आज फिल्मों में डायलॉग, गाने और म्यूजिक आम बात है. अब तो स्पेशल इफेक्ट और डिजिटल साउंड तकनीक से फिल्मों में आवाज और भी ज्यादा रियलिस्टिक हो चुकी है. मगर आज से 95 साल पहले ऐसा कुछ नहीं था. तब फिल्म का मतलब था, सिर्फ चलचित्र यानी बिना आवाज के दृश्य देखने को मिलते थे. फिल्मों के पात्र क्या बोल रहे हैं यह टाइटल कार्ड पढ़कर समझ आता था.
आज के दिन यानी 14 मार्च 1931 को पहली बार भारत में लोगों ने फिल्मों में कैरेटर्स को बोलते हुए सुना. क्योंकि, इसी दिन पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' रिलीज हुई थी. इससे पहले सिर्फ मूक फिल्में बनती थीं.
इस फिल्म अर्देशिर ईरानी ने डायरेक्ट किया था. यह फिल्म इतनी पॉपुलर हुई कि उन्हें थिएटर के साथ-साथ भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पुलिस को भी बुलाना पड़ा था. फ़िल्म रिलीज होने के 8 हफ्ते से ज़्यादा समय तक हाउसफुल चली. फिल्म की नायिका जुबैदा थीं. पहली बार लोगों ने पात्रों को बोलते हुए देखा था.
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बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फिल्म देखने वाली मशहूर भारतीय नृत्यांगना सितारा देवी ने याद करते हुए बताया था कि यह एक ज़बरदस्त सनसनी थी. उन्होंने बताया था कि लोग टाइटल कार्ड पढ़कर मूक फिल्में देखने के आदी थे और जब किरदार बोलने लगे तो लोग थिएटर में पूछ रहे थे कि आवाज़ कहां से आ रही है?
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भारत की पहली बोलती फिल्म इतनी बड़ी हिट हुई थी कि थिएटर में भीड़ कंट्रोल करने के लिए पुलिस की तैनाती करनी पड़ी थी. कई हफ्तों तक आलम आरा हाउसफुल रही. इसके बाद से असल में भारतीय फिल्मों का सफर शुरू हुआ था.