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दहेज हत्या को आरोपी ससुरालवाले सुसाइड क्यों साबित करना चाहते हैं? जानिए कानूनी पक्ष

भोपाल की ट्विशा शर्मा और ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर की संदिग्ध मौतों ने दहेज उत्पीड़न और ससुराल पक्ष की क्रूरता पर बहस छेड़ दी है. भारतीय न्याय संहिता की धाराएं दहेज मौत और आत्महत्या के लिए उकसाने में फर्क करती हैं.

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ट्विशा और दीपिका नागर दोनों की मौत के मामले में ससुराल पक्ष उसे आत्महत्या साबित करना चाह रहा है
ट्विशा और दीपिका नागर दोनों की मौत के मामले में ससुराल पक्ष उसे आत्महत्या साबित करना चाह रहा है

भोपाल की ट्विशा शर्मा और ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर की मौत ने एक बार फिर देश में दहेज उत्पीड़न, ससुराल पक्ष की क्रूरता और महिलाओं की संदिग्ध मौतों को लेकर बहस तेज कर दी है. दोनों मामलों में महिला के शरीर पर चोटों के आरोप सामने आए, लेकिन ससुराल पक्ष ने इसे आत्महत्या बताते हुए दहेज प्रताड़ना के आरोपों से इनकार किया.

कानून की नजर में 'दहेज मौत' और 'आत्महत्या के लिए उकसाना' दो अलग-अलग अपराध हैं. इन दोनों के बीच का फर्क केवल शब्दों का नहीं, बल्कि पूरे मुकदमे की दिशा बदल देने वाला होता है. इसी फर्क पर तय होता है कि अदालत किसे दोषी मानने की शुरुआती धारणा बनाएगी और किस पर सबूत पेश करने की जिम्मेदारी ज्यादा होगी.

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80, जो पहले आईपीसी की धारा 304B थी, दहेज मौत को परिभाषित करती है. इसके अनुसार अगर किसी महिला की शादी के सात साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और मौत से ठीक पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया हो, तो इसे 'दहेज मौत' माना जाएगा. ऐसे मामलों में पति या ससुराल वालों पर सीधे तौर पर महिला की मौत का जिम्मेदार होने का आरोप लगता है. कानून इसे बेहद गंभीर अपराध की श्रेणी में रखता है.

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इसके उलट 'आत्महत्या के लिए उकसाना' यानी एबेटमेंट ऑफ सुसाइड भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 के तहत आता है. इसमें अभियोजन पक्ष को साबित करना पड़ता है कि आरोपी ने महिला को आत्महत्या के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उकसाया था. केवल सामान्य वैवाहिक विवाद या घरेलू तनाव को अदालतें पर्याप्त नहीं मानतीं.

इन दोनों अपराधों में सबसे बड़ा अंतर भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 (BSA) की धाराओं से पैदा होता है. BSA की धारा 118 कहती है कि यदि यह साबित हो जाए कि महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था और उसकी असामान्य मौत हुई है, तो अदालत यह मान लेगी कि दहेज मौत के लिए पति या ससुराल पक्ष जिम्मेदार है.

यानी यहां कानून आरोपी के खिलाफ एक मजबूत धारणा बनाता है. इसके बाद आरोपी पर यह साबित करने का दबाव आ जाता है कि वह दोषी नहीं है. यही वजह है कि दहेज मौत के मामलों में अदालतें अग्रिम जमानत या नियमित जमानत देने में अधिक सतर्क रहती हैं. इस अपराध में कम से कम सात साल की सजा का प्रावधान है, जो उम्रकैद तक जा सकती है.

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इसी कारण कई मामलों में आरोपी परिवार यह दावा करता है कि महिला ने आत्महत्या की थी. वरिष्ठ अधिवक्ता अवि सिंह के मुताबिक, यदि मौत को आत्महत्या साबित किया जाए तो “हत्या” या “दहेज मौत” जैसी गंभीर धाराओं से बचने की कोशिश की जा सकती है. बचाव पक्ष अक्सर मानसिक तनाव, अवसाद, नौकरी का दबाव या भावनात्मक अस्थिरता जैसी दलीलें सामने रखता है.

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हालांकि आत्महत्या के मामलों में भी नया कानून एक महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आया है. भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 117 अब कहती है कि यदि शादी के सात साल के भीतर किसी महिला ने आत्महत्या की हो और उसे पति या रिश्तेदारों द्वारा प्रताड़ित किया गया हो, तो अदालत यह “मान सकती है” कि उसे आत्महत्या के लिए उकसाया गया था.

लेकिन यहां शब्दों का फर्क बेहद महत्वपूर्ण है. दहेज मौत के मामलों में अदालत “shall presume” यानी दोष मानने की बाध्यकारी धारणा बनाती है, जबकि आत्महत्या के मामलों में “may presume” यानी अदालत चाहे तो ऐसी धारणा बना सकती है. इससे न्यायाधीश को ज्यादा विवेकाधिकार मिलता है.

वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन का कहना है कि नए कानून का वास्तविक प्रभाव आने वाले वर्षों में ही साफ होगा, क्योंकि अभी ज्यादातर मामले पुराने कानूनों के तहत अदालतों में चल रहे हैं. उनके मुताबिक केवल कानूनी धारणा बना देने से अपने आप दोष सिद्ध नहीं हो जाता. अभियोजन पक्ष को अब भी अपराध के सभी आवश्यक तत्व अदालत में साबित करने पड़ते हैं.

वे कहती हैं कि जांच में कमी, गवाहों के बयान में विरोधाभास या फोरेंसिक सबूतों की कमजोरी पूरे मामले को प्रभावित कर सकती है. यानी कानून की धाराएं मजबूत होने के बावजूद पुलिस जांच और सबूत सबसे अहम भूमिका निभाते हैं.

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ऐसे मामलों में पोस्टमार्टम और फोरेंसिक जांच की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. विशेषज्ञों के अनुसार यह जानना जरूरी होता है कि मौत कैसे हुई, शरीर पर चोटें कब लगीं और उनकी प्रकृति क्या थी. कई बार यही तथ्य तय करते हैं कि मामला हत्या का है, दहेज मौत का है या आत्महत्या का.

अवि सिंह का कहना है कि देश के कई हिस्सों में पोस्टमार्टम प्रक्रिया अभी भी बेहद कमजोर है. यदि वैज्ञानिक तरीके से जांच न हो तो मौत की वास्तविक वजह कभी सामने नहीं आ पाती. यही कारण है कि अदालत में अक्सर कानूनी लड़ाई इस बात पर टिक जाती है कि जांच एजेंसियां क्या साबित कर पाती हैं.

ट्विशा और दीपिका जैसे मामलों ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि महिलाओं की संदिग्ध मौतों में सच्चाई तक पहुंचना कितना कठिन होता जा रहा है. एक ओर परिवार दहेज प्रताड़ना और हत्या का आरोप लगाते हैं, दूसरी ओर आरोपी पक्ष इसे आत्महत्या बताता है. ऐसे में कानून, फोरेंसिक जांच और अदालत की व्याख्या मिलकर तय करती है कि मौत के पीछे की सच्चाई क्या थी और आखिर किसे जिम्मेदार माना जाएगा?

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