‘ग़ज़ल उसने छेड़ी, मुझे साज़ देना, ज़रा उम्र-ए-रफ़्ता को आवाज़ देना.’ कुछ ऐसी ही तमन्ना उठ रही थी हर उस दिल से, जो मौजूद था मीरो-ग़ालिब की दिल्ली में सजाए गए, जश्न-ए-बहार के यादगार मुशायरे में. उर्दू ज़ुबान से मुहब्बत ने उन्हें भी अपना दीवाना बना दिया जो सात समंदर पार बसे हैं. शायद इसीलिए हिंदुस्तान के इस बवक़ार-मुशायरे में दुनिया के कई मुल्कों के शायरों ने शिरकत की. और देर देर रात तक रौशन रक्खी, शेर-ओ-सुख़न की शमा. आधी रात तक चलता रहा जश्न-ए-शायरी.