5 अप्रैल 1859 को चार्ल्स डार्विन ने अपनी पुस्तक 'ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज' के पहले तीन चैप्टर अपने प्रकाशक को भेजे थे. उन्होंने डरते-डरते ये कदम उठाया था. क्योंकि, तब प्रकृति को लेकर चली आ रही रूढ़िवादी अवधारणा को चुनौती देने वाले क्रांतिकारी वैज्ञानिक सिद्धांतों की बात करने वाले वैज्ञानिकों का बुरा हश्र होता था. हालांकि, यह किताब आगे चलकर अब तक प्रकाशित सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तकों में एक बन गई.
प्रकृतिवादी चार्ल्स डार्विन ने अपनी जिस पुस्तक 'ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज' के पहले तीन अध्याय अपने प्रकाशकों को भेजे , वो आगे चलकर अब तक प्रकाशित सबसे प्रभावशाली पुस्तकों में से एक बन गई थी. तब क्रांतिकारी सिद्धांत प्रकाशित करने वाले वैज्ञानिकों के हश्र को जानते हुए, जिन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था या इससे भी बदतर स्थिति का सामना करना पड़ा था.
डार्विन ने प्राकृतिक चयन के अपने सिद्धांत को वर्षों तक प्रकाशित नहीं किया. एचएमएस बीगल जहाज पर अवैतनिक वनस्पति विज्ञानी के रूप में दक्षिण अमेरिका की पांच साल की यात्रा से लौटने के बाद, उन्होंने गुप्त रूप से दो दशकों के शोध के दौरान अपने सिद्धांत को विकसित किया.
एक सफल अंग्रेज डॉक्टर के विशेषाधिकार प्राप्त और प्रभावशाली परिवार से ताल्लुक रखने वाले डार्विन को बचपन से ही वनस्पति विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान में रुचि थी. हालांकि उनके शुरुआती शिक्षकों ने उन्हें हतोत्साहित किया था. कैम्ब्रिज में, उन्हें समान रुचियों वाले प्रोफेसर और वैज्ञानिक मिले और उनकी मदद से उन्होंने वैज्ञानिक यात्राओं में भाग लेना शुरू किया, जिनमें एचएमएस बीगल की यात्रा भी शामिल थी.
जब डार्विन लौटे, तब तक उन्होंने एक फील्ड रीसर्चर और वैज्ञानिक लेखक के रूप में प्रतिष्ठा हासिल कर ली थी, जो दक्षिण अमेरिका और गैलापागोस द्वीप समूह से भेजे गए उनके कई शोध पत्रों और पत्रों पर आधारित थी, जिन्हें लंदन में प्रमुख वैज्ञानिक समाजों की बैठकों में पढ़ा गया था.
अपनी समुद्री यात्रा से लौटते ही डार्विन ने प्राणी विज्ञान और भूविज्ञान पर शोध प्रकाशित करना शुरू कर दिया, साथ ही गुप्त रूप से अपने क्रांतिकारी विकासवाद के सिद्धांत पर भी काम करते रहे. इसी दौरान उनका विवाह हुआ और उनके सात बच्चे हुए. अंततः उन्होंने 'द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज' का प्रकाशन तब किया जब एक अन्य वैज्ञानिक ने भी इसी तरह के विचारों पर शोधपत्र प्रकाशित करना शुरू कर दिया था.
नवंबर 1859 में जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई, तो तुरंत बिक गई. 1872 तक इसके छह संस्करण प्रकाशित हो चुके थे. इसने आधुनिक वनस्पति विज्ञान, कोशिकीय जीव विज्ञान और आनुवंशिकी की नींव रखी. डार्विन का निधन 1882 में हुआ.