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दशकों पुराना था नाता, पद-कद मिलने के बाद भी क्यों कांग्रेस छोड़ गए ललितेश?

बंगाल में पूर्व केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के पार्टी छोड़ने के संदेश को कम से यूपी चुनाव से पहले निष्प्रभावी करने की कोशिश में बीजेपी, कांग्रेस या किसी अन्य दूसरी पार्टी का कोई बड़ा विकेट गिरा सकती है. किसी बड़े नेता को बीजेपी में शामिल कराया जा सकता है और ये बड़े नेता ललितेश पति त्रिपाठी भी हो सकते हैं.

कांग्रेस के स्तंभ थे ललितेश पति त्रिपाठी कांग्रेस के स्तंभ थे ललितेश पति त्रिपाठी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • राजनीतिक दबाव में हो सकता है कांग्रेस छोड़ने का फैसला
  • ललितेश ने नहीं खोले पत्ते, बीजेपी में हो सकते हैं शामिल

साल 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर कांग्रेस के साथ जुड़े थे. प्रशांत किशोर ने कांग्रेस को खाट सभा का आइडिया दिया था और उसकी शुरुआत हुई थी ब्राह्मणों के गढ़ पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से. चुनाव करीब आया तो कांग्रेस ने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था. हालांकि बाद में समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन हो गया और शीला दीक्षित सीएम कैंडिडेट घोषित होने के बाद फिर से सियासत के नेपथ्य में चली गईं. यूपी में कांग्रेस विधानसभा चुनाव के बाद भी ब्राह्मणों को पार्टी से जोड़ने की कोशिश में लगी रही और इसके लिए अग्रिम मोर्चे से अभियान छेड़ा पार्टी के युवा ब्राह्मण चेहरे जितिन प्रसाद ने.

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार में ब्राह्मण उत्पीड़न को मुद्दा बना हमलावर रहे जितिन प्रसाद आगे चलकर खुद सत्ताधारी दल में शामिल हो गए. ताजा घटनाक्रम ये है कि जितिन प्रसाद के बाद एक और ब्राह्मण परिवार से कांग्रेस का पीढ़ियों का नाता टूट गया है. पूर्वांचल के बड़े ब्राह्मण चेहरे ललितेश पति त्रिपाठी ने भी कांग्रेस छोड़ दी है. ललितेश के विधानसभा चुनाव में जब कुछ ही महीने बचे हैं, पार्टी छोड़ने के ऐलान से पार्टी की नीति, चुनावी रणनीति और ब्राह्मणों को साधने के लिए पिछले पांच साल से चल रही कवायद पर फिर से बहस शुरू हो गई है.

माना यही जा रहा है कि ब्राह्मणों जोड़ने की कांग्रेस की कवायद को ललितेश पति त्रिपाठी के पार्टी छोड़ने से झटका लगेगा. कभी सियासत का पावर हाउस रहे वाराणसी के औरंगाबाद हाउस से आने वाले ललितेश पति त्रिपाठी मीरजापुर के मड़िहान विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं. ललितेश यूपी के मुख्यमंत्री, देश के रेल मंत्री और कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके कमलापति त्रिपाठी के परिवार से आते हैं. कमलापति त्रिपाठी का वाराणसी के साथ ही चंदौली, मिर्जापुर, बलिया, गोरखपुर आदि जिलों में भी अच्छा प्रभाव है. ऐसे में वाराणसी के कांग्रेस कार्यकर्ता भी ये मान रहे हैं कि ललितेश का इस्तेमाल पार्टी बेहतर तरीके से कर सकती थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

ललितेश ने छोड़ी पार्टी लेकिन नहीं भंग हुआ मोह

ललितेश पति त्रिपाठी भले ही नाराज हो कांग्रेस से किनारा कर लिए हों लेकिन पार्टी से उनका मोह भंग नहीं हुआ है. तभी तो ललितेश ने न तो पार्टी, ना ही किसी नेता को लेकर कुछ कहा. उन्होंने ये जरूर कहा कि कांग्रेस देश की आत्मा है, मेरे मन में है. ललितेश के पार्टी छोड़ने को लेकर कांग्रेस की ओर से भी किसी भी बड़े नेता की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. ना तो ललितेश ने ही पार्टी को निशाना बनाया और ना ही कांग्रेस ने ललितेश को. वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर श्रीराम त्रिपाठी इसे लेकर कहते हैं ऐसा लग रहा है जैसे कांग्रेस ने ललितेश को वॉकओवर दे दिया हो. स्थानीय स्तर पर चर्चा यह भी है कि ललितेश पति त्रिपाठी मीरजापुर में हजारों बीघे जमीन से संबंधित धोखाधड़ी के मामले में आरोपी हैं. ऐसे में मड़िहान के पूर्व विधायक का पार्टी छोड़ने का फैसला राजनीतिक दबाव में भी हो सकता  है.

बाबुल के जाने के बाद बड़े विकेट की तलाश में है बीजेपी

ललितेश पति त्रिपाठी कांग्रेस छोड़ने का ऐलान तो कर दिया लेकिन आगे की रणनीति को लेकर अब तक कोई खुलासा नहीं किया है. ललितेश के अगले कदम पर कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के साथ ही प्रदेश स्तरीय नेताओं की भी नजर टिकी है. वाराणसी में चर्चा ये भी है कि वे बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. सियासत के जानकार ये कह रहे हैं कि बंगाल में पूर्व केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के पार्टी छोड़ने के संदेश को कम से यूपी चुनाव से पहले निष्प्रभावी करने की कोशिश में बीजेपी, कांग्रेस या किसी अन्य दूसरी पार्टी का कोई बड़ा विकेट गिरा सकती है. किसी बड़े नेता को बीजेपी में शामिल कराया जा सकता है और ये बड़े नेता ललितेश पति त्रिपाठी भी हो सकते हैं.

क्या है कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मत

वाराणसी कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष सतीश दुबे ने भी साफ कर दिया है कि वे ललितेश के साथ हैं लेकिन कांग्रेस नहीं छोड़ेंगे. सतीश दुबे कोई इकलौते नेता नहीं हैं जिसका ये मत है. यही भावना कांग्रेस के कई अन्य नेताओं की भी है. कांग्रेस के कुछ नेता इसे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की सलाहकारों पर अधिक निर्भरता से जोड़ रहे हैं. पार्टी के एक नेता ने दबी जुबान कहा कि यूपी के करीब करीब सारे फैसले सीधे प्रियंका गांधी के यहां से हो रहे हैं. प्रियंका गांधी नेताओं से भी कार्यकर्ता की तरह मिलती हैं और नेताओं की भी नहीं, सलाहकारों की सुनती हैं. ऐसी स्थिति में कभी यूपी की सियासत के पावर हाउस रहे औरंगाबाद हाउस से आने वाले ललितेश का इस्तीफा देना और पार्टी को लेकर एक शब्द भी तल्ख नहीं बोलना ये दर्शाता है कि उनके मन में पार्टी को लेकर नाराजगी है, उनका मोहभंग नहीं हुआ.

कुछ कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का ये भी मानना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में मिली हार की वजह से मिर्जापुर की मड़िहान सीट से विधायक रहे ललितेश पति त्रिपाठी के पार्टी में कद पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था. ललितेश का इस्तीफा पार्टी में अपना खोया कद वापस पाने के लिए प्रेशर पॉलिटिक्स की रणनीति पर आधारित भी हो सकता है. वजह चाहे जो भी हो, ललितेश पति त्रिपाठी के कांग्रेस छोड़ने से पार्टी की ब्राह्मणों को जोड़ने की रणनीति पर कम से कम पूर्वी उत्तर प्रदेश में नकारात्मक असर पड़ेगा.

 

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