समाज के कदमों से लिपटे कलंक यानी सिर पर मानव मैला ढोने को खत्म करने की मुहिम की वजह से जिन बेजवाडा विल्सन को रमन मैग्सेसे अवॉर्ड मिला, उनको इस बात का मलाल है कि दुनिया ने इस आंदोलन को सराहा और मान्यता दी. लेकिन भारत सरकार के मुंह से या ट्वीटर से एक लफ्ज नहीं निकला. कोई बात नहीं तारीफ ना करें, मान्यता ना दें लेकिन ऐसे उपाय तो कर दें जिनसे ये कलंक मिट जाए.
भारत को कई कदम उठाने की जरूरत
बेजवाडा विल्सन ने कहा कि गांवों में सीवर लाइन नहीं है. शौचालय बनेंगे तो उनकी सफाई कैसे होगी. सेफ्टी टैंक में कब तक एक वर्ग विशेष के लोग सफाई के लिए उतरेंगे. सीवर में कब तक हत्याएं होती रहेंगी. सार्वजनिक शौचालयों में कब तक एक ही वर्ग के लोग सफाई का काम करेंगे. ये तमाम सवाल हैं जिनके जवाब सरकार को देने हैं. ये ठीक है कि सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा का कलंक धुंधला हुआ है.
छोटे शहरों में अब भी मैला ढोने की कुप्रथा
लेकिन गांवों और कस्बों में अब भी ये किसी ना किसी रूप में चल रही है. वहां तक सरकार और समाज के ठेकेदार क्यों नहीं पहुंचे, हमारी चिंता यही है. सफाई मजदूर आंदोलन की वजह से देश के एक खास वर्ग के लाखों परिवारों की महिलाओं और पुरुषों में जागरुकता आई. मैले का टोकरा फेंक कर आगे बढ़े. कितनों को मुक्ति मिली और कितने अब भी इस कलंक की गिरफ्त में हैं, सरकार के पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है.
भारत में जागरुकता अभियान चलाने की जरूरत
उन्होंने कहा कि जब उन्हें मैग्सेसे अवॉर्ड की पेशकश हुई थी तब भी उन्होंने मना किया था. उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने मुझे कुछ साल पहले पद्म पुरस्कार देने की भी पेशकश की थी. लेकिन मुझे लगा कि जिस कुप्रथा के अंत का संकल्प लेकर आंदोलन चल रहा है जब वही खत्म नहीं हुई संकल्प पूरा नहीं हुआ तो सरकार के पद्म पुरस्कार स्वीकारने का कोई मतलब नहीं है. अब इस पुरस्कार से लगा कि दुनिया में ये बताना जरूरी है कि आखिर ये कुप्रथा कैसे खत्म होगी. जागरुकता नई पीढ़ी में कैसे आए, इसके लिए ये पुरस्कार स्वीकार करना पड़ा. क्योंकि ये उस समाज के नाम पुरस्कार है जिसने अपने आप को इस कलंक से छुड़ाने का साहस दिखाया जो पीढ़ियों से इनके कदमों से लिपटा था.