अमेरिका के कैलिफोर्निया में 1950 ई. में वैज्ञानिकों का एक छोटा समूह चुपचाप एक प्रयोगशाला में काम एक ऐसे तत्व बनाने पर काम कर रहा था, जिससे रमाणुओं के व्यवहार को समझा जा सके. वे न तो सोने की खोज कर रहे थे, न ही हीरों के पीछे भाग रहे थे और न ही अमीर बनने की कोशिश कर रहे थे.
फिर भी, उन्हें जो मिला प्रयोग के दौरान कुछ ऐसा बनाया जिसकी कीमत प्रति ग्राम एक आलीशान महल से भी ज्या थी. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के शोधकर्ताओं ने उस समय जश्न नहीं मनाया. क्योंकि, इतिहास चुपचाप रचा जा रहा था. वैज्ञानिकों ने दुनिया का सबसे महंगा तत्व बनाने में सफलता हासिल की थी. इसका नाम है - कैलिफोर्नियम-252.
प्रति ग्राम की कीमत है अरबों रुपये
कैलिफोर्नियम दुनिया का सबसे महंगा मानव निर्मित खनिज है. इस रहस्यमय पदार्थ की खोज 1950 में कैलिफोर्निया में हुई थी और इसकी कीमत लगभग 27,000,000 डॉलर प्रति ग्राम है, जो इसे मानव द्वारा निर्मित अब तक का सबसे महंगा पदार्थ बनाती है.
इसका उत्पादन प्रति वर्ष बहुत कम मात्रा में होता है. जिसे अक्सर मिलीग्राम में मापा जाता है. इसका प्रत्येक छोटा सा हिस्सा वर्षों के प्रयास, विशेषज्ञता और विशेष परिस्थितियों में बनता है, जो पृथ्वी पर कुछ ही स्थानों पर संभव है. इसे कड़ी सुरक्षा में रखा जाता है.
अपनी अत्यधिक दुर्लभता और अद्वितीय गुणों के कारण, कैलिफोर्नियम-252 को विश्व स्तर पर केवल कुछ ही संस्थानों को इसके उत्पादन या इस्तेमाल की अनुमति है और हर प्रोसेस की सावधानीपूर्वक निगरानी की जाती है.
कैलिफोर्नियम बनाने की कहानी काफी रोचक है. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के शोधकर्ता परमाणुओं के व्यवहार को समझने के लिए प्रयोग कर रहे थे. वैज्ञानिक नए परमाणु तत्वों का निर्माण केवल यह देखने के लिए कर रहे थे कि आगे क्या होगा. इसी दौरान इस सबसे महंगे पदार्थ का निर्माण हुआ.
जब इस अनोखी सामग्री की पहली बार पहचान हुई, तो इसने लगभग कोई सार्वजनिक ध्यान आकर्षित नहीं किया. कीमती धातुओं या रत्नों के विपरीत, इस पदार्थ को धरती से निकाला नहीं जा सकता. इसे कृत्रिम रूप से अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बनाया जाता है, जो केवल कुछ ही संयंत्रों में संभव है. इस प्रक्रिया में वर्षों लग जाते हैं और इसके लिए अत्यधिक सटीकता और ऊर्जा की आवश्यकता होती है.
कहां होता है इसका इस्तेमाल
कम मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद, इसके कई व्यावहारिक उपयोग हैं. जिनका वास्तविक दुनिया पर गहरा प्रभाव पड़ता है.मेडिकल सेक्टर में ब्रेन और सर्वाइकल कैंसर जैसे कुछ दुर्लभ बीमारियों के इलाज में इसका इस्तेमाल होता है.
धरती के नीचे पानी, तेल और अन्य खनिजों का पता लगाने के लिए अत्याधुनिक स्कैनरों में इसका इस्तेमाल होता है. एयरक्राफ्ट स्कैनिंग, लगेज स्कैनिंग में भी इससे मदद मिलती है. इसका सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमाल न्यूक्लियर प्लांट या टेक्नोलॉजी में होता है.