हरियाणा रोडवेज की एक बस में दो बहनों ने जिस बहादुरी से तीन गुंडों का मुकाबला किया उसकी जितनी भी तारीफ की जाए, कम है. उन्होंने बिना किसी भय के अपने ही नहीं एक अन्य महिला यात्री के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को न केवल रोका. उन्होंने उनसे हाथापाई भी की और पूरी शक्ति से उनका प्रतिकार किया. लेकिन दुख का विषय यह रहा कि उनकी मदद को बस में बैठे यात्रियों में कोई नहीं आया.
जब गुंडे उनके साथ छेड़खानी कर रहे थे, अश्लील फब्तियां कस रहे थे और यहां तक कि हाथापाई पर उतर आए तो ऐसा लगा कि बस में कोई मर्द नहीं था. सब के सब मूक दर्शक बने रहे. लड़कियों के साथ बुरा व्यवहार होता रहा, उनके साथ हाथापाई होती रही लेकिन तथाकथित मर्द चुपचाप बैठे रहे, यह निहायत ही शर्मसार कर देने वाली बात है. लेकिन ऐसा सिर्फ हरियाणा में ही नहीं हो रहा है, देश के अन्य राज्यों में भी ऐसी घटनाएं आम हैं.
कई बार सार्वजनिक स्थानों पर छेड़खानी की घटनाएं होती हैं और लोग मूक दर्शक बने रह जाते हैं. लोग प्रतिकार करने से डरते हैं. ऐसा लगता है कि उनकी आत्मा मर गई है. यह बात बहुत ही निराश करने वाली है क्योंकि लोकतंत्र में जब तक जनता नहीं जगेगी तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा. सरकार के बूते इस तरह के अपराधों की समाप्ति का सपना नहीं देखा जा सकता. सरकार चप्पे-चप्पे पर पुलिस नहीं तैनात कर सकती और न ही हर जगह गश्त हो सकती. ऐसे में जनता को ही अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी होगी. जनता जब आवाज बुलंद करेगी तो इस समस्या का निराकरण होगा. हां, यह सच है कि सरकार को अपने तंत्र को मजबूत करना होगा. निर्भया कांड के बाद इस बारे में बड़ी-बड़ी बातें की गईं और सरकारी तंत्र को कसने का भी वादा किया गया. लेकिन आज वही प्रशासन है और वही पुलिस जो हर मामले को दबाने की कोशिश करती है.
बहरहाल इस घटना ने यह बात तो साबित की कि लड़कियां किसी से कमजोर नहीं हैं. रोहतक की इन बहनों ने अपनी बहादुरी से यह साबित कर दिया. लोगों को इस घटना से सबक लेना चाहिए. छेड़खानी जैसी सामाजिक बुराई का खात्मा इस तरह से ही होगा. सब मिलकर आवाज उठाएं तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं हो सकती.