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आंखों की रोशनी से लाचार 'मृत' युवती बोली- 'साहब, जिंदा हूं मैं'

गाजीपुर के सदर ब्लॉक के रसूलपुर गांव की रहने वाली 24 साल की तिजिया को आखों से दिखाई नहीं देता है. तिजिया की यही परेशानी कम नहीं थी कि सरकारी महकमे की ओर से उस पर और गाज गिरा दी गई.

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गाजीपुर डीएम ऑफिस
गाजीपुर डीएम ऑफिस

सरकारी लालफीताशाही जो ना करा दे वो कम है. ये चाहे तो जीते-जागते इंसान को मरा हुआ मान ले. अब भले ही वो इंसान गले में तख्ती डालकर घूमता रहे, 'मैं जिंदा हूं.' ऐसा ही मामला गाजीपुर के मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) के दफ्तर पर दिखा. यहां आंखों की रौशनी से लाचार एक युवती के जिंदा होने के बावजूद उसे मरा हुआ मान कर उसकी पेंशन रोक दी गई.

महिला को आंखों की रोशनी नहीं होने के नाते दी जाने वाली पेंशन ग्रामीण बैंक से मिलती थी. अब ये महिला सरकारी बाबुओं से गुहार लगाते-लगाते थक गई है, लेकिन कोई उसे सुनने को तैयार नहीं है.

गाजीपुर के सदर ब्लॉक के रसूलपुर गांव की रहने वाली 24 साल की तिजिया को आखों से दिखाई नहीं देता है. तिजिया की यही परेशानी कम नहीं थी कि सरकारी महकमे की ओर से उस पर और गाज गिरा दी गई. ग्रामीण बैंक से मिलने वाली पेंशन तिजिया के लिए बड़ा सहारा था, बीते डेढ़ साल से सरकारी बाबुओं की मेहरबानी से ये सहारा भी उससे छीन लिया गया. तिजिया को सरकारी कागजात में मरा हुआ दिखाकर उसकी पेंशन रोक दी गई. अब तिजिया हर सरकारी अधिकारी के सामने जाकर कह रही है कि 'साहब, मैं जिंदा हूं, मैं जिंदा हूं.'

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गले में लटकाई 'मैं जिंदा हूं' की तख्ती
तिजिया के परिवार में उसके माता-पिता हैं. पिता खेतीबाड़ी से थोड़ा बहुत ही कमा पाते हैं. घर का गुजारा बहुत मुश्किल से चलता है. तिजिया की पेंशन बंद होने से इस परिवार की दिक्कतें और बढ़ गईं . जब कहीं कोई फरियाद नहीं सुनी गई तो तिजिया अपने पिता रामधनी यादव और सामाजिक कार्यकर्ता ब्रजभूषण दूबे के साथ गाजीपुर में विकास भवन पहुंच गई. तिजिया के गले में 'मैं जिंदा हूं' की तख्ती भी टंगी थी.

मीडिया को देखकर घबराए सीडीओ
मीडिया कैमरों को इस घटना को कवर करते देख सीडीओ अनिल कुमार पांडे खिन्न दिखाई दिए. उन्होंने अनमने मन से हाथ जोड़कर कैमरे पर कुछ कहने से इनकार कर दिया. सीडीओ ने ये भी कहा कि ये लोग राजनीति कर रहे हैं, अकेले आए होते इनका काम कर देता. सीडीओ ने जांच कराने की हामी भरी, लेकिन कहा कि इस मामले में बोलने के लिए जिलाधिकारी ही अधिकृत हैं.

सरकारी बाबुओं ने नहीं दिखाई हमदर्दी
तिजिया खुद तो कुछ नहीं बोल पा रही थी, लेकिन साथ आए सामाजिक कार्यकर्ता ब्रज भूषण दूबे ने कहा, 'अनेक बार फरियाद लगाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ तो सीडीओ के दरवाजे तक आना पड़ा. लेकिन दृष्टिहीन युवती को लेकर भी उन्होंने संवदेनशीलता नहीं दिखाई. सीडीओ अब कह रहे हैं कि फोन पर ही बता देते तो काम हो जाता. बार-बार कहने पर भी पेंशन नहीं शुरू की जा रही. उलटे आरोप लगाया जा रहा है कि हम राजनीति कर रहे हैं.' अब देखना है कि सरकारी बाबू कब जागते हैं और जीती-जागती तिजिया के नाम के आगे अपने रिकॉर्ड में लिखा 'मृतक' हटाते हैं.

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