ट्रेन में इंजन सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. अगर इंजन न हो तो उससे जुड़े सभी डिब्बे किसी काम के नहीं रहते. इंजन ही पूरी ट्रेन को खींचकर आगे बढ़ाता है.
लेकिन कई बार ऐसे हालात भी आ जाते हैं जब इंजन को भी थोड़ी मदद की जरूरत पड़ती है. इसी मदद के लिए ट्रेन में सैंड बॉक्स लगाया जाता है.
भारतीय रेलवे हर दिन लाखों यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाती है. मौसम चाहे गर्मी हो, बारिश हो या सर्दी, ट्रेनें लगातार चलती रहती हैं. लेकिन खराब मौसम, खासकर बारिश या ज्यादा नमी के समय रेल की पटरियां गीली और फिसलन भरी हो जाती हैं.
ऐसे में ट्रेन के पहिए पटरियों पर ठीक से पकड़ नहीं बना पाते और कई बार अपनी जगह पर ही घूमने लगते हैं. इससे ट्रेन की रफ्तार बढ़ाने में दिक्कत होती है. इसी समस्या को दूर करने के लिए इंजन में सैंड बॉक्स लगाया जाता है. यह एक ऐसा डिब्बा होता है जिसमें सूखी रेत भरी रहती है.
जब लोको पायलट को लगता है कि ट्रेन के पहिए फिसल रहे हैं, तो वह सैंड बॉक्स का इस्तेमाल करता है. इसके जरिए पटरियों पर थोड़ी-सी रेत गिराई जाती है. रेत गिरने से पटरियों और पहियों के बीच घर्षण (पकड़) बढ़ जाती है. इससे पहियों का फिसलना कम हो जाता है और ट्रेन आसानी से आगे बढ़ने लगती है. इस वजह से खराब मौसम में भी ट्रेन सुरक्षित तरीके से चल पाती है.
इंजन के नीचे एक बड़े बॉक्स में सूखी रेत भरी होती है, जिसे सैंडबॉक्स कहा जाता है. जरूरत पड़ने पर इस बॉक्स से थोड़ी-सी रेत पटरियों पर गिराई जाती है. रेत गिरने से ट्रेन के पहियों और पटरियों के बीच पकड़ (घर्षण) बढ़ जाती है, जिससे पहिए फिसलते नहीं हैं और ट्रेन सुरक्षित तरीके से रुक या आगे बढ़ सकती है.
यह रेत कंप्रेस्ड एयर की मदद से पटरियों पर डाली जाती है और इसका कंट्रोल लोको पायलट के पास होता है.आमतौर पर इसका इस्तेमाल तब ज्यादा किया जाता है जब ट्रेन को चढ़ाई पर ले जाना होता है. इसके अलावा बारिश के मौसम में या जब ट्रेन में ज्यादा वजन होता है और पहिए फिसलने लगते हैं, तब भी सैंड बॉक्स बहुत काम आता है.