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संघ के 100 साल: दो-दो सरसंघचालकों की हिंदू-मुस्लिम एकता की योजना क्यों फेल हो गईं?

संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस के कार्यकाल में भी तमाम बड़ी घटनाएं देश में हुईं, आपातकाल से लेकर राम जन्मभूमि आंदोलन और बाबरी विध्वंस तक. और पहली बार संघ ने एक बड़ी भूमिका उनके नेतृत्व में निभाई, केन्द्र की सरकार बनाने में. इस दौरान संघ ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को स्थापित करने के लिए अहम काम किया.

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संघ ने कई बार हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के लिए काम किया.  (Photo: AI generated)
संघ ने कई बार हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के लिए काम किया. (Photo: AI generated)

RSS के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयानों को आज के दौर की पीढ़ी ने भी खूब सुना है और उनके कई बयान ऐसे भी हैं, जिनको लेकर हद दर्जे तक कट्टर हिंदुओं ने भी आपत्ति जताई है, भले ही वो आपत्ति सोशल मीडिया में ही सिमटकर रह गई हो. कट्टर हिंदू चाहे वो संघ से इतर कोई हिंदूवादी संगठन या क्लब बनाकर काम करे रहे हों या फिर संघ से जुड़े किसी संगठन में ही काम कर रहे हों, उनको मुस्लिमों के प्रति संघ प्रमुख का ये ‘अति उदारवादी’ रवैया पसंद नहीं आता, लेकिन कोई खुलकर विरोध भी नहीं जता पाता. लेकिन उन्हें ये जानकर हैरत हो सकती है कि ये कोई नई बात नहीं है, मुस्लिमों से संघ के हर सरसंघचालक के काल में कई मुद्दों पर सहमति के लिए वार्ताएं होती रही हैं और विद्या भारती के स्कूलों में हजारों बच्चे मुस्लिम हैं, संघ के सैकड़ों स्वयंसेवक मुस्लिम भी हैं. उससे भी ज्यादा बड़ी बात ये कि बालासाहब देवरस ने तो एक बार संघ के दरवाजे आधिकारिक रूप से मुस्लिमों के लिए खोलने की तैयारी भी कर ली थी, तो गुरु गोलवलकर को लेकर तो एक ईरानी मुस्लिम पत्रकार ने ये ऐलान कर दिया था कि केवल गुरु गोलवलकर ही हिंदू-मुस्लिम समस्या को दूर कर सकते हैं और बाकायदा इसके लिए एक योजना बना ली गई थी.  

संघ प्रमुख मोहन भागवत ये तो कई बार कह चुके हैं कि भारत में पैदा होने वाला हर व्यक्ति हिंदू है, उसी तरह से जैसे ब्रिटेन का नागरिक ब्रिटिश या अमेरिका का नागरिक अमेरिकन कहलाता है. एक बार उन्होंने कहा था कि, “ज्ञानवापी का एक इतिहास है, हम इसे बदल नहीं सकते. हमें रोज एक मस्जिद में शिवलिंग को क्यों देखना है? झगड़ा क्यों बढ़ाना है? हिंदू कभी मुस्लिमों के विरुद्ध नहीं सोचता है, मुस्लिमों के पूर्वज भी तो हिंदू ही थे”. राम मंदिर पर जब सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवम्बर 2019 को फैसला आया था, तब मोहन भागवत का बयान आया था कि, “राम जन्मभूमि आंदोलन से संघ किन्हीं कारणों से अपवाद स्वरूप जुड़ा था, जो फैसला आने के बाद खत्म हो गया है. राम मंदिर के बाद अब हम कोई आंदोलन नहीं करेंगे. कोई मुद्दा उठा तो हम लोग मिल-जुलकर सुलझाएंगे..”

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2012 में उनके इस बयान से तो कट्टर हिंदूवादी कुछ ज्यादा ही परेशान थे, उन्होंने कहा था कि, “यदि कोई हिंदू ये कहता है कि मुसलमान यहां नहीं रह सकता तो वह हिंदू नहीं है.” बात बात पर लोगों को पाकिस्तान चले जाओ, कहने वालों को जाहिर ये नागवार ही गुजरा होगा लेकिन खुलकर संघ प्रमुख के खिलाफ कोई बोलता नहीं है. जुलाई 2021 में इस बयान के बाद सितम्बर 2021 में उन्होंने ये भी कह दिया कि, “हिंदू और मुस्लिम एक ही वंश के हैं, और प्रत्येक भारतीय नागरिक एक हिंदू है”. हालांकि 2023 में उन्होंने कट्टर हिंदूवादियों की भी भावनाओं को थोड़ा समझा और ऑर्गनाइजर के एक इंटरव्यू में एक बयान दिया कि, “इस्लाम को देश में कोई खतरा नहीं है, लेकिन उसे बड़े होने के भाव को छोड़ना पड़ेगा.”

संघ को करीब से जानने वाले ज्यादातर विचारक यही कहते आए हैं कि संघ को मुसलमानों से कोई दिक्कत नहीं हैं, दिक्कत है तो कट्टर मुस्लिमों से जो अपने धर्म को ‘सुपीरियर’ समझते हैं और अभी भी भारत में मुस्लिम शासन के सपने देखते हैं, आम मुस्लिम को बरगलाते हैं, गलत राह पर ले जाते हैं, जो देश के कानूनों के खिलाफ होती है. उनका ऐतराज मुस्लिमों को अल्पसंख्यक मानकर वोटों की खातिर तमाम तरह के राजनैतिक तुष्टिकरण उपायों से भी रहा है. 

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RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

जाहिर है जैसी चिंता संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत को है, वही चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया को भी थी, उन्होंने एक बार कहा था कि, “भारत में 98% मुसलमान धर्मान्तरित हैं. अगर मुसलमानों की अपनी इबादत है, कुछ खास रीति-रिवाज हैं, तो कोई समस्या नहीं है, लेकिन बंटवारे के बाद भी अगर मुस्लिमों में पाकिस्तान के लिए किसी तरह का सॉफ्ट कॉर्नर है तो इससे शक पैदा होता है. यही वजह है कि मुस्लिमों को लेकर लोगों के मन में यह डर घर कर गया है.” पांचवे सरसंघचालक के एस सुदर्शन ने तो बीबीसी के एक साक्षात्कार में करण थापर को साफ कह दिया था कि, “हम अल्पसंख्यक की अवधारणा को बिलकुल स्वीकार नहीं करते हैं”. लेकिन तब भी उनका इशारा मुस्लिम तुष्टिकरण को लेकर ही था क्यों उन्हें विशेष अधिकार दिए जाएं और रज्जू भैया का ‘पाकिस्तान के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर’ के मामले तो अक्सर सामने आते रहे हैं, अब तो बांग्लादेश के प्रति भी सॉफ्ट कॉर्नर के मामले सामने आने लगे हैं. जिस शर्जील इमाम ने असम को भारत से काटने की योजना का बयान दिया, उसको जमानत ना मिलने पर देश के ही तमाम दिग्गज दुखी हैं.

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जब हिटलर का साक्षात्कार करने वाले ‘ईरानी’ पत्रकार संग बनी गुरु गोलवलकर की हिंदू मुस्लिम समस्या खत्म करने की योजना

गुरु गोलवलकर के करीबी लोगों ने लिखा है कि बाद के दिनों में वे साधुओं और संतों से मिलने के लिए अधिक उत्सुक हो गए थे, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं था कि अन्य कार्यक्रमों में उनकी रुचि कम हो गई थी. उनमें उन्हें बारीकी से देखने की वही तीक्ष्ण दृष्टि थी. वे 1971 में मकर संक्रांति के लिए भोपाल में थे. 

उसके बाद 29-30 जनवरी को कोलकाता में थे. डॉ. सैफुद्दीन जीलानी ने 30 जनवरी को उनसे मुलाकात कर उनका साक्षात्कार लिया. डॉ. जीलानी मूल रूप से ईरान के थे. वे बहुत पहले भारत में बस गए थे. वे इस्लामी और हिंदू दर्शन के विशेषज्ञ थे. वे पेशे से स्तंभकार थे और इसी भूमिका में ऑर्गनाइजर के सम्पादक के.आर. मलकानी के संपर्क में आए और 'ऑर्गनाइजर' साप्ताहिक पत्रिका के लिए स्तंभ लिखना शुरू किया. उन्हें गुरुजी के बारे में मलकानी से ही पता चला. वे गुरुजी से मिलने के लिए बहुत उत्सुक थे. अपने संपर्कों के माध्यम से वे कोलकाता में अपनी इस इच्छा को पूरा करने में सक्षम हुए. जीलानी द्वारा लिया गया गुरुजी का यह साक्षात्कार ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यह साक्षात्कार आरएसएस के सरसंघचालक द्वारा स्वयं व्यक्त किए गए मुस्लिम समाज के बारे में आरएसएस के विचारों को स्पष्ट रूप से बताता है. ऐसा माना जाता है कि यह साक्षात्कार संघ के समर्थकों और विरोधियों दोनों द्वारा उठाए गए प्रश्नों का उत्तर दे सकता है.

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यह साक्षात्कार ‘श्री गुरुजी समग्र (खंड 9, पृष्ठ 186-195)’ में उपलब्ध है. इस साक्षात्कार का कुछ हिस्सा प़ढ़िए, "डॉ. जीलानी: आपने अपने विचार बहुत संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत किए हैं. कोई भी विचारशील और नेक व्यक्ति आपसे असहमत नहीं होगा. क्या आपको नहीं लगता कि समय के साथ सहयोग, इस देश में सांप्रदायिक असामंजस्य को समाप्त कर सकता है? क्या आप अपने और मुस्लिम नेताओं के बीच एक बैठक आयोजित करने के लिए आए हैं? क्या आप ऐसे नेताओं से मिलना चाहेंगे?, गुरु गोलवलकर: मुझे यह क्यों पसंद नहीं आएगा? मैं ऐसी मुलाकात का स्वागत करूंगा”. 

डॉ. जीलानी ने इस असाधारण साक्षात्कार के बारे में लिखा था कि, "श्री गुरुजी से हुई यह मुलाकात मेरे जीवन की एक अत्यंत प्रेरणादायक और अविस्मरणीय घटना साबित हुई. मैं हिटलर से लेकर कर्नल नासिर तक, दुनिया की सभी महान हस्तियों से मिल चुका हूं, लेकिन श्री गुरुजी जैसा सौम्य, आत्मविश्वासी और प्रभावशाली व्यक्ति मुझे कहीं नहीं मिला. मैं ईमानदारी से मानता हूं कि हिंदू-मुस्लिम समस्या के समाधान के लिए सही मार्गदर्शन केवल श्री गुरुजी ही दे सकते हैं."

लेकिन योजना समय से पहले ही ‘कब्र में दफन’ हो गई

गुरु गोलवलकर और जीलानी की पहली ही मुलाकात में गहरी दोस्ती हो गई थी. समय के साथ यह मित्रता और भी मजबूत हो गई, लेकिन दो साल से भी कम समय में 17 नवंबर, 1972 को श्री जीलानी का देहांत हो गया. रंगा हरि अपनी पुस्तक ‘The Incomparable Guru Golvalkar’ (प्रभात प्रकाशन) में लिखते हैं कि,  “मित्र से बिछड़ने के इस दुख से व्याकुल गुरुजी ने कोलकाता के डॉ. सुजीत धर को लिखा, ‘हमारे प्रिय मित्र डॉ. एस. जीलानी के 17 नवंबर, 1972 को निधन की खबर सुनकर मुझे गहरा दुःख हुआ. मुझे बताया गया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा. अक्टूबर के आखिरी सप्ताह और नवंबर के पहले तीन दिनों में मैं मुंबई में अपने अन्य सहयोगियों से मिला, लेकिन मुझे आश्चर्य है कि मुझे यह सूचना न तो मेरे मित्रों से मिली और न ही आपसे.”. 

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उस पत्र में आगे गुरु गोलवलकर ने लिखा था कि, "यह घटना घटित हो चुकी है. अब आपको मेरी ओर से एक कर्तव्य निभाना है - शोक संतप्त परिवार, उनकी पत्नी और बच्चों के प्रति हमारी संवेदना व्यक्त करना. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और आशीर्वाद प्रदान करें. मुझे आशा है कि हम उनके बेटों के साथ भी उतने ही मजबूत संबंध बनाए रख सकेंगे."

बाला साहब ने तो संघ के दरवाजे पूरी तरह से संघ के लिए खोलने की तैयारी कर ली थी

संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस के कार्यकाल में भी तमाम बड़ी घटनाएं देश में हुईं, आपातकाल से लेकर राम जन्मभूमि आंदोलन और बाबरी विध्वंस तक. और पहली बार संघ ने एक बड़ी भूमिका उनके नेतृत्व में निभाई, केन्द्र की सरकार बनाने में. ऐसी सरकार जो देश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी. आपातकाल के बाद जो जनता पार्टी की सरकार बनी, उसके लिए संघ ने कितनी मेहनत से खड़ी किए गए राजनैतिक दल जनसंघ को भी खत्म कर दिया, उसका विलय नई पार्टी जनता पार्टी में कर दिया. सो आंदोलन चलाने में, आपातकाल के दौरान भी छुपकर इंदिरा गांधी के खिलाफ देश का माहौल तैयार करने में, सभी अलग अलग विचारधाराओं वाले दलों को एक साथ लाने में बालासाहब की बड़ी भूमिका संघ प्रमुख होने के नाते रही थी. ऐसे में पहली बार इस सच्चाई का भी भान हो रहा था कि जनता की रोजमर्रा की जिंदगी सुचारू चले, उसके लिए उनकी सरकार से कितनी अपेक्षाएं रहती हैं. वो भी हर वर्ग की कुछ कुछ समस्याएं दूसरों से अलग भी होती हैं.

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जनता सरकार के बनने के बाद संघ से लोगों की अपेक्षाएँ बढ़ गई थीं. कुछ सवाल भी बार-बार पूछे जा रहे थे, जिनका बालासाहब देवरस समयानुकूल समाधान भी करते जा रहे थे. एक सवाल संघ की की अंदरूनी संरचना से भी संबंधित होता था, जिसके बारे में अलग-अलग तरह से सवाल पूछे जाते थे. एक बार किसी ने उनसे सार्वजनिक मंच पर ही पूछ डाला कि क्या संघ मुसलमानों के लिए अपने दरवाजे खोलने जा रहा है? प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हमारे ‘बालासाहब देवरस’ पुस्तक में कभी उनके सहयोगी रहे वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय लिखते हैं कि, “इस बारे में बालासाहब देवरस ने 'हाँ' और 'ना' में कभी जवाब नहीं दिया. वे बताते थे कि इमरजेंसी के दिनों में अनेक तरह के अनुभव आए हैं. जेल में बातचीत होती थी. उस आधार पर विचार किया जाना है. बालासाहब देवरस ने इसे स्पष्ट किया कि, ‘सैद्धांतिक रूप से हमने यह स्वीकार किया है कि उपासना-पद्धति भिन्न होने के बावजूद मुसलमान भी राष्ट्र जीवन में समरस हो सकते हैं. उन्हें होना भी चाहिए.‘ वे बताते थे कि इस कार्य में संघ की भूमिका भी होगी. उनके इस उत्तर से एक प्रकार का नया आशावाद पैदा हुआ.” 

उन दिनों रोजमर्रा की राजनीतिक बहस में यह विषय आने लगा, हर गली मोहल्ले की चर्चा में यह कहा जाने लगा कि संघ अपने दरवाजे खोल रहा है. जाहिर है संघ के बाहर तो दूर कभी संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों से भी इस बारे में बालासाहब ने गंभीरता से चर्चा नहीं की थी. ऐसे में जब अंदर और बाहर दोनों तरफ से सवाल उठने लगे तो बालासाहब देवरस ने स्पष्ट किया कि इस बारे में संघ की प्रतिनिधि सभा में विचार होगा. उस समय शाही इमाम और 'जमाते इसलाम' के बड़े नेता बालासाहब देवरस से मिलने आते थे. 

रामबहादुर राय ने अपने बीबीसी से साक्षात्कार में भी बताया है कि, "मैं इसका साक्षी हूँ. 1975 की इमरजेंसी के दौरान मुस्लिम और आरएसएस नेता साथ साथ जेलों में थे और उनमें आपस में एक सौहार्द बना था. जब जनता पार्टी की सरकार आई तो शाही इमाम वगैरह आरएसएस के दफ़्तर में जाते थे और शाम को अगर नमाज़ का वक्त होता था, तो वहीं नमाज भी पढ़ते थे. मोरारजी भाई की आरएसएस को सलाह थी कि वो संघ को हिंदुओं तक सीमित करने के बजाए उसे सब के लिए खोल दें." ये हो सकता है कि पहली गैर कांग्रेसी सरकार को बनाए रखने के दवाब में आने पर उन्होंने इस मुद्दे को प्रतिनिधि सभा (संघ की सर्वोच्च समिति) में ले जाने का फैसला लिया हो. दरअसल एक तरफ मधु लिमये लगातार ये अभियान चला रहे थे कि जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों की दोहरी सदस्यता नहीं चलेगी, दूसरी तऱफ मोरारजी देसाई उन्हें संघ में मुस्लिमों को लेने की लगातार सलाह दे रहे थे.

रामबहादुर राय अपने लेख में लिखते हैं, “इसकी संघ में भी चर्चा हुई. बालासाहब देवरस ने मुसलमानों के संघ में प्रवेश को व्यापक राष्ट्रीय हित में देखा. इसे उन्होंने इस रूप में भी देखा होगा कि उसके दोहरे परिणाम हो सकते हैं. मुसलमान देश की मुख्यधारा में आएँगे और संघ पर मुस्लिम विरोधी होने के आरोप को भी समाप्त किया जा सकता है. उस समय कई स्थानों पर मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल ने संघ कार्यालयों में अपनी नमाज पढ़ी. इससे भी एक सद्भाव का वातावरण बना. मुंबई के 'नागरिक अभिनंदन' में नानी पालखीवाला और मुहम्मद करीम छागला भी आए. छागला ने कहा कि 'मैं मजहब से मुसलमान हूँ और राष्ट्रीयता से हिंदू हूँ.' इस पर उन दिनों खूब बहस चली. उस दौर में बालासाहब देवरस जहाँ- जहाँ गए, वहाँ मुसलिम नेता उनकी सभाओं में आए. मुसलिम नेताओं ने स्वीकार भी किया कि संघ के बारे में उन्हें गुमराह किया गया”.

लेकिन वीटो लग गया

रामबहादुर राय लिखते हैं, “वह समय राष्ट्रीय एकता की शुरुआत का हो गया था. आपातकाल में उपजी परस्परता को उससे बल मिला. लेकिन वह लंबा नहीं टिक सका. दलीय राजनीति भारी पड़ी. उस समय बालासाहब देवरस दो लक्ष्यों से प्रेरित थे, मुसलमानों के लिए संघ के दरवाजे खोलना उनकी पहली प्राथमिकता थी और जनता पार्टी की एकता को बनाए रखने में वे हरसंभव सहयोग के लिए तत्पर थे. मुसलमानों के प्रवेश का प्रश्न संघ की प्रतिनिधि सभा में विचारार्थ आया. वह खारिज हुआ. उसे बालासाहब देवरस ने माना, वे संघ की परंपरागत सोच को बदल नहीं पाए. इससे राष्ट्रीय एकता का जो प्रयोग प्रारंभ हुआ था, वह स्थगित हो गया. इसका एक ही कारण नहीं था. मुसलमानों में भी इस पर आपसी तकरार थी. दलीय राजनीति भी आड़े आ रही थी. जनता पार्टी अपने अंतर्विरोधों का शिकार होने लगी थी”.

हालांकि रामबहादुर राय ने प्रतिनिधि सभा में हुई चर्चा के बारे में ज्यादा नहीं लिखा, लेकिन सच यही है कि संघ में किसी मुस्लिम पर कभी रोक नहीं है, हां उसके लिए संघ की कार्य पद्धति, प्रार्थना, सोच, तरीकों में बदलाव नहीं होता. संघ इस बात की तो कतई अनुमति नहीं देगा कि कोई वंदेमातरम के दौरान खड़ा ना हो. ऐसे ही कई और मसले थे, जहां बात फंसनी ही थी. यही बात कट्टर मुस्लिमों के समूह भी उठा रहे थे, उसके बारे में भी राय साहब ने विस्तार से नहीं लिखा कि उन्होंने इस प्रस्ताव का कितना जमकर विरोध किया था. जनता पार्टी की धड़ेबाजी और संजय गाधी के फेंके टुकड़ों पर फंसते सहयोगियों की खबरें वैसे ही आ रही थीं. एक तो वैसे ही एक सरकार के लिए जनसंघ खत्म हो गया था, इस प्रस्ताव के चलते संघ के तौर तरीकों में अगर बदलाव लाए जाते तो संघ संघ नहीं रह जाता. 

पांचवें सरसंघचालक के समय बना मुस्लिमों के लिए अलग संगठन

संघ प्रमुख केएस सुदर्शन ने 20 साल पहले 2002 में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की शुरुआत की थी. हालांकि आधिकारिक रूप से अभी भी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच संघ के सहयोगी संगठनों में शामिल नहीं है. संघ स्वयंसेवकों का एक हिस्सा इस संगठन को अपना समर्थन भी नहीं देता है. फिर भी अगर इस संघठन के संरक्षक वरिष्ठ संघ प्रचारक और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इन्द्रेश कुमार हैं तो इसे संघ से एकदम अलग नहीं माना जा सकता. उन्होंने जमीयत उलेमा-ए-हिंद और मौलाना डॉ. जमील इलियासी से भी मुलाकात की थी. मौलाना जमील इलियासी उस समय इमाम ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष थे. 
अक्सर मुस्लिमों से जुड़े कई मुद्दों पर राष्ट्रवादी मुस्लिमों की भी एक राय आती है, जो मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से आती है. इस संगठन का काम बेहद मुश्किल है, जितना मुसलमानों को के बीच से हिंदू परम्पराओं को मानने वाले, वंदेमातरम आदि का सम्मान करने वाले संघ की सोच वाले राष्ट्रवादी मुस्लिम ढूंढना मुश्किल है, उतना ही उनके समर्थन में हिंदुओं को लाना भी. लेकिन इंद्रेश कुमार की 2 दशक की लगातार मेहनत की तारीफ तो बनती है, आज टीवी पर मुस्लिम राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के ऐसे एक दो प्रवक्ता काफी असर छोड़ते हैं, जिन्हें हिंदू और मुस्लिम परम्पराओं, ग्रंथों का गहन अध्ययन है और वो दमदारी से संघ की सोच को सामने रखते हैं.  

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