इतिहास की समीक्षा हमेशा वर्तमान को करते रहना चाहिए ताकि भविष्य के सामने इतिहास शर्मिंदा न हो. दरअसल इतिहास जब रचा जा रहा होता है तब उसे ये पता ही नहीं होता या वो जानबूझकर ये स्वीकार ही नहीं करना चाहता कि आने वाला कल उसके सामने क्या चुनौतियां पेश कर सकता है, क्योंकि वो तो मौजूदा कालखंड की परिस्थितियों, प्रभाव और कहीं कहीं पर पूर्वाग्रहों की स्याही से लिखा जा रहा होता है.
सही मायनों में जब नए दौर की नई सोच इतिहास का मूल्यांकन अपने नज़रिए से करती है तब इतिहास करवट ज़रूर लेता है और तब इतिहास की तहों में दफ़्न कई ऐसे किरदार सामने आते हैं जिनके साथ गुजरे वक्त ने नाइंसाफी की.
आज़ादी का इतिहास जमाने के सामने उतना ही है, जितना पढ़ने की इजाज़त दी गई या जितना सामने आने दिया गया. लेकिन इससे उन शहीदों की शहादत का मान कम नहीं हो जाता जो इतिहास के महाकाव्यों में चंद लाइनों या भूली बिसरी एक तस्वीर से ज़्यादा कहीं दर्ज़ नहीं हैं.
ऐसे ही सरफरोशों को गुमनामी के अंधेरों की गुलामी से सच की रोशन आज़ादी देने की कोशिश है.. वंदे मातरम् जिसे देखा जा सकता है हर शनिवार और रविवार रात 10 बजे सिर्फ आजतक पर.
न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना
मुझे वर दे यही माता रहूँ भारत पे दीवाना
करुँ मैं कौम की सेवा पडे़ चाहे करोड़ों दुख
अगर फ़िर जन्म लूँ आकर तो भारत में ही हो आना
---- राम प्रसाद बिस्मिल