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वो 49 दिन का गठबंधन... यूं ही नहीं AAP और कांग्रेस के साथ आने का विरोध कर रहे संदीप दीक्षित और कई कांग्रेस नेता

दिल्ली में 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की मदद से पहली बार सरकार बनाई जो महज 49 दिन ही चल सकी. उसके बाद जब विधानसभा चुनाव हुए तो AAP ने कांग्रेस के वोट बैंक में ऐसी सेंध लगाई जिसे कांग्रेस के स्थानीय नेता आज भी नहीं भूलते हैं.

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AAP के साथ गंठबंधन को लेकर कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व उठा चुका है सवाल
AAP के साथ गंठबंधन को लेकर कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व उठा चुका है सवाल

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर विपक्ष I.N.D.I.A. गठबंधन के तहत जोर- शोर से तैयारियों में जुटा हुआ है. बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन NDA का मुकाबला करने विपक्ष एकजुट हो रहा है और दो बड़ी बैठकें कर चुका है. लेकिन गठबंधन की कोशिशों के इतर इसमें शामिल दल अब आपस में ही तू-तू, मैं-मैं करते नजर आ रहे हैं. दिल्ली में कांग्रेस की एक बैठक के बाद आम आदमी पार्टी और कांग्रेस नेताओं ने जिस तरह से बयानबाजी की उसके बाद सफाई देने के लिए वरिष्ठ नेताओं को सामने आना पड़ा और तब जाकर मामला शांत हुआ. 

जब पहले ही चुनाव में आप को मिली शानदार जीत

अब यह बयानबाजी कब तक शांत रहती है और गठबंधन को लेकर आगे क्या स्थित होती है, इस पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. इन सबके बीच इतिहास पर नजर डाले तो आम आदमी पार्टी 2013 में कांग्रेस के सहारे ही पहली बार दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई थी. भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए अन्ना आंदोलन से निकलकर 2012 में AAP की नींव रखी गई. एक साल बाद जब 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए तो पार्टी ने सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए और कांग्रेस के खिलाफ जमकर प्रचार किया.

जब चुनावी नतीजे घोषित हुए तो हर कोई हैरान रह गया. दिल्ली में 15 साल से सत्ता पर काबिज कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार की शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा. पहली बार चुनावी मैदान में उतरी AAP को 28 सीटें मिली जबकि सत्ताधारी कांग्रेस महज 8 सीटों पर सिमटकर रह गई जबकि बीजेपी 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी. जेडीयू और शिअद को 1-1 सीटें मिली. कांग्रेस के वोट बैंक के एक बड़े हिस्से पर आम आदमी पार्टी ने कब्जा कर लिया.

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कांग्रेस के सहारे पहली बार सीएम बने केजरीवाल

ऐसे समय में जब बीजेपी सत्ता के काफी करीब पहुंच गई थी तो उसे रोकने के लिए कांग्रेस ने उस आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बाहर से समर्थन दे दिया जो उसके वोट बैंक में काफी बड़ी सेंध लगा चुकी थी. कांग्रेस के समर्थन से केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और गठबंधन की सरकार बन गई. हालांकि यह सरकार ज्यादा नहीं चल सकी और 49 दिन बाद ही कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और केजरीवाल सरकार गिर गई. 

बिजली और पानी के वादे ने बदल दी सियासी तस्वीर

49 दिन की केजरीवाल सरकार ने 3 ऐसे फैसले लिए जिन्होंने आगे जाकर AAP के लिए खाद-पानी की तरह काम किया. सबसे पहले AAP सरकार ने चुनाव का सबसे बड़ा वादा काफी पहले पूरा कर दिया. सरकार ने 400 यूनिट तक बिजली के दाम सब्सिडी देकर आधे कर दिए. दूसरा वादा, हर महीने हर घर में 20 हजार लीटर पानी मुफ्त देने का ऐलान कर दिया और सीवर चार्ज भी खत्म कर दिया. इसके साथ ही ज्यादा फीस लेने के लिए दिल्ली के 200 प्राइवेट स्कूलों को नोटिस भेजा.

इन फैसलों से केजरीवाल की छवि जनता के बीच ऐसी बनी कि जो वादे ही नहीं करता है बल्कि उन्हें निभाता भी है. इसका परिणाम 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में देखने को मिला जब AAP ने 70 में से 67 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया. फ्री बिजली और पानी के वादे इतने पॉपुलर हुए कि बाद में कई पार्टियों ने अपने राज्यों के घोषणा पत्र में भी शामिल कर दिए. 

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कांग्रेस को AAP ने पहुंचाया सबसे अधिक नुकसान

इसके बाद जब 2015 में दिल्ली विधानसभा का चुनाव हुआ तो AAP ने 70 में 67 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया. यह दिल्ली विधानसभा चुनाव में किसी भी दल की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी. यहां गौर करने वाले बात ये थी कि AAP ने सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस को किया और उसके वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगाई थी. दिल्ली से निकलकर AAP देश के अन्य राज्यों में पहुंची और फिर पंजाब में भी कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया. आज की तारीख में पार्टी के गुजरात में पांच और गोवा में 2 विधायक हैं.

आप की सेंधमारी को भूला नहीं है स्थानीय नेतृत्व

दिल्ली, पंजाब और गुजरात में जिस तरह AAP ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई है उसे स्थानीय नेतृत्व भूला नहीं है. यही वजह है कि स्थानीय नेतृत्व आज भी समय-समय पर AAP के साथ गठबंधन का विरोध करते रहता है. इसकी एक झलक उस समय देखने को मिली जब बीते दिनों जब दिल्ली में कांग्रेस की एक बैठक हुई. इस बैठक में राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, केसी वेणुगोपाल, दीपक बाबरिया मौजूद रहे. बैठक के बाद जब कांग्रेस नेता अलका लांबा बाहर आई तो उन्होंने मीडिया को एक ऐसा बयान दिया जिससे आम आदमी पार्टी ही नहीं बल्कि लोग भी हैरान रह गए. 

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लांबा के बयान से उठे सवाल

अलका लांबा ने कहा, 'इस बैठक में दिल्ली में संगठन को मजबूत करने और आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारी पर चर्चा हुई. तीन घंटे चली बैठक में आदेश हुआ है कि हमें सातों सीटों पर, मजबूत संगठन के साथ हर नेता को आज से, अभी से निकलना है.  7 महीने हैं और दिल्ली में 7 लोकसभा सीटें हैं. जिसकी दिल्ली उसका देश होता है, ये इतिहास बताता है. ये कहा गया कि सातों पर तैयारी रखनी है और मजबूती से अपनी बात रखनी है. जिसको जो भी जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी वो उसे निभाएगा. अभी यह फैसला नहीं हुआ है कि हम कितने पर लड़ेंगे. अब लोग भाजपा के मजबूत विकल्प के रूप में कांग्रेस को देख रहे हैं.'

आप का पलटवार

जैसे ही लांबा का यह बयान आया तो आप ने भी पलटवार करने में देरी नहीं लगाई. आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने कहा कि गठबंधन के लिए कांग्रेस हमारे पास आई थी, I.N.D.I.A. अलायंस की बैठक में जाने का मतलब नहीं है. मामले ने तूल पकड़ा तो कांग्रेस को सफाई देनी पड़ी और दिल्ली कांग्रेस प्रभारी दीपक बाबरिया ने इसका खंडन करते हुए कहा कि वह अधिकृत प्रवक्ता नहीं, बैठक में ऐसी चर्चा नहीं हुई. इसके बाद AAP के तेवरों में भी नरमी देखी गई.

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संदीप दीक्षित की मुखालफत

अब ऐसे समय में जब एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ AAP के गठबंधन की बात हो रही है तो कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व चाहे वो पंजाब में हो या फिर दिल्ली में, वह विरोध पर उतर आया है. पार्टी की स्थानीय इकाईयों का मानना है कि AAP ने सर्वाधिक नुकसान कांग्रेस को पहुंचाया है, तो उसके साथ गठबंधन ना करके अकेले चुनाव लड़ा जाए. दिल्ली प्रदेश के नेता संदीप दीक्षित ने खुलकर  AAP की मुखालफत करते हुए कहा कि 77 में जो बहुत बड़ी भूल उस समय के दलों ने करी थी जनसंघ को समर्थन देकर, क्या हम ऐसी भूल तो नहीं कर रहे हैं  AAP को समर्थन देकर? उन्होंने कहा कि पार्टी का फैसला पार्टी और देशहित में होना चाहिए. वहीं कांग्रेस नेता अजय माकन भी आप पर तीखा निशाना साध चुके हैं.

पंजाब यूनिट भी कर चुकी है विरोध
इतना ही नहीं कांग्रेस की पंजाब यूनिट भी आम आदमी पार्टी के साथ गंठबंधन का विरोध कर रही है.  राज्य पार्टी प्रमुख अमरिंदर सिंह वारिंग ने AAP पर अपनी पार्टी के नेताओं को निशाना बनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि पंजाब के पूर्व डिप्टी सीएम ओपी सोनी को मान सरकार ने जबरन जेल में डाल दिया. पिछले महीने ही वारिंग ने ऐलान किया कि पंजाब में कांग्रेस और AAP के बीच कोई समझौता नहीं हो सकता. 

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ऐसे में अब यह देखने वाली बात यह होगी कि 2024 लोकसभा चुनाव से पहले सीटों के बंटवारे को लेकर AAP और कांग्रेस में किस तरह से सहमति बनती है. लेकिन हालिया समय में कांग्रेस नेताओं के बयान सामने आए हैं उससे साफ है कि I.N.D.I.A. गठबंधन भले ही बन गया हो लेकिन AAP और कांग्रेस के अंदर सबकुछ ठीक नहीं है. 


 

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