सुप्रीम कोर्ट ने बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा के मामले में फैसला सुनाते हुए कोलकाता स्थित एएमआरआई हॉस्पिटल के डॉक्टरों को इलाज में लापरवाही का दोषी ठहराया था. साथ ही पीड़ित कुणाल साहा को 6 करोड़ 8 लाख रुपये का मुआवजा 6 फीसदी सालाना की ब्याज दर से देने का आदेश दिया था.
अगर डॉक्टर इलाज में लापरवाही करता है और मरीज की मौत हो जाती है या फिर उसको गंभीर समस्या पैदा हो जाती है, तो परिजनों को डॉक्टर से मारपीट करने की जरूरत नहीं है. ऐसे डॉक्टर को कानून के दायरे में रहकर सबक सिखाया जा सकता है. आप डॉक्टर, हॉस्पिटल, नर्सिंग होम और हेल्थ सेंटर के खिलाफ केस कर सकते हैं.
क्रिमिनल और सिविल दोनों केस करने का विकल्प
अगर आप आपराधिक (क्रिमिनल) केस करते हैं, तो डॉक्टर को जेल हो सकती है. यदि आप दीवानी (सिविल) केस करते हैं, तो कोर्ट आपको मोटा मुआवजा दिला सकता है. ऐसे मामले में कोर्ट पीड़ित पक्ष को ज्यादा से ज्यादा मुआवजा दिलाने की कोशिश करता है, ताकि डॉक्टरों के अंदर अपनी ड्यूटी के प्रति लापरवाही बरतने पर डर पैदा हो सके.
बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ऐतिहासिक फैसला सुना चुका है. इसमें शीर्ष अदालत ने पीड़ित कुणाल साहा को 6 करोड़ रुपये 8 लाख रुपये का मुआवजा दिला चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कुणाल साहा की पत्नी अनुराधा साहा के इलाज में डॉक्टरों ने लापरवाही बरती, जिसके चलते उनकी मौत हो गई. लिहाजा इलाज में लापरवाही बरतने के लिए कोलकाता स्थित एएमआरआई हॉस्पिटल 6 फीसदी ब्याज के साथ 6 करोड़ रुपये 8 लाख रुपये का मुआवजा पीड़ित कुणाल साहा को दे.
क्या कहता है कानून?
अगर आप इलाज में लापरवाही बरतने के लिए डॉक्टर के खिलाफ क्रिमिनल केस करना चाहते हैं, तो भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 304-A, 337 और 338 के तहत प्रावधान किया गया है. इन धाराओं के तहत डॉक्टर को छह महीने से लेकर दो साल तक की सजा और जुर्माना दोनों हो सकते हैं.
डॉक्टर की लापरवाही के मामले में एडवोकेट कालिका प्रसाद काला ‘मानस’ का कहना है कि डॉक्टर की यह लीगल ड्यूटी है कि वो पूरी सावधानी और सतर्कता के साथ मरीज का इलाज करे. अगर डॉक्टर इलाज में लापरवाही करता है, तो उस (डॉक्टर) पर क्रिमिनल और सिविल दोनों तरह की लायबिलिटी बनती है. मतलब इलाज में लापरवाही बरतने पर डॉक्टर के खिलाफ क्रिमिनल कार्यवाही या फिर सिविल कार्यवाही की जा सकती है. इसके अलावा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत भी डॉक्टर के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में मुकदमा किया जा सकता है.
एडवोकेट काला का कहना है कि अगर इलाज में डॉक्टर की लापरवाही के चलते मरीज की मौत हो जाती है, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 304-A के तहत केस किया जा सकता है. अगर कोर्ट डॉक्टर को इलाज में लापरवाही का दोषी पाता है, तो उसको दो साल तक की सजा और जुर्माना दोनों हो सकता है. हालांकि, क्रिमिनल मामले में mens rea यानी क्राइम करने के इरादे (criminal intention) को साबित करना बेहद जरूरी है.
सिविल कार्यवाही ज्यादा सुविधाजनक
एडवोकेट काला का कहना है कि क्रिमिनल कार्यवाही की बजाय सिविल कार्यवाही ज्यादा सुविधाजनक होती है और डॉक्टर की सिविल लायबिलिटी को साबित करना काफी आसान होता है. उन्होंने बताया कि सिविल केस डॉक्टर के साथ ही अस्पताल, हेल्थ सेंटर और नर्सिंग होम के खिलाफ भी किया जा सकता है. इसके अलावा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ता फोरम में भी मुकदमा दायर करके अच्छा खासा मुआवजा पाया जा सकता है. एडवोकेट काला का कहना है कि ऐसे मामले में कोर्ट मृतक मरीज की उम्र, शिक्षा और कमाई के आधार पर मुआवजा तय करता है.
कैसे जानें कि डॉक्टर ने इलाज में लापरवाही बरती या नहीं
एडवोकेट कालिका प्रसाद काला का कहना है कि मरीज के केयर करने की डॉक्टर की लीगल ड्यूटी है. अगर डॉक्टर ने मरीज के केयर करने की ड्यूटी को नहीं निभाया, तो वह इलाज में लापरवाही का दोषी माना जाएगा. डॉक्टर ने अपनी ड्यूटी को निभाया या नहीं, इसको तीन प्वाइंट से समझा जा सकता है......
1. डॉक्टर ने जिस मरीज को इलाज के लिए भर्ती किया है, क्या वह उस मरीज का इलाज करने में सक्षम है या नहीं? मतलब यह कि क्या डॉक्टर के पास उस मरीज का इलाज करने की प्रोफेशनल स्किल है या नहीं? अगर उसके पास प्रोफेशनल स्किल नहीं है और उसने पैसे के लालच में या फिर किसी दूसरे इरादे से मरीज को भर्ती कर लिया है, तो डॉक्टर को इलाज में लापरवाही का जिम्मेदार माना जाएगा.
2. क्या डॉक्टर ने मरीज की बीमारी के अनुसार इलाज किया है या नहीं? मतलब अगर मरीज को टीबी है, तो डॉक्टर को टीबी की ही दवा देनी चाहिए. वह टीबी के मरीज को कैंसर की नहीं दे सकता है. अगर वो ऐसे करता है, तो उसको इलाज में लापरवाही का दोषा माना जाएगा.
3. क्या डॉक्टर पूरी ईमारदारी और सावधानी के साथ मरीज का इलाज कर रहा है या नहीं? अगर डॉक्टर ने पूरी सावधानी के साथ मरीज का इलाज नहीं किया, तो वह इलाज में लापरवाही का जिम्मेदार माना जाएगा.
बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा मामले में क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने 210 पन्नों में अपना फैसला सुनाया. इसमें अमेरिका में रहने वाले डॉक्टर कुणाल साहा अपनी पत्नी अनुराधा साहा के साथ कोलकाता आए थे. इस दौरान अचानक अनुराधा को बुखार हो गया. डॉक्टर कुणाल साहा ने अपनी पत्नी को कोलकाता स्थित एएमआरआई हॉस्पिटल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टर सुकुमार मुखर्जी ने उनको तीन दिन के लिए दिन में दो बार 80 एमजी की डेपोमेड्रॉल खाने को दी.
इसके बाद उनको तीन दिन में हॉस्पिटल में भर्ती भी करा दिया गया. तीन दिन बाद उनकी तबीयत और बिगड़ गई. उनकी त्वचा छिलने लगी और पूरे शरीर की त्वचा उतर गई, लेकिन किसी डॉक्टर ने उनके उचित इलाज के बारे में नहीं सोचा और लापरवाही से दवा देते गए. इसके चलते उनको टॉक्सिक एपीडर्मल नेक्रोलाइसिस हो गया. यह दवा के साइड इफेक्ट्स के कारण होने वाली त्वचा की बीमारी है. इससे इंसान की जान को भी खतरा रहता है.
इसके बाद अनुराधा को मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में ले जाया गया, जहां 28 मई 1998 को उनकी मौत हो गई. इसके बाद जब डॉक्टर कुणाल साहा ने मामले की शिकायत राज्य की मेडिकल काउंसिल में की, तो एएमआरआई हॉस्पिटल के डॉक्टरों को क्लीन चिट दे दी गई. इसके बाद साल 2003 में निचली कोर्ट ने डॉक्टरों को दोषी ठहराया.
इसके बाद मामला कलकत्ता हाईकोर्ट गया और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और 24 अक्टूबर 2013 को शीर्ष अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने हॉस्पिटल को आदेश दिया कि वो कुणाल साहा को 6 करोड़ 8 लाख रुपये का मुआवजा 6 फीसदी सालाना की ब्याज के साथ दे.
इलाज पाना मौलिक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि सभी को इलाज पाने का मौलिक अधिकार है. इलाज पाने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की धारा के तहत आता है. लिहाजा सरकारी अस्पतालों, नर्सिंग होम और पोली-क्लीनिक सभी को बेहतरीन इलाज उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार हैं. आपको बता दें कि मौलिक अधिकारों के हनन पर कोई भी व्यक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सीधे हाई कोर्ट या फिर अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है.