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1971 युद्ध: 13 दिनों में PAK का गुरूर हुआ चूर, जब किया सरेंडर तो नियाजी के आंखों में थे आंसू

काफी दबाव के बाद पाकिस्तानी जनरल नियाजी सरेंडर के लिए राजी हुए. सरेंडर के प्रोटोकॉल के मुताबिक मेजर जनरल जैकब ने उन्हें तलवार सौंपने को कहा, लेकिन उनके पास तलावर नहीं थी. तब जैकब ने उन्हें पिस्टल देने को कहा.

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1971 के युद्ध में पाकिस्तान ने सरेंडर किया था (फाइल फोटो)
1971 के युद्ध में पाकिस्तान ने सरेंडर किया था (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 1971 में पाकिस्तान से हुई जंग के 50 साल
  • जब दुनिया के नक्शे पर आया था बांग्लादेश
  • 93 हजार सैनिकों के साथ पाक ने किया था सरेंडर

16 दिसंबर 1971 वो तारीख है जब भारतीय सेना ने अपनी वीरता से दुनिया का नक्शा बदल दिया. इस तारीख को पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने भारत के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने सरेंडर किया था. 

पाकिस्तान को इस लड़ाई में ऐसी मात मिली थी कि जनरल नियाजी की अगुवाई में ढाका स्टेडियम में करीब 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को घुटने टेकने पड़ गए थे. हालांकि, भारत ने दया दिखाते हुए 1972 के शिमला समझौते के तहत इन सैनिकों को छोड़ दिया था. यानी जंग जीतने के बाद भी भारत संयम दिखाता रहा. 

पुरानी थी बांग्लाभाषी पूर्वी पाकिस्तान और उर्दूभाषी पश्चिमी पाकिस्तान की टकराहट

यूं तो बांग्लाभाषी बहुल पूर्वी पाकिस्तान और उर्दूभाषी बहुल पश्चिमी पाकिस्तान के बीच कई सालों से संघर्ष चल रहा था लेकिन जंग की असल जमीन 1970 में हुए आम चुनाव में तैयार हुई. 

चुनाव में मुजीबुर्रहमान की पार्टी आवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की 169 में से 167 सीटें हासिल कर लीं. लेकिन नेशनल असेंबली में आवामी लीग को बहुमत के बावजूद पाकिस्तान ने मुजीबुर्रहमान को सत्ता नहीं सौंपी. नतीजतन पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर बगावत शुरू हो गई.

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पूर्वी पाकिस्तान में बगावत को दबाने के लिए पाकिस्तान ने जनरल टिक्का खान को लगाया. जनरल टिक्का खान को उसकी बर्बरता की वजह से पूर्वी पाकिस्तान के लोग कसाई कहते थे. 

जनरल टिक्का खान की अगुवाई में पाकिस्तान की सेना ने बर्बरता की हदें पार कर दीं. बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गईं. लाखों लोगों को मार डाला गया. अकेले चटगांव में एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए. पाक फौज के जुल्मों से बचने के लिए लाखों शरणार्थियों ने भारत की तरफ रुख करना शुरू कर दिया. 

सीमा पर हालात लगातार विकट हो रहे थे. पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान का झगड़ा भारत को प्रभावित कर रहा था, लिहाजा भारत आंखें मूंदकर नहीं बैठ सकता था. 

भारत बांग्लादेशी शरणार्थियों को शरण देने पर मजबूर हो गया. पड़ोस में बन रहे हालात से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा चिंतित थीं लेकिन वो अभूतपूर्व संयम भी दिखा रही थीं. इंदिरा गांधी से जब पूछा गया था कि क्या भारत पाकिस्तान पर अटैक कर सकता है तो उन्होंने स्पष्ट कहा था कि भारत हमेशा से शांति का समर्थक रहा है. इसके बाद उनसे यह भी पूछा गया था कि क्या पाकिस्तान से युद्ध की संभावनाएं हैं. इस पर इंदिरा ने कहा था कि भारत हर मुमकिन कोशिश कर रहा है कि शांति से समाधान निकाल लिया जाए. 

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हालांकि भारत के धैर्य और सहनशीलता के बावजूद 71 की जंग टल नहीं पाई. नवंबर आते-आते हालात और बिगड़ गए. 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तानी वायुसेना ने भारत पर हमला कर दिया. इसके साथ ही भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया. 

13 दिनों में पाक का गुरूर चूर 

ये एक ऐसा युद्ध था जिसमें भारत और पाकिस्तान की टक्कर पूर्वी और पश्चिमी मोर्चे पर एक साथ हो रही थी. 13 दिन के इस युद्ध में पाक का सारा गुरूर चूर हो गया और वो आत्मसमर्पण पर मजबूर हो गया था.

1971 के इस युद्ध में पूर्वी कमान के स्टाफ ऑफिसर मेजर जनरल जेएफआर जैकब ने अहम रोल निभाया था. दरअसल तत्कालीन सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने मेजर जनरल जैकब को ही ढाका में पाकिस्तान के सरेंडर की सारी व्यवस्था करने के लिए ढाका भेजा था.

मेजर जनरल जैकब ने इस पूरी घटना का जिक्र बीबीसी के साथ बातचीत में किया है. 

जनरल जैकब कहते हैं कि जब उन्होंने नियाजी से सरेंडर करने को कहा तो पहले तो नियाजी ने कहा कि वह सरेंडर नहीं कर रहे हैं. बल्कि उन्होंने कहा कि जनरल जैकब तो यहां संघर्षविराम कराने आए हैं.

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जनरल नियाजी की आंखों में आंसू 

काफी दबाव के बाद नियाजी सरेंडर के लिए राजी हुए. सरेंडर के प्रोटोकॉल के मुताबिक मेजर जनरल जैकब ने उन्हें तलवार सौंपने को कहा, लेकिन उनके पास तलावर नहीं थी. तब जैकब ने उन्हें पिस्टल देने को कहा. बीबीसी से बात करते हुए मेजर जनरल जैकब ने कहा था कि जब नियाजी लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा को अपनी पिस्टल दे रहे थे तो उनकी आंखों में आंसू थे.

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ढाका में पाक के थे 26 हजार सैनिक, भारत के मात्र 3 हजार 

बता दें कि जब पाकिस्तान सरेंडर कर रहा था तो बड़ी विचित्र सैन्य स्थिति थी. उस दौरान पाकिस्तानी जनरल नियाजी के पास ढाका में 26 हजार से ज्यादा सैनिक थे जबकि भारत के पास ढाका से 30 किलोमीटर दूर महज 3 हजार ही सैनिक थे. मेजर जनरल जैकब बताते हैं कि जब वे नियाजी को सरेंडर करने के लिए बोल रहे थे तो मन ही मन में सोच रहे थे कि यह मैंने क्या कर दिया. अगर वो सरेंडर से इनकार कर देते तो वे क्या करते.
 
16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान पर भारत की जीत दूसरे विश्व युद्ध के बाद किसी देश की युद्ध में सबसे बड़ी जीत थी. इस जंग से एक नए देश बांग्लादेश का उदय हुआ और दुनिया में भारत का दबदबा स्थापित हुआ. 

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