13 साल से एक घर में जिंदगी जैसे ठहर सी गई थी. गाजियाबाद के हरीश राणा एक दुर्घटना के कारण कोमा में थे. मंगलवार को उनकी इच्छा मृत्यु की अपील को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दे दी. यह फैसले हरीश के परिवार के लिए दोहरी भावनाएं लिए हुए है. एक तरफ इस बात का संतोष कि हरीश को ‘मुक्ति’ मिलेगी. दूसरी तरफ हरीश के चले जाने का दुख. हरीश को आज जो न्याय मिला है, उसमें उनकी ही तरह लंबे अरसे तक कोमा में रही नर्स अरुणा शानबॉग के केस और एक संस्था कॉमन काज की पहल ने अहम भूमिका निभाई है. इच्छामृत्यु से जुड़े इस न्याय तक पहुंचने के लिए कितना कुछ संघर्ष हुआ है, आइये एक नजर में समझते हैं...
अरुणा शानबाग केस: जहां से शुरू हुई बहस
वैसे तो इच्छामृत्यु हमेशा से बहस का मुद्दा रहा है. लेकिन, भारत में इच्छा मृत्यु पर सबसे बड़ी चर्चा 2011 में अरुणा शानबाग केस से शुरू हुई. अरुणा शानबाग मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में नर्स थीं. गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, साल 1973 में अस्पताल के सफाईकर्मी द्वारा रेप और कुत्ते की चेन से गला घोंटकर हत्या किए जाने के बाद अरुणा शानबाग को गंभीर मानसिक क्षति हुई और वह कोमा जैसी स्थिति में चली गईं. उस वक्त उनकी उम्र 25 साल थी. इसके बाद वो 42 वर्षों तक कोमा में रहीं और 2015 में उनका निधन हो गया.
जब वो कोमा में थीं, उस वक्त मुंबई की लेखिका और नर्स की दोस्त पिंकी विरानी ने याचिका दायर कर उसे ट्यूब के माध्यम से जबरन खाना खिलाना बंद करने की मांग की ताकि उसकी पीड़ा को लंबा न खींचा जा सके. साथ ही उन्हें इच्छामृत्यु देने की मांग की. हालांकि, 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने विरानी की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने शानबाग के लिए इच्छामृत्यु की मांग की थी. उस वक्त कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कुछ परिस्थितियों में 'इच्छामृत्यु' की अनुमति दी जाएगी, लेकिन केवल तभी जब अस्पताल ने स्वयं अनुरोध किया हो (शानबाग के मामले में).
फैसले में कहा गया, 'अरुणा शानबाग के माता-पिता का निधन हो चुका है और उस दुर्भाग्यपूर्ण हमले के बाद से उनके अन्य करीबी रिश्तेदारों ने भी उनकी परवाह नहीं की है. केईएम अस्पताल के कर्मचारी, जिन्होंने इतने सालों तक दिन-रात उनकी देखभाल की है, वास्तव में उनके सच्चे मित्र हैं... इसलिए यह निर्णय लेना उन्हीं का काम है.' इस केस ने सबसे पहले भारत के इच्छामृत्यु कानूनों पर बहस छेड़ दी थी.
कॉमन कॉज फैसला: जिससे मिला अधिकार
अरुणा केस के बाद इच्छा मृत्यु पर स्पष्ट कानून की जरूरत महसूस की जाने लगी. इसी मुद्दे को लेकर एनजीओ Common Cause ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 मार्च 2018 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला है जिसने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी.
साथ ही कोर्ट ने लिविंग विल का अधिकार दिया. इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखकर यह तय कर सकता है कि अगर वह भविष्य में ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां वह खुद निर्णय लेने की स्थिति में न हो, तो उसे कृत्रिम लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए. हालांकि, कॉमन कॉज़ मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु कब लागू की जा सकती है, इस पर दिशा-निर्देशों को पूरी तरह से निर्धारित और स्पष्ट नहीं किया जा सका. अब हरीश राणा के मामले में इस फैसले को आधार माना गया है.
हरीश राणा केस: जिसमें मिली इच्छामृत्यु
बता दें कि दिल्ली से सटे गाजियाबाद के हरीश राणा पिछले 12 वर्षों से अधिक समय से कोमा/वेजिटेटिव स्टेट में थे. इसके बाद उनके पैरेंट्स ने अपने 31 साल के जवान बेटे को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनिशिया) देने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. अब कोर्ट ने 2018 के फैसले को आधार मानते हुए इच्छामृत्यु पर फैसला सुनाया है. जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के बाद यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने दिल्ली के एम्स (AIIMS) को उपचार रोकने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है.