केंद्रीय शैक्षणिक संस्था (शिक्षक के कॉडर में आरक्षण) विधेयक 2019 लोकसभा में सोमवार को पास हो गया है. इसके मुताबिक केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों में डिपार्टमेंट की जगह विश्वविद्यालय या कॉलेज को यूनिट मानकर रिजर्वेशन लागू किया जाएगा. इसके बाद अब देश भर में शिक्षकों की नियुक्तियां होंगी और आरक्षण दिया जाएगा.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2017 में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) को एक आदेश दिया था. जिसमें कहा गया था कि डिपार्टमेंट को यूनिट मानकर आरक्षण की गणना की जाए और उसके आधार पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण दिया जाए. जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हरी झंडी दे दी थी. लेकिन इस बिल के पास होने के बाद अब आरक्षण डिपार्टमेंट की जगह विश्वविद्यालय या कॉलेज को यूनिट मानकर लागू किया जाएगा.
केंद्रीय शैक्षणिक संस्था (शिक्षक के कॉडर में आरक्षण) विधेयक 2019 सामान्य वर्ग के गरीब शिक्षकों को भी उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान देता है. हालांकि मार्च 2019 में जो अध्यादेश लागू किया गया था, उसमें इनके लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था. विधेयक के दोनों सदन में पास होने के बाद राष्ट्रपति के पास अनुमोदन के लिए जाएगा. सरकार दावा कर रही है कि इसके बाद 7000 शिक्षकों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो जाएगा.
क्या कहता है बिल
बिल के मुताबिक अब एक डिपार्टमेंट को यूनिट मानने की जगह केंद्रीय शैक्षिक संस्थान को एक यूनिट माना जाएगा. केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान के रूप में वे संस्थान आते हैं जिसकी स्थापना और फंडिंग केंद्र सरकार के द्वारा होती है. इसका उदाहरण बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी है. बिल का प्रावधान अनुसंधान संस्थानों, राष्ट्रीय और सामरिक महत्व के संस्थानों में लागू नहीं होगा. बिल की आठवीं अनुसूची में यह बताया गया है कि ऐसे 8 संस्थान हैं जिन पर यह लागू नहीं होगा. सरकार बता चुकी है कि केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में खाली पदों पर भर्ती के लिए 2019-20 और 2020-21 के लिए 717.83 करोड़ आवंटित हो चुका है.
डिपार्टमेंट को यूनिट मानने पर प्रतिनिधित्व कम होगा
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के शिक्षक लगातार इस बात की गुहार लगाते रहे हैं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में उनका प्रतिनिधित्व कम है. मानव संसाधन मंत्रालय ने 2017-18 में ऑल इंडिया सर्वे फॉर हायर एजुकेशन (AISE) कराया था. इसके मुताबिक कुल शिक्षकों की संख्या 12,84,755 थी. जिसमें सामान्य वर्ग के शिक्षक 56.8 फीसदी थे. जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व क्रमश: 8.6 फीसदी और 2.27 फीसदी था. जबकि ओबीसी का प्रतिनिधित्व 32.3 फीसदी था. सर्वे में यह बात सामने आई कि डिपार्टमेंट को यूनिट मानकर आरक्षण देने में आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व और घटेगा, जबकि यूनिवर्सिटी या कॉलेज को यूनिट मानने पर उनका प्रतिनिधित्व बढ़ेगा.
वर्तमान में अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसदी और ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है. ऐसे में अगर किसी डिपार्टमेंट में 1 पद खाली है तो उसकी भर्ती में आरक्षण लागू नहीं हो पाता है, क्योंकि इसे 100 फीसदी माना जाएगा. उदाहरण के तौर पर यदि किसी डिपार्टमेंट में 6 पद खाली हैं और अगर एक अनुसूचित जाति की भर्ती होती है तो वह 16.6 फीसदी आरक्षण हो जाएगा. ऐसे में एक अनुसूचित जाति की भर्ती के लिए कम से कम 7 पद होने चाहिए. उसी तरह अनुसूचित जनजाति के एक पद को भरने के लिए कम से कम 14 पद होने चाहिए क्योंकि उनका आरक्षण 7.5 फीसदी है और ओबीसी के एक पद पर भर्ती के लिए कम से कम 4 पद खाली होना चाहिए.