12 अप्रैल 1633 को पोप अर्बन अष्टम की ओर से नियुक्त मुख्य जांचकर्ता फादर विन्सेन्ज़ो मैकुलानी दा फायरेंजुओला ने भौतिक विज्ञानी और खगोलशास्त्री गैलीलियो गैलीली के मामले की जांच शुरू की. गैलीलियो पर पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने के सिद्धांत देने और ऐसा विश्वास करने के लिए मुकदमा चलाया गया. इस वजह से उन्हें विधर्मी माना गया. क्योंकि, चर्च के रूढ़िवादी सिद्धांतों के अनुसार पृथ्वी सूर्य के चारों ओर नहीं, बल्कि पृथ्वी के चारों ओर सूर्य चक्कर लगाता था.
यह दूसरी बार था जब गैलीलियो को चर्च के उस रूढ़िवादी मत को मानने से इनकार करने के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जिसमें पृथ्वी को ब्रह्मांड का अचल केंद्र माना जाता था. 1616 में उन्हें अपने विश्वासों को मानने या उनका बचाव करने से मना किया गया था. 1633 में हुई पूछताछ में, गैलीलियो ने कोपरनिकस के मत में विश्वास रखने से इनकार किया, लेकिन उन्होंने इस मुद्दे और इसके प्रमाणों के बारे में लिखना जारी रखा. इसका उद्देश्य विश्वास के बजाय "चर्चा" करना था.
चर्च ने यह मान लिया था कि सूर्य का पृथ्वी के चारों ओर घूमना धर्मग्रंथों का एक ऐसा अटल सत्य है जिस पर विवाद नहीं किया जा सकता, जबकि वैज्ञानिक सदियों से जानते थे कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है. इस बार, गैलीलियो का तकनीकी तर्क कारगर नहीं हुआ.
22 जून, 1633 को चर्च ने आदेश दिया कि हम यह निर्णय देते हैं और घोषित करते हैं कि आप, गैलीलियो… ने स्वयं को विधर्म के गंभीर संदेह के दायरे में ला दिया है, अर्थात् इस सिद्धांत पर विश्वास करने और उसे मानने के लिए (जो कि गलत है और पवित्र एवं दिव्य धर्मग्रंथों के विपरीत है) कि सूर्य विश्व का केंद्र है, और यह पूर्व से पश्चिम की ओर गति नहीं करता है, जबकि पृथ्वी गति करती है और विश्व का केंद्र नहीं है.
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इस आदेश के साथ दंड स्वरूप गैलीलियो गैलीली के संवादों की पुस्तक को प्रतिबंधित कर दिया गया. साथ ही गैलीलियों को कारावास में रहने का दंड दिया गया. तीन वर्षों तक उन्हें जेल में रखा गया. गैलीलियो ने विधर्म का प्रचार न करने पर सहमति जताई और अपना शेष जीवन नजरबंदी में बिताया. चर्च को यह स्वीकार करने में 300 से अधिक वर्ष लग गए कि गैलीलियो सही थे और उन्हें विधर्म के आरोपों से मुक्त करने में भी समय लगा.