों के आसापास पेड़ लगे होते थे. अधिकतर घरों में मिट्टी की बनी मोटी-मोटी दीवारें होती थी. पक्के मकान भी चूना-पत्थर के बने होते थे और उनमें जालीदार झरोखे और वेंटिलेशन का काम होता था. ये सारे उपाय प्राकृतिक रूप से घरों और आसपास के माहौल को ठंडा रखने में मदद करते थे.
दुबई जैसे गर्म शहर में भी इमारतों को ठंडा रखने के लिए यज्द के पवन यंत्र तकनीक का ही इस्तेमाल होता था. वहां भी ऊंची-ऊंची पवन मीनारें या पवन-संग्रहक बनाए जाते थे, जिन्हें बरजील के नाम से जाना जाता था. इन घरों में बंद आंगन, जालीदार खिड़कियां और वेंटिलेशन के लिए ढेर सारी जगह होती थी.
बरजील या छतों पर लगे पारंपरिक पवन मीनार, ऊंचाई पर चलने वाली हवाओं को अंदर की ओर मोड़कर इमारतों के भीतर प्राकृतिक वेंटिलेशन और ठंडक प्रदान करते थे. ठंडी हवा इमारत के अंदर घूमती, जबकि गर्म हवा ऊपर उठकर बाहर निकल जाती है.