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तीनों कृषि कानूनों की वापसी के बाद बड़ा सवाल, क्या यूपी में पलटेगा बीजेपी का चुनावी भाग्य?

कृषि कानूनों की वापसी के ऐलान के बाद से आगामी चुनावों पर चर्चा तेज हो चुकी है. बीजेपी के यूपी का चुनाव इनमें सबसे अहम होगा. बड़ा सवाल यही है कि कानून वापस लेने के फैसले का असर यूपी चुनाव पर कितना पड़ेगा और बीजेपी को इसमें कितना फायदा होगा?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी    (FILE) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (FILE)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत क्या फिर लेगी करवट?
  • बीजेपी को जाटों की नाराजगी कम होने की उम्मीद है
  • विपक्ष को भी नए मुद्दे तलाशने होंगे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माफी मांगने के साथ ही तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया. सियासी जानकारों के मुताबिक बीजेपी के लिए चुनावी दृष्टि से पंजाब से कहीं ज्यादा सिरदर्दी उत्तर प्रदेश की थी. यूपी चुनाव के ऐलान से पहले प्रधानमंत्री का यह फैसला चुनाव के दृष्टिगत एक बड़े चुनावी फैसले की तरह देखा जा रहा है.

दरअसल बीजेपी को लगता है कि अब वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों और ख़ासकर जाटों की नाराजगी को कम कर सकेगी, जिससे उनका चुनावी भाग्य पलटेगा.

प्रधानमंत्री के कानून वापसी के फैसले के बाद से किसानों में खुशी की लहर है, पटाखे फूट रहे हैं और किसानों के बीच मिठाइयां बंट रही हैं. विपक्ष हमलावर जरूर है, लेकिन उसके हाथ से अब यह मुद्दा निकल सकता है. यही वजह है कि अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री के ऐलान के बाद एक नया नारा दिया "साफ नहीं है इनका दिल, चुनाव के बाद फिर लाएंगे यह बिल".

दरअसल 2022 के चुनाव के पहले उत्तर प्रदेश के लिए इससे बड़ा कोई फैसला नहीं हो सकता था, क्योंकि पश्चिम में किसानों और जाटों की नाराजगी के अलावा यह आंदोलन तराई में फैल चुका था. तराई में किसानों पर मंत्री पुत्र की चढ़ाई गाड़ी से किसानों की की हुई मौतों के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में किसानों के बीच नाराजगी उपजी थी, जो चुनाव आते आते और धार पकड़ सकती थी.

बीजेपी अब खुलकर चुनावी पिच पर खेलेगी

प्रधानमंत्री की माफी के साथ कानून वापसी के फैसले ने बीजेपी के भीतर एक नया जोश भरा है, क्योंकि अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी फ्रंट फुट पर खेलेगी. जहां उसके नेता, कार्यकर्ता जाट बाहुल्य गांवों में घुसने से डर रहे थे, अब पार्टी नए जोश के साथ पश्चिमी यूपी में जाटों को साधने की कोशिश में जुट जाएगी.

प्रधानमंत्री ने तीनों कानूनों को वापस लिया, उसके पहले अमित शाह को पश्चिम का प्रभारी बनाया गया है. ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव का समीकरण बदलेगा.

क्या कहते हैं बीजेपी और समाजवादी पार्टी के जाट नेता

बीजेपी के जाट चेहरे और योगी सरकार में मंत्री भूपेंद्र चौधरी कहते हैं कि जाटों का एक बड़ा तबका पहले से ही बीजेपी के साथ था. कृषि कानूनों के बावजूद वह लोग जाट बिरादरी को समझाने में सफल थे, लेकिन प्रधानमंत्री के इस फैसले के बाद अब बची खुची नाराजगी भी खत्म होगी. 2019 की तरह वापस जाट बीजेपी से जुड़ेंगे, जबकि समाजवादी पार्टी के जाट चेहरे संजय लाठर का मानना है कि प्रधानमंत्री ने तीनों कानूनों को वापस लेकर सेल्फ गोल कर लिया है, जाट और किसान अपमान और तकलीफों को नहीं भूलेंगे, बल्कि इसका बदला लेंगे.

बहरहाल अब चौक चौराहों पर इस बात की चर्चा शुरू हो चुकी है कि आखिर इन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का कितना सियासी असर उत्तर प्रदेश के चुनाव पर होगा.

बीजेपी को लगता है कि प्रधानमंत्री ने जिस तरीके से संवेदनशीलता जताते हुए माफी मांगी है और जिस तरीके से यह किसानों और जाटों की जीत के तौर पर सामने आया है, आने वाले वक्त में बीजेपी गुस्से को कम करने में सफल होगी.

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