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जब हिटलर ने ईवा ब्राउन से शादी की, अपने आखिरी वक्त में लिया था ये फैसला

आज के दिन ही मरने से एक दिन पहले हिटलर ने अपनी प्रेमिका ईवा ब्राउन से शादी की थी. ईवा लंबे समय तक हिटलर के साथ रही और आखिरी वक्त में भी उसका साथ नहीं छोड़ा.

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मरने से एक दिन पहले हिटलर ने अपनी प्रेमिका ईवा ब्राउन से शादी की थी (Photo - Getty)
मरने से एक दिन पहले हिटलर ने अपनी प्रेमिका ईवा ब्राउन से शादी की थी (Photo - Getty)

29 अप्रैल 1945  की रात एडॉल्फ हिटलर और ईवा ब्राउन ने शादी कर ली थी.  इसके कुछ ही घंटों बाद दोनों ने आत्महत्या कर ली. ईवा की मुलाकात हिटलर से तब हुई थी, जब वह हिटलर के आधिकारिक फोटोग्राफर की सहायक के रूप में काम कर रही थीं. वह एक मध्यमवर्गीय कैथोलिक परिवार में पली-बढ़ी थी. ईवा ने हिटलर के साथ अपना समय सब की निगाहों से दूर रहकर बिताया था. 

ईवा स्कीइंग और तैराकी जैसी गतिविधियों में खासी रुचि रखती थी. हिटलर के राजनीतिक करियर पर उनका कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं था. लेकिन, उन्होंने तानाशाह के जीवन में एक तरह का घरेलू माहौल बना दिया था. अंत तक वफादार रहते हुए, उन्होंने रूसी सेना के बढ़ते दबाव के बावजूद चांसलरी के नीचे बने बर्लिन बंकर को छोड़ने से इनकार कर दिया. आखिरी वक्त तक वह हिटलर के साथ रही और आखिरकार दोनों शादी भी रचाई. 

1945 में 29 अप्रैल को हिटलर ने मरने से एक दिन पहले ईवा से शादी की थी. उस वक्त उनके कुछ करीबी बंकर में मौजूद थे. बाकी लोगों को बाहर भेज दिया गया था.  

इसी दिन अमेरिकियों ने डचाऊ यातना शिविर को जब मुक्त कराया. शिविर की रखवाली कर रहे पांच सौ जर्मन सैनिक एक घंटे के भीतर मारे गए थे. इनमें से कुछ को शिविर के कैदियों ने मार दिया था, लेकिन अधिकतर को अमेरिकी सैनिकों ने मारा था. अमेरिकी सैनिकों को  रेलगाड़ियों और श्मशान के पास शवों के विशाल ढेर  मिले थे.

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इस शिविर से 33,000 लोग बचाए गए, जिनमें से 2,539 यहूदी थे. म्यूनिख से लगभग 12 मील उत्तर में स्थित डचाऊ, हिटलर के सत्ता में आने के मात्र पांच सप्ताह बाद नाजी शासन द्वारा स्थापित पहला यातना शिविर था. मुख्य शिविर से कम से कम 160,000 कैदी गुजरे और दक्षिणी जर्मनी और ऑस्ट्रिया में फैली इसकी 150 शाखाओं से 90,000 अन्य कैदियों को रखा गया. 

यह भी पढ़ें: जब हिटलर ने खोला पहला यातना शिविर, ऐसे हुई थी नरसंहार की शुरुआत

 कैदियों पर चिकित्सा प्रयोग किए गए, जिनमें गर्म रक्त वाले जीवों पर ठंड के प्रभावों का अध्ययन करने से लेकर जानबूझकर मलेरिया का इलाज करना शामिल था. शिविर में ही कुपोषण और दुर्व्यवहार के कारण कम से कम 32,000 कैदियों की मृत्यु हो गई. अनगिनत और लोगों को ऑशविट्ज़ के गैस चैंबरों में भेज दिया गया. 11 सितंबर, 1956 को शिविर स्थल पर एक स्मारक स्थापित किया गया.

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