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UP में पिछड़े वोटों के लिए घमासान, हर पार्टी में OBC नेता ही संभाल रहे सूबे की कमान

उत्तर प्रदेश में सभी दलों की नजर ओबीसी समुदाय के वोट बैंक पर है, जिन्हें साधने के लिए सत्तापक्ष से लेकर विपक्ष तक अपनी-अपनी पार्टी की कमान यूपी में पिछड़े समुदाय के हाथों में दे रखी है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह कुर्मी जाति से आते हैं जबकि इसी जाति के नरेश उत्तम को सपा ने प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है. वहीं, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू अति पिछड़ी जाति के कानू समाज से आते हैं और ऐसे ही बसपा के प्रदेश अध्यक्ष भीम राजभर अति पिछड़े समुदाय के राजभर समाज से आते हैं.  

स्टोरी हाइलाइट्स
  • बीजेपी और सपा की नजर कुर्मी समुदाय के वोट पर
  • कांंग्रेस और बसपा की नजर अति पिछड़ा वोट बैंक पर
  • यूपी की राजनीति में ओबीसी वोट अहम भूमिका में है

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में अभी करीब सवा साल बाकी है, लेकिन सियासी दल अभी से ही राजनीतिक समीकरण दुरुस्त करने में जुट गए हैं. सूबे में सभी दलों की नजर ओबीसी समुदाय के वोटबैंक पर है, जिन्हें साधने के लिए सत्तापक्ष से लेकर विपक्ष तक अपनी-अपनी पार्टी की कमान यूपी में पिछड़े समुदाय के हाथों में दे रखी है. ऐसे में देखना होगा कि उत्तर प्रदेश का ओबीसी समुदाय किस पार्टी पर भरोसा जताता है. 

दरअसल, उत्तर प्रदेश की सियासत में पिछड़ा वर्ग की अहम भूमिका रही है. माना जाता है कि करीब 50 फीसदी ये वोट बैंक जिस भी पार्टी के खाते में गया, सत्ता उसी की हुई. 2017 के विधानसभा और 2014 व 2019 के लोकसभा में बीजेपी को पिछड़ा वर्ग का अच्छा समर्थन मिला. नतीजतन वह केंद्र और राज्य की सत्ता पर मजबूती से काबिज हुई. ऐसे ही 2012 में सपा ने भी ओबीसी समुदाय के दम पर ही सूबे की सत्ता पर काबिज हुई थी जबकि 2007 में मायावती ने दलित के साथ अति पिछड़ा दांव खेलकर ही चुनावी जंग फतह किया था. 

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सूबे के सभी सियासी पार्टियों ने पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम शुरू किया है. बीजेपी, सपा, कांग्रेस और बसपा जैसी मुख्य पार्टियों के प्रदेश अध्यक्ष पिछड़ी जाति से हैं. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह कुर्मी जाति से आते हैं जबकि इसी जाति के नरेश उत्तम को सपा ने प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है. वहीं, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू अति पिछड़ी कही जाने वाली कानू जाति आते हैं और ऐसे ही बसपा के प्रदेश अध्यक्ष भीम राजभर अति पिछड़े समुदाय के राजभर समाज से आते हैं.

यूपी में 52 फीसदी ओबीसी वोट

बता दें कि उत्तर प्रदेश में सरकारी तौर पर जातीय आधार पर पिछड़ा वोट बैंक का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक यूपी में सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का है. लगभग 52 फीसदी पिछड़ा वोट बैंक में 43 फीसदी वोट बैंक गैर यादव बिरादरी का है, जो कभी किसी पार्टी के साथ स्थाई रूप से नहीं खड़ा रहता है. इतना ही नहीं पिछड़ा वर्ग के वोटर कभी सामूहिक तौर पर किसी पार्टी के पक्ष में भी वोटिंग नहीं करते हैं.

उत्तर प्रदेश वरिष्ठ पत्रकार विक्रम राव कहते हैं कि ओबीसी समुदाय सूबे के चुनाव में अपना वोट जाति के आधार पर करता रहा है. यही वजह है कि छोटे हों या फिर बड़े दल, सभी की निगाहें इस वोट बैंक पर रहती हैं. ऐसे में उत्तर प्रदेश एक के बाद एक मिलती हार के बाद मायावती ने अपनी चुनावी रणनीति में परिवर्तन किया है. तमाम कोशिशों के बाद भी मुस्लिम वोटर बसपा के पाले में नहीं आ रहे थे. ऐसे में मायावती ने मुस्लिम वोटरों को लुभाने की बजाए करीब 52 फीसदी पिछड़ा वर्ग के वोटरों में से अति पिछड़ा वोट बैंक को साधने के लिए राजभर समुदाय से आने वाले भीम राजभर को पार्टी की कमान सौंपी है. 

सपा की नजर कुर्मी वोटों पर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब बात पिछड़े वर्ग की आती है तो यादव को छोड़कर अन्य पिछड़ी जातियों की सियासत काफी अलग खड़ी नजर आती है. यादव वोटर लंबे समय से ठीक वैसे ही सपा के साथ जुड़े हुए हैं जैसे दलित बसपा का दामन थामे हैं. इसीलिए अखिलेश यादव ने अपने पंरापरागत 9 फीसदी यादव वोट बैंक के साथ पिछड़े समुदाय के आने वाले दूसरी सबसे बड़ी आबादी कुर्मी को साधने के लिए नरेश उत्तम को सूबे में पार्टी की कमान दे रखी है. हालांकि, 2019 लोकसभा चुनाव में भी नरेश उत्तम ही पार्टी संभाल रहे थे, लेकिन कुर्मी समुदाय को सपा के पाले में लाने में सफल नहीं रहे हैं. 

बीजेपी का दांव गैर-यादव ओबीसी पर

गैर-यादव ओबीसी यूपी में काफी निर्णयक भूमिका में है, जिसे बीजेपी हर हाल में साधकर रखना चाहती है. गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक की बात करें तो दूसरे नंबर पर पटेल और कुर्मी वोट बैंक आता है. बीजेपी ने कुर्मी समुदाय से ही स्वतंत्र देव सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है तो मौर्या समाज के लिए डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से लेकर स्वामी प्रसाद मोर्य तक बीजेपी के साथ खड़े हैं. यूपी में कुर्मी और मौर्या समाज करीब 13 फीसदी हैं. कुर्मी और मौर्य समुदाय को साधकर बीजेपी ने 2017 का चुनाव जीता था. 

जातिगत आधार पर देखें तो यूपी के सोलह जिलों में कुर्मी और पटेल वोट बैंक छह से 12 फीसदी तक है. इनमें मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और बस्ती जिले प्रमुख हैं. वहीं, ओबीसी की मौर्या जाति का तेरह जिलों का वोट बैंक सात से 10 फीसदी है. इन जिलों में फिरोजाबाद, एटा, मैनपुरी, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर देहात, जालौन, झांसी, ललितपुर और हमीरपुर हैं. 

यूपी में ओबीसी के ये निर्णयक वोट

ओबीसी में एक और बड़ा वोट बैंक लोध जाति का है, जो बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है. यूपी के 23 जिलों में लोध वोटरों का दबदबा है, जिनमें रामपुर, ज्योतिबा फुले नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, महामायानगर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा ऐसे जिले हैं, जहां लोध वोट बैंक पांच से 10 फीसदी तक है. वहीं, मल्लाह समुदाय भी करीब 6 फीसदी है, जो कि गंगा नदी के किनारे स्तिथि जिलों में हैं. 

इनके अलावा ओबीसी वोट बैंक में करीब डेढ़ सौ और जातियां हैं, जिन्हें अति पिछड़ों की श्रेणी में रखा जाता है. इन्हें साधने की कवायद में कांग्रेस लगी हुई है. कांग्रेस ने इसीलिए अति पिछ़ड़ा समुदाय रे कानू जाति के अजय कुमार लल्लू को पार्टी की कमान सौंप रखी है. कानू जाति वैश्य समुदाय के तहत आताी है. उनका जिनका पूरा जोर अति पिछड़ा वोटों को कांग्रेस के पाले में लाने का है. ऐसे में देखना है कि सूबे में ओबीसी समुदाय किस पर इस बार के चुनाव में भरोसा जताता है. 

 


 

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