हैदराबाद के एलबी स्टेडियम में आयोजित तेलंगाना केसरी प्रतियोगिता इस बार सिर्फ एक खेल मुकाबला नहीं रही, बल्कि हिम्मत, संघर्ष और जज़्बे की ऐसी मिसाल बन गई जिसने हर किसी को भावुक कर दिया.
28 साल के अबूबकर बिन अब्दुल्ला बामस ने लगातार दूसरी बार तेलंगाना केसरी का खिताब जीतकर अपनी ताकत और साहस का लोहा मनवाया. कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुके अबूबकर ने इस बार जो किया, उसने उन्हें लोगों के दिलों का असली हीरो बना दिया.
सेमीफाइनल में हुआ बड़ा हादसा
टूर्नामेंट के दौरान अबूबकर ने कुल 6 कठिन मुकाबले लड़े. शुरुआती चार राउंड जीतने के बाद 5वें राउंड यानी सेमीफाइनल में उनका मुकाबला साई किरण से हुआ. इसी मुकाबले के दौरान उनके सिर पर गंभीर चोट लगी और सिर से लगातार खून बहने लगा. स्टेडियम में मौजूद दर्शक और आयोजक घबरा गए. कई लोगों को लगा कि अब वह आगे नहीं खेल पाएंगे. लेकिन अबूबकर ने हार मानने से साफ इनकार कर दिया.
फाइनल में मुस्तफा को दी मात
सिर पर गहरी चोट और लगातार दर्द के बावजूद उन्होंने मुकाबला छोड़ा नहीं. प्राथमिक उपचार के बाद, महज आधे घंटे के भीतर वह छठे और अंतिम मुकाबले यानी फाइनल के लिए फिर अखाड़े में उतरे, जहां उनका सामना मुस्तफा बिन अली से था.
सिर पर पट्टी, चेहरे पर दर्द और शरीर में थकान होने के बावजूद अबूबकर ने पूरे जोश के साथ फाइनल लड़ा. हर दांव के साथ उनका जज़्बा दिखाई दे रहा था. आखिरकार उन्होंने फाइनल भी जीत लिया और लगातार दूसरी बार तेलंगाना केसरी का खिताब अपने नाम कर लिया.
उनकी इस बहादुरी को देखकर पूरा स्टेडियम तालियों से गूंज उठा. दर्शकों ने इसे सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि साहस और जुनून की मिसाल बताया.
असदुद्दीन ओवैसी ने की तारीफ
इस बीच AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद Asaduddin Owaisi, ने भी हाल ही में अबूबकर बामस की हिम्मत की सराहना की. उन्होंने कहा कि ऐसे खिलाड़ियों को सरकार और समाज दोनों से समर्थन मिलना चाहिए, क्योंकि ये युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं.
अबूबकर और उनके समर्थकों ने सरकार से पहलवानों के लिए बेहतर सुविधाएं, आर्थिक सहायता और प्रोत्साहन देने की मांग की है. उनका कहना है कि कुश्ती जैसे पारंपरिक खेलों में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन खिलाड़ियों को पर्याप्त ट्रेनिंग, मेडिकल सपोर्ट और आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाता.
उन्होंने राज्य सरकार से आधुनिक प्रशिक्षण केंद्र, बेहतर चिकित्सा सुविधाएं, आर्थिक मदद और नौकरी के अवसर उपलब्ध कराने की अपील की ताकि खिलाड़ी देश और राज्य का नाम रोशन कर सकें.
अबूबकर की यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि यह साबित करती है कि असली चैंपियन वही होता है, जो दर्द से नहीं, अपने हौसले से पहचाना जाता है.