UGC के नए प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस को लेकर चल रहे विवाद पर सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कड़ा जवाब दिया है. उन्होंने कहा है कि इन नियमों को लेकर की जा रही आलोचना हैरान करने वाली और गलत है, क्योंकि ऐसे रेगुलेशंस 2012 से लागू हैं और इन्हें सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बेहतर बनाया गया है. इंदिरा जयसिंह के मुताबिक, नए नियम पहले से ज्यादा मजबूत हैं और कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 की भावना के अनुरूप हैं.
इस पर एडवोकेट नीरज सिंह का कहना है कि UGC द्वारा किया गया ये वर्गीकरण भेदभाव वाला है. उनके मुताबिक यह नियम SC, ST और OBC समुदायों के साथ दुश्मनी पूर्ण और उन्हें बाहर करने वाला है. उन्होंने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के खिलाफ है.
इसी आधार पर उन्होंने कोर्ट से ये मांग की है कि UGC के नियमों की धारा 3 को असंवैधानिक घोषित किया जाए. उन्होंने यह भी बताया कि पहले भी एक याचिका दाखिल हुई थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने UGC को निर्देश दिया था कि शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए गाइडलाइंस बनाई जाएं. उसी आदेश के तहत UGC ने ये नए नियम बनाए हैं.
UGC नियमों की आलोचना पर बोलीं सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह
इंदिरा जयसिंह ने कहा कि उन्हें इस आलोचना पर हैरानी हो रही है, क्योंकि ऐसे नियम 2012 से ही मौजूद हैं. उन्होंने बताया कि 2019 में दो माताएं कोर्ट गई थीं, जिनका कहना था कि पुराने नियम SC/ST छात्रों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं. तब से सुप्रीम कोर्ट लगातार इस मुद्दे पर नजर बनाए हुए है.
उनके मुताबिक नए नियम 2013 के पुराने नियमों से बेहतर हैं, और इन्हें कोर्ट की निगरानी में तैयार किया गया है. उन्होंने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट की जो सोच और रुख है, वही इन नए नियमों में भी दिखाई देता है.
इंदिरा जयसिंह ने साफ कहा कि उन्हें इसमें शिकायत की कोई वजह नजर नहीं आती. बल्कि उल्टा, कुछ याचिकाकर्ता तो यह कह रहे हैं कि नियम अब भी SC/ST को पूरी तरह सुरक्षित नहीं करते. उन्होंने यह भी बताया कि अब इन नियमों का दायरा बढ़ाकर निजी विश्वविद्यालयों (Private Universities) तक कर दिया गया है.
उनके अनुसार, ये नियम संविधान के अनुच्छेद 15 की सामान्य भावना और आदेश के अनुरूप हैं. आखिर में उन्होंने कहा कि UGC के नए नियमों की जो आलोचना हो रही है, वह पूरी तरह गलत और बेबुनियाद है.
क्या कानूनी तौर पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
जब उनसे पूछा गया कि राजनीतिक विवाद को अलग रखते हुए क्या इन गाइडलाइंस को अब कानूनी तौर पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, क्योंकि कुछ याचिकाएं पहले ही दाखिल हो चुकी हैं. साथ ही, ये गाइडलाइंस खुद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बनाई गई हैं.
इस पर इंदिरा जयसिंह ने कहा कि उनकी जानकारी के मुताबिक, सभी मुद्दों पर पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाओं में बहस हो रही है. जो भी कहना है, वो उन्हीं याचिकाओं में कहा जा सकता है. उन्होंने बताया कि ये अकेला मामला नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की एक कोऑर्डिनेट बेंच उच्च शिक्षण संस्थानों में आत्महत्या के मामलों पर भी सुनवाई कर रही है.
उन्होंने कहा कि जब पूरा डेटा सामने आएगा तो यह साफ हो जाएगा कि उच्च शिक्षा संस्थानों, खासकर IITs में, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों द्वारा आत्महत्या के मामले अनुपात से कहीं ज्यादा हैं. अगर पूरे हालात को एक साथ देखा जाए तो यह साफ होता है कि इन समुदायों के पास यह कहने की पर्याप्त वजह है कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है. उन्होंने कहा कि अब देखना होगा कि कोर्ट इस मामले में क्या फैसला करता है.