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यूपी उपचुनाव में BJP की प्रतिष्ठा दांव पर, जानिए सियासी समीकरण?

यूपी में सरकार बनने के बाद यह पहला बड़ा मौक़ा है जब चुनाव मोदी की छाया में नहीं बल्कि योगी की इमेज तले लड़ा जाएगा. ऐसे में बीजेपी के लिए पिछले उपचुनाव की तरह सभी सीटें अपने पाले में कर पाना ही किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है.  

दांव पर बीजेपी की प्रतिष्ठा (सांकेतिक फोटो) दांव पर बीजेपी की प्रतिष्ठा (सांकेतिक फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • उपचुनाव में दमखम दिखाने को तैयार पार्टियां
  • बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा बचाने की चुनौती
  • मोदी नहीं योगी के इमेज पर वोट डालेंगे लोग

यूपी की सात विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में सभी सियासी पार्टियां अपना दमखम दिखाने को तैयार हैं. 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इस उपचुनाव को हर पार्टी अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना कर बैठी है. हालांकि जमीनी स्तर पर राजनीतिक पार्टियों की रणनीति अलग-अलग हैं. 2022 के यूपी चुनाव को देखते हुए लोग इस उपचुनाव को अलग-अलग नजरिए से भी देख रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के लिए यह उपचुनाव सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है. क्योंकि मौजूदा समय में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के लिए कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा, रोजगार, महंगाई और कार्यकर्ताओं की नाराजगी के लिहाज से सबसे चुनौतीपूर्ण समय है.

यूपी में सरकार बनने के बाद यह पहला बड़ा मौक़ा है जब चुनाव मोदी की छाया में नहीं बल्कि योगी की इमेज तले लड़ा जाएगा. ऐसे में बीजेपी के लिए पिछले उपचुनाव की तरह सभी सीटें अपने पाले में कर पाना ही किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है.  

हाल के दिनों में हाथरस में हुए दलित लड़की के रेप और हत्या के मामले में योगी सरकार की कानून व्यवस्था विपक्ष और जनता के निशाने पर है. ऐसे मौके पर चुनाव के मैदान में जनता को परखना बीजेपी के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है. उन्नाव के बांगरमऊ की सीट भी बलात्कार आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर के जेल जाने की वजह से खाली हुई है. यहां पर भारतीय जनता पार्टी के लिये जनता को महिला सुरक्षा और कानून व्यवस्था को लेकर समझा पाना आसान नहीं होगा.

तीन नवंबर को होने वाले उपचुनाव से पहले विपक्ष ने सरकार को हाथरस, किसानों के नए कानून, कानून व्यवस्था और बेरोजगारी आदि मुद्दों को लेकर घेर रखा है. ऐसे में यह जानना दिलचस्प होगा कि समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी में से कौन सी पार्टी बीजेपी को टक्कर देने में कामयाब रहती है. 

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उन्नाव का बांगरमऊ सीट 
उन्नाव जिले की बांगरमऊ सीट से भारतीय जनता पार्टी ने श्रीकांत कटियार को खड़ा किया है. वहीं समाजवादी पार्टी ने सुरेश कुमार पाल को, बहुजन समाजवादी पार्टी ने महेश प्रसाद को और कांग्रेस ने महिला उम्मीदवार आरती बाजपेई को मैदान में उतारा है. बांगरमऊ सीट वही सीट है जहां पिछले 50 सालों से बीजेपी ने एक बार भी जीत हासिल नहीं की है. हालांकि बांगरमऊ से पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर समाजवादी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. लिहाजा वह बीजेपी के विधायक हो गए थे. 

कुलदीप सिंह सेंगर वर्तमान में बलात्कार मामले में जेल की सजा काट रहे हैं. बीजेपी के लिए इस सीट की जनता को अपने पक्ष में समझा पाना आसान नहीं होगा. हालांकि सेंगर के पक्ष में साक्षी महाराज खुलकर मैदान में हैं और ना सिर्फ यहां की कैंडिडेट श्रीकांत कटिहार के पक्ष में लगातार प्रचार कर रहे हैं बल्कि बीजेपी के जीतने की पूरी उम्मीद लगाए हैं. अबतक यहां की जनता ने 14 बार विधानसभा के चुनाव में मतदान कर प्रतिनिधियों का चुनाव किया है. जिसमें सबसे अधिक पांच बार कांग्रेस प्रतिनिधित्व को मौका मिला है. उसके बाद समाजवादी पार्टी और फिर बीएसपी को मौका मिला. 

आजादी के बाद प्रथम चुनाव में यह सीट सुरक्षित थी. उसके बाद से यह सामान्य सीट बनी रही है. परंतु बीजेपी नेताओं को एक बार भी बांगरमऊ सीट से विधानसभा जाने का मौका नहीं मिला है. 1962 में आजादी के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में बांगरमऊ की सीट को सुरक्षित रखा गया था. जिसमें कांग्रेस से सेवाराम को सर्वप्रथम सफलता मिली. जबकि कांग्रेस द्वारा आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिये घोषित प्रत्याशी शीला दीक्षित के ससुर गोपी नाथ दीक्षित ने 1969, 1980, 1985, 1991 में सबसे अधिक चार बार विधानसभा चुनाव में विजय प्राप्त किया था.  

इसके बाद इस सीट से तीन बार समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी चुने गए. जिसमें 1993 में अशोक कुमार सिंह, 2007 में कुलदीप सिंह सेंगर और 2012 में बदलू खां ने बाजी मारी. वर्तमान में भी यह सीट समाजवादी पार्टी के पास ही है. जबकि बीएसपी के राम शंकर पाल ने 1996 और 2002 में जीत हासिल की थी. 

बीजेपी के नजरिए से यह सीट उनके लिये ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं रही है. अभी तक बीजेपी का कोई भी प्रत्याशी इस सीट पर अपनी फतह हासिल नहीं कर पाया है. सामान्य सीट होने के बाद भी बीजेपी का बांगरमऊ सीट पर कब्जा न कर पाना अपने आप में यक्ष प्रश्न है. बीजेपी को दो बार 1993 और 1996 में दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा. 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बदलू खां ने बीएसपी के इरशाद खां को लगभग 13 हजार मतों से हरा कर जीत हासिल की थी, जबकि बीजेपी के रामशंकर पाल को तीसरा और कांग्रेस के अशोक कुमार सिंह बेबी को चौथा स्थान हासिल हुआ था.

विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं का जिक्र किया जाये तो बाढ़, कच्ची शराब, बिजली, बेरोजगारी और नागरिक सुरक्षा यहां की बड़ी समस्यायें हैं. बाढ़ की विभीषिका से कटरी क्षेत्र के लोगों की रात की नींद गायब रहती है. विगत लोकसभा चुनाव में बीजेपी सांसद ने अच्छी खासी बढ़त बना कर सफलता अर्जित की थी. साक्षी महाराज को बांगरमऊ विधानसभा से 80500 मत मिले थे, जबकि समाजवादी पार्टी के अरूण कुमार शुक्ला को लगभग 35837, बृजेश पाठक को 33487 औरअन्नू टण्डन को 25096 वोट मिला था. 

इससे स्पष्ट है कि बांगरमऊ विधानसभा में नरेन्द्र मोदी का सितारा बुलन्द था. लेकिन विधानसभा का गणित लोकसभा से अलग होता है. इसके साथ ही जनता की प्राथमिकताएं भी अलग होती हैं. इस चुनाव में फैसला मोदी की लोकप्रियता का नहीं बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन का होगा. 

बांगरमऊ में प्रत्याशियों का प्रोफाइल

श्रीकांत कटियार- बीजेपी प्रत्याशी
बांगरमऊ उपचुनाव में बीजेपी प्रत्याशी 49 वर्षीय श्रीकांत कटियार के पास लगभग 72 लाख की चल, अचल संपति है. उनका किसी प्रकार का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है. 2019-20 में दाखिल आयकर रिटर्न में 2.43 लाख की आय दिखाई है. आय का मुख्य श्रोत व्यापार और कृषि है. 

महेश पाल- बीएसपी
बीएसपी प्रत्याशी ने संपत्ति और अपराधिक इतिहास का जो ब्योरा शपथ पत्र में दिया उसके अनुसार वह लगभग तीन करोड़ की चल अचल संपत्ति के मालिक हैं. लखनऊ में उनके ऊपर दो आपराधिक मुकदमा भी दर्ज हैं जिसमें मारपीट का भी आरोप है. दोनों ही मुकदमे न्यायालय में विचाराधीन हैं. 

बीएसपी प्रत्याशी ने नामांकन में अपने ऊपर चल रहे मुकदमे- धारा 325, 323, 504 व 506 भारतीय दंड संहिता में मुकदमा दर्ज होने की जानकारी दी है. प्रत्याशी ने बताया है कि सभी मामले लंबित हैं. किसी में भी वह दोष सिद्ध नहीं है. 

आरती बाजपेई- कांग्रेस
बांगरमऊ उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी आरती बाजपेयी करोड़पति प्रत्याशी हैं. नामांकन के दौरान उन्होंने अपनी चल, अचल संपति की वर्तमान कीमत 3.43 करोड़ रुपये बताई है. आरती बाजपेयी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है. 53 वर्षीय आरती बाजपेयी हिंदी व संस्कृत से एमए किया है. कांग्रेस ने इस इलाके में महिला उम्मीदवार को जानबूझकर उतारा है. क्योंकि इसी सीट से कुलदीप सिंह सेंगर रेप मामले में जेल की सजा काट रहा है. यहां की जनता महिला सुरक्षा को लेकर सरकार से नाराज है. ऐसे मे कांग्रेस एक साफ छवि की महिला को मैदान में उतार कर महिला सुरक्षा की मुहिम का संदेश देना चाह रही है. 

सुरेश पाल- एसपी
बांगरमऊ उपचुनाव में 59 वर्षीय  एसपी प्रत्याशी सुरेश पाल के पास लगभग 9 करोड़ की चल, अचल संपति है. आपराधिक छवि वाले पाल को टिकट मिलने पर एसपी के बड़े धड़े ने पार्टी नेतृत्व से कई बार शिकायत भी की लेकिन उनका टिकट नहीं कटा. पाल के  खिलाफ कानपुर चकेरी थाने में मारपीट, जालसाजी समेत अन्य धाराओं में पांच मुकदमे दर्ज हैं. जो कि कोर्ट में विचाराधीन है.

सुरेश पाल पर कानपुर चकेरी थाने में 2001, 2012, 2006, 2020 और 2009 में जालसाजी, सरकारी जमीन पर कब्जे समेत अन्य धाराओं में मुकदमे दर्ज हैं. जो न्यायालय में विचाराधीन हैं.  

घाटमपुर- कानपुर
कानपूर के घाटमपुर उपचुनाव में  बीजेपी को एसपी बीएसपी से ज्यादा कड़ी टक्कर कांग्रेस दे रही है. तीन नवंबर को होने वाले उपचुनाव में  बीजेपी प्रत्याशी उपेंद्र पासवान को एसपी बीएसपी से ज्यादा कड़ी टक्कर कांग्रेस प्रत्यासी कृपाशंकर संखवार से मिल रही है. यह सीट बीजेपी मंत्री कमलरानी वरुण के निधन से खाली हुई है जिनकी कोरोना से मौत हो गई थी. कमलारानी  बीएसपी की  सरोज  कुरील को 45 हजार से ज्यादा वोटों से हराकर जीती थीं. 

यहां कुल सवा तीन लाख वोटर हैं. यहां से कुल 6 प्रत्याशी चुनाव मैदान में है. जिसमें बीजेपी के उपेंद्र पासवान, एसपी के इंद्रजीत कुरील, बीएसपी से कुलदीप पासवान और कांग्रेस से डाक्टर कृपाशंकर संखवार के बीच असली लड़ाई है.  

बीजेपी के उपेंद्र पासवान कानपुर में आरएसएस से जुड़े एक स्कूल के टीचर हैं. वह घाटमपुर से नहीं कानपुर शहर से जुड़े हैं. कांग्रेस के इंद्रजीत, यहां पहले विधायक रह चुके हैं. बीजेपी को मुख्य टक्कर कांग्रेस प्रत्याशी से ज्यादा मिलती दिख रही है. 

दरअसल कृपाशंकर डाक्टर हैं वह टिकट मिलने के कुछ दिन पहले ही इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल हुए हैं. उनको टिकट दिलाने में घाटमपुर क्षेत्र से सांसद रह चुके राकेश सचान और पूर्व सांसद राजाराम पाल की मुख्य भूमिका रही है. घाटमपुर में हरिजनों के साथ साथ मुस्लिम और सचान वोट काफी हैं. कृपाशंकर का जन्म भी सचान परिवार में हुआ था, लेकिन बाद में उनको संखवार परिवार से गोद ले लिया था. इसलिए राकेश सचान ने भी इनको जिताने में पूरी प्रतिष्ठा लगा दी है. यहां मुस्लिम वोटर भी काफी हैं, जिसका झुकाव एसपी के मुकाबले कांग्रेस पर ज्यादा दिख रहा है. 

वैसे बीजेपी ने भी अपने प्रत्याशी के लिए सारा जोर लगा रखा है. स्थानीय सांसद देवेंद्र सिंह भोले और शहर के कई विधायक यहां दिन रात पार्टी के लिए प्रचार कर रहे हैं. खुद मुख्यमंत्री भी सभा करके जनता को सरकार की उपल्बधियों के बारे में बता रहे हैं. उधर एसपी प्रत्याशी भी अपने पुराने समीकरणों के सहारे मैदान में हैं. बीएसपी के सतीश मिश्रा खुद ब्राह्मण वोटर्स को लुभाने के लिए सभा कर रहे हैं. 


देवरिया सदर- देवरिया 
देवरिया सदर सीट से बीजेपी विधायक जनमेजय सिंह के असामयिक निधन के बाद यह सीट खाली हुई है. यहां से सभी मुख्य दलों ने ब्राह्मण कार्ड खेलते हुए ब्राह्मण प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है. यहां लगभग 50 हजार ब्राह्मण वोटरों की संख्या है. एक तरफ एसपी से कद्दावर नेता ब्रह्माशंकर त्रिपाठी मैदान में है तो कांग्रेस ने अपने एक कार्यकर्ता मुकुंद भास्कर मणि त्रिपाठी को टिकट दिया है. जबकि बीएसपी ने अभयनाथ त्रिपाठी को मैदान में उतारा है, जो 2017 के भी बीएसपी से प्रत्याशी रहे है. अंत में सभी पार्टियों के प्रत्याशी को देखते हुए बीजेपी ने भी ब्राह्मण चेहरा के रूप में डॉक्टर सत्य प्रकाश मणि त्रिपाठी को टिकट देकर इस चुनाव को दिलचस्प बना दिया है.

हालांकि बीजेपी ने दिवंगत विधायक जनमेजय सिंह के बेटे अजय प्रताप उर्फ पिंटू सिंह जो पिछड़ी जाति से आते है टिकट देने का आश्वासन दिया था, लेकिन सभी प्रमुख दलों द्वारा ब्राह्मण कैंडिडेट उतारने के बाद बीजेपी ने पिंटू का टिकट काट दिया. जिसके बाद बागी पिंटू निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में कूद पड़े हैं और इन्हें ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुहेल देव, अपना दल जैसी छोटी-छोटी आठ पार्टियां समर्थन दे रही है.

मल्हानी- जौनपुर 
मल्हनी सीट पर बाहुबली धनंजय सिंह और एसपी प्रत्याशी के बीच कांटे की टक्कर दिखायी देती है. इस सीट पर कुल 16 प्रत्याशी  होने के चलते  दो ईवीएम मशीनें लगायी जाएंगी. उपचुनाव में जौनपुर की मल्हनी सीट एसपी बीजेपी और बाहुबली धनंजय सिंह के लिए प्रतिष्ठा की सीट बन गई है. इस सीट पर अभी तक के आकलन में पूर्व सांसद धनंजय सिंह और एसपी प्रत्याशी लकी यादव के बीच  सीधी लड़ाई दिखाई दिखाई दे रही है. निर्दलीय प्रत्याशी धनंजय सिंह को बीजेपी का वोट बैंक माना जाने वाला अति पिछड़ा, अति दलित, क्षत्रिय और कुछ ब्राह्मणों से वोट मिलने के आसार हैं. इस वजह से यहां बीजेपी पीछे दिखाई दे रही है. 

यह सीट एसपी के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री पारसनाथ यादव के निधन से खाली हुई है. इसलिए समाजवादी पार्टी ने उनके पुत्र लकी यादव को सहानुभूति मतों के चलते मैदान में उतारा है. पारसनाथ यादव एसपी के संस्थापक  सदस्य और  मुलायम सिंह यादव  के करीबी  रहे हैं. करीबी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव से नाराजगी के बावजूद मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश की 2 विधानसभा सीटों पर प्रचार किया था, जिसमें एक शिवपाल यादव के लिए जसवंत नगर में और दूसरी मल्हनी सीट पर पारसनाथ यादव के लिए वोट मांगा था. पारसनाथ यादव दो बार सांसद चार बार मंत्री और छठवीं बार विधानसभा के लिए चुने गए थे.

बुलंदशहर सदर - बुलंदशहर 

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के सदर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव पर बीजेपी के एमएलए रहे वीरेंद्र सिरोही की पत्नी उषा सिरोही प्रत्याशी हैं. वीरेंद्र सिरोही इस सीट पर दो बार चुनाव लड़े एक बार बीएसपी के प्रत्याशी हाजी अलीम से 2012 में चुनाव हारे. दूसरी बार 2017 में हाजी अलीम को 18 हजार वोटों से हराकर एमएलए बने. उनकी अचानक मृत्यु से यह सीट खाली हो गई थी. इसी वजह से उपचुनाव हो रहे हैं. बीजेपी ने उनकी पत्नी उषा सिरोही को इस सीट पर प्रत्याशी बनाया है. बीजेपी का चुनाव देखा जाए तो बीएसपी के प्रत्याशी हाजी यूनुस से है.

हाजी यूनुस वर्तमान में सदर ब्लॉक प्रमुख हैं और पूर्व बीएसपी विधायक हाजी अलीम के भाई हैं. यहां पर एसपी-आरएलडी के संयुक्त प्रत्याशी प्रवीण कुमार हैं, जो कि पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री जगवीर सिंह के पुत्र हैं. इसके अलावा कांग्रेस के प्रत्याशी सुशील चौधरी हैं जो पूर्व में भी नगर पालिका चेयरमैन का चुनाव लड़ चुके हैं और वर्तमान में कांग्रेस के पीसीसी सदस्य भी हैं. 


 

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