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दिल्ली का रुख कर रहे पंजाब के किसानों की क्या है पांच अहम मांग, सरकार की कोशिशें क्यों नाकाम?

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि बीजेपी की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने किसानों को मनाने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए. केंद्र की ओर से किसान यूनियन नेताओं, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों के बीच दो बार सीधी बातचीत कराई जा चुकी है. हालांकि इनका कोई नतीजा सामने नहीं आया.

प्रदर्शन के दौरान किसान.(फाइल फोटो PTI) प्रदर्शन के दौरान किसान.(फाइल फोटो PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पराली, MSP समेत कई अन्य मुद्दों को लेकर किसानों का प्रदर्शन
  • किसान युनियनों ने दिया था केंद्र सरकार को 15 दिन का वक्त

पंजाब के हजारों किसान, जिनमें से अधिकतर वरिष्ठ नागरिक हैं, पिछले दो महीनों से तीन नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं. इस अवधि में 13 किसानों की जान चली गई, हालांकि ये आंदोलन अब तक शांतिपूर्ण रहा. पंजाब की 31 किसान यूनियनों ने 26 और 27 नवंबर को 'दिल्ली चलो' का आह्वान कर रखा है. ऐसा तीन केंद्रीय कानूनों के विरोध और अन्य मांगे मनवाने के लिए किया गया है. 

कुल 31 में से 13 किसान यूनियनों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ निष्ठा है, जो बीजेपी के खिलाफ हैं. मुख्य धारा की किसान यूनियनों के अलावा कई शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस सहित विभिन्न पार्टियों से संबंधित हैं. गैर कम्युनिस्ट किसान यूनियनों ने सुझाव दिया था कि नए कृषि कानूनों में संशोधन किया जाना चाहिए, वहीं अन्य कानूनों को पूरी तरह वापस लिए जाने की मांग पर अडिग हैं. जानिए किसानों की क्या है पांच अहम मांग...

केंद्रीय कृषि कानून वापस हों 

केंद्र के तीन कृषि सुधार कानूनों को वापस लिए जाना किसानों की सबसे अहम मांग है. किसान यूनियनों का कहना है कि ये कानून किसानों के पक्ष में नहीं हैं, इससे कृषि के निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही जमाखोरों और बड़े कॉर्पोरेट घरानों को फायदा होगा. किसान यूनियनों की ओर से एक धारणा बनाई गई है कि अगर इन कानूनों को लागू किया गया तो उनका आने वाला कल मुसीबतों से भरा हो जाएगा. 

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर लिखित आश्वासन की मांग

किसानों की दूसरी बड़ी मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य से जुड़ी है. उनका कहना है बिल के तौर पर एक लिखित आश्वासन मिलना चाहिए कि भविष्य में सेंट्रल पूल के लिए MSP और पारंपरिक खाद्य अनाज खरीद प्रणाली जारी रहेगी. 

बिजली बिल संशोधन रद्द किया जाए
तीसरी बड़ी मांग बिजली बिल संशोधन को समाप्त करना है. किसान यूनियनों का कहना है कि अगर यह बिल कानून बन जाता है तो वे मुफ्त बिजली की सुविधा खो देंगे. उनके मुताबिक ये संशोधन बिजली के निजीकरण को बढ़ावा देगा और पंजाब में किसानों को दी जाने वाली मुफ्त बिजली सुविधा बंद करा देगा.  

पराली जलाने पर सजा-जुर्माने का प्रावधान वापस हो 

चौथी मांग खेतों में पराली जलाने पर सजा और जुर्माने के प्रावधान से जुड़ी है. इसमें पराली जलाने वाले किसानों को पांच साल की सजा और एक करोड रुपए तक जुर्माना किया जा सकता है. किसानों का कहना है कि इस प्रावधान को खत्म किया जाए.  

गिरफ्तार किसानों को रिहा किया जाए
पंजाब में धान की कटाई का सीजन बस खत्म होने वाला है. धान की पराली जलाने के आरोप में जो किसान गिरफ्तार किए गए, किसान यूनियनों ने उन्हें तत्काल रिहा करने की मांग की है. 

गन्ने के भुगतान का मसला

साफ है कि किसान सिर्फ तीन केंद्रीय कृषि कानूनों का विरोध ही नहीं कर रहे बल्कि अन्य मांगों पर भी जोर दे रहे हैं. कुछ किसान यूनियनें अन्य स्थानीय मुद्दों के साथ भी सामने आईं है. उनकी ये मांग भी है कि उन्हें गन्ने का भुगतान हरियाणा के किसानों के समान की तरह ही किया जाए. 

सरकार की कोशिशें नाकाम!

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि बीजेपी की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने किसानों को मनाने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए. केंद्र की ओर से किसान यूनियन नेताओं, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों के बीच दो बार सीधी बातचीत कराई जा चुकी है. हालांकि इनका कोई नतीजा सामने नहीं आया. बातचीत का एक और दौर 3 दिसंबर, 2020 को निर्धारित किया गया है. केंद्र सरकार पहले साफ कर चुकी है कि तीन कृषि कानूनों को वापस नहीं लिया जा सकता. हालांकि, केंद्र की ओर से किसान यूनियनों की मांगों पर विचार करने के लिए कमेटी बनाए जाने पर सहमति व्यक्त की है.

31 में से 30 किसान यूनियनों ने रेलवे प्लेटफार्मों, स्टेशनों और पटरियों से घेराबंदी हटाने के साथ ही केंद्र सरकार को तथाकथित 'किसान विरोधी' कानूनों को रद्द करने के लिए 15 दिन का वक्त दिया था. साथ ही अल्टीमेटम भी दिया था कि अगर 10 दिसंबर तक उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो 10 दिसंबर से फिर रेलवे ट्रैक्स को बाधित कर दिया जाएगा. गतिरोध जारी है. क्योंकि न तो केंद्र सरकार कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए तैयार है और न ही किसानों को इनके रोलबैक से कम कुछ मंजूर है. 

यहां एक सवाल उठता है कि केंद्रीय कृषि कानूनों पर किसानों की नाराजगी कम करने के लिए पंजाब सरकार की ओर से जो तीन बिल पास किए गए, क्या उनका कोई फायदा हुआ? तो इस सवाल का जवाब हां है. क्योंकि इसने प्रदर्शनकारी किसानों के आक्रोश को कम किया.

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असल में पंजाब की किसान यूनियनें इस तथ्य से अवगत हैं कि पंजाब सरकार द्वारा प्रस्तावित विधेयक हकीकत नहीं बन सकते क्योंकि इन बिलों को राष्ट्रपति की सहमति नहीं मिली है. जबकि, तीन केंद्रीय कृषि कानूनों की कानूनी वैधता है. यही कारण है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और पंजाब की कांग्रेस सरकार की ओर से जो कोशिशें की गईं वो किसानों को लुभाने में नाकाम रहीं. यही वजह है कि उन्होंने सड़कों पर आकर देश की राजधानी का रुख करने और निर्णायक लड़ाई लड़ने का फैसला का.

 

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