पैसा ये पैसा कैसा ये पैसा. जैसा भी हो पैसा सबको प्यारा है. मन मार के लोग सिर्फ पैसे के पीछे भागे जा रहे हैं अब इसको गुलामी न कहें, तो क्या कहें.
भारतीय आदत के गुलाम है और इस गुलामी से निकलने की कोई सूरत भी नजर नहीं आती. जहां लिखा होगा 'यहां पेशाब करना मना है', मजाल है कि वह जगह आपको कभी सूखी मिल जाए. खुदा जाने इस गुलामी से कब मुक्ति मिलेगी.
रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं, नाम तो सुना ही होगा. इस किस्म के चलताउ डॉयलॉग आपको राह चलते सुनने को मिल ही जाते होंगे. बकौल चचा रामाधीर हिंदुस्तान में जबतक सिनेमा रहेगा, तब तक लोग बनते रहेंगे.
भारत में सड़कें खाली हो, तो समझ लीजिए या तो कोई अनहोनी हो गई है या फिर धोनी की टीम कोई बड़ा मैच खेल रही है. क्रिकेट का कुछ यूं असर है हमारे देश में.
इस तस्वीर पर न जाएं हम सिर्फ पत्नी भक्तों की बात नहीं कर रहे, हम उन तमाम लोगों की बात कर रहे हैं, जिन्होंने अपने शोना, बेबी, बेटू के चक्कर में अपने मनचाहे कामों को अनंतकाल तक पेंडिंग में डाल रखा है.
तिवारी मार्का हरकतें हो या पोर्न देखने की भारी जनसंख्या. हमारे यहां संस्कार की बड़ी-बड़ी मुनादी के बीच कई ऐसी हरकते हैं जिन्हें हम छोड़ नहीं पा रहे और सारी दुनिया में बदनाम हुए जा रहे हैं.
व्हाट्स एप और फेसबुक दो ऐसी बलाएं हैं, जिनसे चाहकर भी देश की युवा पीढ़ी नहीं निकल पा रही. लोगों की मुंडी मोबाइल के अंदर है और बाकी दुनिया उनके लिए अजनबी.
भारत में क्रिकेट धर्म है और सिनेमा जिंदगी. लोग या तो खुद को मैदान पर देखना चाहते हैं या 70 एमएम के पर्दे पर. इसी तरह कि और कई आधुनिक गुलामी हमने खुद पाल रखी है.