भारत उन देशों में शामिल है जहां हवा बेहद जहरीली हो चुकी है और नदियां लगातार गंदगी और केमिकल का बोझ झेल रही हैं. बड़े-बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक प्रदूषण अब लोगों की सेहत पर सीधा असर डाल रहा है, लेकिन हैरानी की बात ये है कि जो सरकारी एजेंसियां इस खतरे पर नजर रखने और इसे रोकने की जिम्मेदारी निभाती हैं, वे खुद स्टाफ की भारी कमी से जूझ रही हैं. पर्यावरण मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश की प्रदूषण निगरानी व्यवस्था लगभग आधे कर्मचारियों के सहारे चल रही है.
क्या कहता है डेटा
सरकारी डेटा के मुताबिक, देशभर में प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी संस्थाओं में कुल 6,932 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 3,161 पद वर्षों से खाली पड़े हुए हैं. इसका मतलब है कि करीब 46 फीसदी पदों पर कोई अधिकारी या कर्मचारी ही तैनात नहीं है. ये खाली पद तीन प्रमुख संस्थाओं में हैं- सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB), राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) और पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटियां (PCCs). यही संस्थाएं फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं, नदियों में गिरने वाले गंदे पानी, और शहरों के जहरीले कचरे पर नजर रखने की जिम्मेदारी निभाती हैं.
केंद्र से ज्यादा राज्य के हालात खराब
केंद्र स्तर पर हालात थोड़े बेहतर हैं. राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी CPCB में कुल 393 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 64 खाली हैं. यानी यहां करीब 16 प्रतिशत की कमी है. हालांकि ये भी एक बड़ी संख्या है, लेकिन असली संकट राज्य स्तर पर नजर आ रहा है, जहां प्रदूषण सीधे लोगों की जिंदगी को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है.
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की हालत ज्यादा चिंताजनक है. यहां कुल 6,137 पदों में से 2,921 खाली पड़े हैं, यानी लगभग 48 फीसदी कर्मचारियों की कमी है.इसके अलावा पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटियों में भी 402 में से 176 पद खाली हैं.इन एजेंसियों पर कारखानों की जांच, कूड़े के निपटारे की निगरानी, जल स्रोतों के नमूने लेने और वायु गुणवत्ता पर नजर रखने जैसे अहम काम होते हैं, लेकिन आधे कर्मचारियों की गैर-मौजूदगी में ये जिम्मेदारियां ठीक से निभाना मुश्किल होता जा रहा है.
दिल्ली में 344 में से 153 पद खाली
सबसे चिंताजनक स्थिति उन राज्यों में है, जो पहले से ही प्रदूषण के हॉटस्पॉट माने जाते हैं. पर्यावरण मंत्रालय के मार्च 2025 के आंकड़ों के मुताबिक राजधानी दिल्ली में 344 में से 153 पद खाली हैं. पंजाब में 652 में से 309 पद रिक्त हैं, जबकि हरियाणा में 450 में से 273 पद खाली पड़े हैं. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में 732 में से 339 पद खाली हैं और राजस्थान में तो हालात और गंभीर हैं, जहां 808 में से 488 पद खाली हैं.बिहार में भी 127 में से 30 पद रिक्त हैं. ये वही राज्य हैं जहां हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है और कई नदियां प्रदूषण का बोझ ढो रही हैं.
स्टाफ की इस भारी कमी का सीधा असर ज़मीनी कामकाज पर पड़ रहा है. फैक्ट्रियों की नियमित जांच नहीं हो पा रही, कई मामलों में नियमों का उल्लंघन पकड़ में ही नहीं आता, और अगर शिकायतें आती भी हैं, तो उनका निपटारा समय पर नहीं हो पाता.नदियों और तालाबों से पानी के नमूने लेने में देरी होती है और कई जगह हवा की गुणवत्ता के आंकड़े भी पुराने होते जा रहे हैं.इसका नतीजा ये है कि प्रदूषण फैलाने वालों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हो पाती.