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संघ के 100 साल: हेडगेवार के 'राइट हैंड' अप्पाजी जोशी, तस्वीर लगाकर तिलक की पूजा करते थे

संघ के एक कार्यकर्ता थे अप्पाजी जोशी. लोकमान्य तिलक से इनका खूब लगाव था.1906 में जब उन्हें पता चला कि तिलक जिस ट्रेन से जा रहे हैं, वो वर्धा स्टेशन से गुजरने वाली है, तो शिक्षक के मना करने के बावजूद वो तिलक को देखने स्टेशन चले गए थे,बाद में छड़ी से पिटाई भी खाई. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.

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डॉक्टर हेडगेवार के ‘दाएं हाथ’ माने जाते थे अप्पाजी. (Photo: AI generated)
डॉक्टर हेडगेवार के ‘दाएं हाथ’ माने जाते थे अप्पाजी. (Photo: AI generated)

ये तीसरे दिल्ली दरबार से जुड़ी कहानी है, तीसरा दरबार 1911 में दिल्ली में लगा था, जब राजा जॉर्ज पंचम और रानी विक्टोरिया भारत आए थे. ऐसे में सभी ब्रिटिश आधीन भारतीय राजा महाराजाओं को तो उनके दरबार में हाजिरी देनी ही थी, देश भर के सभी बड़े ब्रिटिश अधिकारियों और भारत की भी ऐसी कई हस्तियों को आमंत्रित किया गया था, जो अपने अपने क्षेत्र में शिखर पर थे, और अंग्रेजी राज के प्रशंसक थे. इलाहाबाद के जाने माने वकील मोतीलाल नेहरू भी आए थे और वो संयुक्त प्रांत के इकलौते आमंत्रित वकील थे, वो भी पूरे परिवार के साथ.

सबसे दिलचस्प था इस खास मौके के लिए मोतीलाल का जवाहर को निर्देश देकर लंदन से अपने लिए खास कपड़े सिलवाकर मंगवाना. मोतीलाल स्पेशल ट्रेन से लखनऊ से दिल्ली संयुक्त प्रांत के गर्वनर के साथ ही गए थे और उन्हीं के साथ रुके थे. इस मौके पर देश भर के स्कूलों में 12 दिसम्बर 1911 को ‘दरबार दिवस’ आयोजित करने का आदेश था और अंग्रेजों की भक्ति में कई कार्यक्रम किए जाने थे. उस वक्त हरिकृष्ण जोशी वर्धा (महाराष्ट्र) के क्रेडॉक हाईस्कूल में पढ़ रहे थे, उन्होंने कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया. नतीजा ये हुआ कि वो स्कूल छोड़ना पड़ गया, बाद में बमुश्किल हिंगणघाट के स्कूल में एडमीशन मिला था.

हरिकृष्ण जोशी को ही बाद में अप्पाजी जोशी के नाम से जाना जाने लगा था, यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऐसा सरकार्यवाह जिन्हें शुरू के तीन सरसंघचालकों के चुने जाते वक्त ना केवल कार्यक्रम में उपस्थित रहने का मौक मिला था बल्कि इन तीनों मौकों पर ही उनका सम्बोधन भी हुआ था. मोतीलाल नेहरू उसके बाद कांग्रेस में शामिल हो गए थे और 1919 व 1928 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे थे. अप्पाजी जोशी ने भी लोकमान्य तिलक के प्रभाव में कांग्रेस का दामन थाम लिया और अपने प्रांत के काफी प्रभावी नेता रहे, इतने प्रभावी कि बाकी नेताओं को दिक्कत हो गई थी, ऐसे में उन नेताओं ने एक समानांतर कांग्रेस तक खड़ा कर ली थी. बीच में जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया और जैसी कि उम्मीद उन्होंने जताई थी कि एक साल में स्वराज मिल जाएगा, वो पूरा नहीं हुआ तो कांग्रेस छोड़ने वालों में तमाम दिग्गज शामिल थे, अप्पाजी जोशी उसके बाद स्वराज पार्टी में शामिल हो गए. इस तरह दिल्ली दरबार में जाने वाले और उसका बहिष्कार करने वाले दोनों इस पार्टी में साथ थे.

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कई कामों को एक साथ करते थे अप्पाजी 

उनका बचपन बहुत गरीबी में बीता था. उनके पिता एक वकील के पास मुंशी थे. उन्हें थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती थी, इसका लाभ उन्हें मिल रहा था, जबकि उनके चाचा पुरोहित कार्यों में व्यस्त रहते थे. अप्पाजी को 12 साल का होने तक पिताजी, चाचाजी और उनके तीन भाई काल के हाथों का शिकार होकर उन्हें अकेला छोड़ गए. ऐसे में बड़ी कठिनाई से उन्होंने कक्षा दस तक पढ़ाई की. लेकिन तमाम कठिनाइयों के बावजूद देश और समाज की चिंताओं में घुलने लगे थे. 1905 में बंग-भंग आन्दोलन से प्रभावित होकर वे स्वाधीनता समर में कूद गये. 14 साल की अल्पायु में ही उनका विवाह हो गया और वे भी एक वकील के पास मुंशी बन गये औऱ चचेरे भाई की मौत के बाद उनको पुरोहित का काम भी करना पड़ा था. पर सामाजिक कार्यों के प्रति उनकी सक्रियता बनी रही, वे नियमित अखाड़े में जाते थे. 

वहीं उनका सम्पर्क संघ के स्वयंसेवक अण्णा सोहनी से हुआ, जिनको बाद में संघ में प्रशिक्षण और अनुशासन की जिम्मेदारी मिली थी. अन्ना से उनका लगाव इस कदर हो गया कि संघ की स्थापना से पहले उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक मंडल के नाम से एक मंडल की स्थापना की तो वो जी जान से उनके साथ भी हो लिए थे. हालांकि बाद में उन्हीं के माध्यम से उनका मिलना डा. हेडगेवार से हुआ. उन दिनों डॉ हेडगेवार और उनके मित्र भाऊजी कावरे के साथ मिलकर क्रांतिकारियों को विभिन्न प्रकार की सहायता सामग्री भेजते थे, जिनमें प्रमुख रूप से अस्त्र शामिल थे और पत्र भी. डॉ हेडगवार को ये जिम्मेदारी अनशीलन समिति से मिली हुई थी.  

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क्रांतिकारियों की सहायता अप्पाजी गुप की ये ‘लड़कियां’ करती थीं

उस खतरे से भरे कार्य में अप्पा जी उनके विश्वस्त सहयोगी बन गये. अप्पाजी उन दिनों गणेश मंडल आदि से भी जुड़े थे, जिसके जरिए क्रिकेट खेलना भी शुरू किया था और एक ‘गणेश अमेच्यॉर क्लब’ नाम से एक नाट्य संस्था भी प्रारम्भ की थी., सो कई सारे नाटकों का मंचन भी करते थे. उन्होंने उन नाटकों में महिला पात्रों की भूमिकाएं करने वाले पुरुषों से बात की और उन्हें अपने मिशन में जुड़ने के लिए कहा. अब डॉ हेडगेवार का काम आसान हो गया, कोई भी अस्त्र, पत्र या अन्य कोई चीज महिलाओं के वस्त्रों में छुपाकर ले जाई जा सकती थी. क्रांतिकारियों से उनका पहला परिचय वर्धा के प्रसिद्ध क्रांतिकारी पांडुरंग खानखोजे की वजह से हुआ था. 

30 मार्च, 1897 को महाराष्ट्र के वर्धा में जन्मे अप्पा जी ने क्रांतिकारियों और कांग्रेस के साथ एक ही समय में काम किया. कांग्रेस के कोषाध्यक्ष जमनालाल बजाज के वे निकट सहयोगी थे, दिन-रात कांग्रेस के लिए काम करने से उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गयी. यह देखकर कांग्रेस के कोषाध्यक्ष जमनालाल बजाज ने इन्हें कांग्रेस के कोष से वेतन देना चाहा; पर इन्होंने मना कर दिया. 1947 के बाद जहाँ अन्य कांग्रेसियों ने ताम्रपत्र और पेंशन ली, वहीं अप्पा जी ने यह स्वीकार नहीं किया. आपातकाल में वे मीसा में बन्द रहे, असहयोग आंदोलन में भी जेल में रहे थे. पर उससे भी उन्होंने कुछ लाभ नहीं लिया. वे देश सेवा की कीमत वसूलने को पाप सरीखा मानते थे.

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डॉक्टर हेडगेवार के ‘दाएं हाथ’ माने जाते थे अप्पाजी

लोकमान्य तिलक को अप्पाजी बचपन से ही इतना मानते थे कि 1906 में जब उन्हें पता चला कि तिलक जिस ट्रेन से जा रहे हैं, वो वर्धा स्टेशन से गुजरने वाली है, तो शिक्षक के मना करने के बावजूद वो तिलक को देखने स्टेशन चले गए थे, बाद में छड़ी से पिटाई भी खाई. तिलक की बाकायदा तस्वीर लगाकर पूजा करते थे, लेकिन यही तिलक जब मांडले जेल से बाहर आकर अंग्रेजों के प्रति थोड़े नरम दिखे तो वो उनसे भी नाराज हो गए थे. 

लेकिन जब से उन्होंने अण्णा सोहोनी से डॉ हेडगेवार के बारे में सुनना शुरू किया था, वो बिना मिले ही उनके प्रशंसक हो चले थे. डॉ हेडगेवार भी जब महिला वेश धरने वाले कलाकारों के जरिए क्रांतिकारियों तक सामान पहुंचाने लगे तो दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. लेकिन अप्पाजी की पहली मुलाकात डॉ हेडगेवार से तब हुई जब स्त्री वेश धारण करने वाले इन लड़कों के प्रशिक्षण की बात चली. 1917 में इन सब तरुणों को प्रशिक्षण दिया गया था कि पुलिस से कैसे बचना है, पकड़े जाने की सम्भावना हो तो क्या करें, पकड़े गए तब क्या करें आदि. 1919 में सामान के साथ डॉ हेडगेवार ने खुद अप्पा जी को भेजा, लौटकर आए तो क्रांतिकारी अर्जुन सेठी की सेवा में लगा दिया गया, जो वर्धा जेल में कड़ी यातनाओं के चलते विक्षिप्त से हो चले थे. चिरंजीव लाल बड़जाते ने वित्तीय सहायता की और अप्पाजी ने उन्हें अपने घर पर तीन चार साल तक रखा, एक दिन अर्जुन ठीक भी हो गए. 

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अप्पाजी ने उन्हीं दिनों तिलक द्वारा स्थापित होमरूल लीग का भी काम किया, वह वर्धा तहसील के गांव गांव जाते और संगठन का विस्तार करते, मंडल व तहसील परिषदें गठित करते. तिलक ने जब वर्धा का दौरा किया तो अप्पाजी हरदम साथ रहे. तिलक की 1920 में मृत्यु के बाद कांग्रेस का नेतृत्व अपरोक्ष रूप से गांधीजी के हाथ में आ गया. अप्पाजी गांधीजी के शुरू में ही प्रशंसक बन गए थे. असहयोग आंदोलन में गिरफ्तारी दी उससे पहले जब 1918 में बड़े पैमाने पर गांधीजी का जन्मदिन मनाने की योजना सेठ जमनालाल बजाज ने वर्धा में बनाई और इसकी जिम्मेदारी अप्पाजी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक मंडल को सौंप दी और उन्होंने बखूबी निभाई भी. लेकिन जैसे ही गांधीजी ने बिना समझौते के असहयोग आंदोलन वापस लेने का ऐलान किया, एक बड़ा वर्ग उनके खिलाफ हो गया. 

वैसे ही हिंदू जनमानस मोपला दंगों से दुखी था, उस पर कांग्रेस की भूमिका से हिंदू नाराज थे. सो गांधीजी से भी बहुतो का भरोसा उसी वक्त उठ चला था, उनमें अप्पाजी जोशी भी थे. राजनीतिक विकल्प के अभाव में वह 1922 कांग्रेस से निकलकर स्वराज पार्टी में शामिल हो गए. उसके बाद गांधीजी से अप्पाजी जोशी का साबका पड़ा था 1934 में, उस साल 25 जनवरी को वर्धा में लगे संघ के शीतकालीन वर्ग में गांधीजी आए थे. अप्पाजी जोशी साथ थे, गांधीजी ने अप्पाजी को कंधों पर हाथ रखकर कहा था कि, "मैं सचमुच प्रसन्न हो गया हूं, सम्पूर्ण देश में इतना प्रभावी दृश्य मैंने अभी तक कहीं नहीं देखा”. गांधीजी इस बात से भी हैरान थे कि आपने सोने, खाने आदि में जातिगत भेदभाव की भावना कैसे मिटा दी? बातचीत के बाद जब ध्वज प्रणाम हुआ तो गांधीजी ने भी किया था. 

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उन दिनों डॉ हेडगेवार भी अनुशीलन समिति का काम छोड़कर एक नए संगठन की नींव रखने में जुटे और अलग् अलग समूहों के साथ बैठक करने लगे तो हर बैठक में अप्पाजी जोशी भी साथ रहते थे. ऐसी 14 बैठकें हो गईं और सबमें लोगों ने तमाम तरह के सवाल उठाए तो एक बार उन्होंने डॉक्टर हेडगेवार से कह भी डाला कि, “आपको जो कार्य करना है, आरम्भ कर दीजिए, केवल बैठकों में तो ऐसे ही वाद विवाद चलते रहेंगे”

पहले सरसंघचालक के नाम का ऐलान उनसे पूछे बिना ही कर दिया था 

नागपुर के बाद वर्धा में ही पहली शाखा शुरू हुई थी. एक दिन नागपुर में डॉ हेडगेवार ने उन्हें अपने कमरे में संघ की शाखा दिखाई थी, उन दिनों मारुति (हनुमानजी की मूर्ति) के सामने भगवा ध्वज लगाकर बौद्धिक और प्रार्थना होती थी. वर्धा जाते ही अप्पाजी ने वहां भी ऐसी शाखा शुरू कर दी थी. डॉ हेडगेवार ने उन्हें वर्धा का संघचालक नियुक्त कर दिया. 

अप्पाजी शुरूआत में इस बात से भी परेशान थे कि डॉ हेडगेवार कोई पद नहीं ले रहे थे, संघ का कोई प्रमुख भी नहीं था. सो एक दिन 1926 में उन्होंने डॉ हेडगेवार के सिवाय बाकी सभी बड़े चेहरों और संघचालकों से सलाह लेकर तय कर लिया कि आज कुछ कहना है. शाखा में सभी लोग आए तो उन्होंने कमान संभालते हुए जोर से कहा कि सरसंघचालक एक, दो और तीन... सभी लोगों ने ध्वज प्रणाम की तरह अभिवादन किया, यहां तक कि डॉ हेडगेवार ने भी किया.

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जब उन्हें बताया गया कि हम सबने मिलकर आपको सरसंघचालक चुन लिया है, तो शुरू में तो डॉ हेडगेवार नाराज ही हो गए थे. और ये अप्पाजी जोशी ही थे, जिन्होंने ये ऐलान उस सभा में किया था. हालांकि धीरे धीरे डॉ हेडगेवार भी राजी होते गए थे. ये अलग बात है कि उन्हें ध्वज प्रणाम की तरह सरसंघचालक प्रणाम एकदम पसंद नहीं आय़ा था. इधर गांधीजी के प्रयासों से बाद में स्वराज पार्टी फिर से कांग्रेस में मिल गई थी, तो अप्पाजी भी वापस कांग्रेस में आ गए थे. उन्होंने विधानसभा चुनावों में बैरिस्टर अभ्यंकर के मुकाबले डॉ मुंजे को जिताने में अहम भूमिका निभाई. ऐसे में पंडित नेहरू को दखल देना पड़ा था और उनकी सहायता से वहां एक समानांतर कांग्रेस खड़ी कर दी गई थी. 
 
जब अप्पाजी ने 56 संस्थाओं को दिए गए त्यागपत्र डॉ हेडगेवार के सामने रख दिए

लगातार अप्पाजी जोशी एक के बाद एक संस्थाओं से जुड़ते चले जा रहे थे. जाहिर है कम या ज्यादा, आज या कल हर संस्था को उन्हें समय देना पड़ता था. जबकि डॉ हेडगेवार चाहते थे कि वो सारा समय अपना संघ को दें. सो उन्होंने दूसरा रास्ता खोजा, एक दिन बैठक में सबसे बोले कि, क्या संघ ही किसी का जीवन-कार्य नहीं बन सकेगा? अप्पाजी ने उसी वक्त तय कर लिया था कि उन्हें क्या करना है, अगले दिन वो फिर वापस आए और उनके हाथों में 56 संस्थाओं को भेजे गए त्यागपत्र थे. वो सारे त्यागपत्र उन्होंने डॉ हेडगेवार के चरणों में रख दिए. उनके इस कदम से ना केवल डॉ हेडगेवार ने उन्हें और ज्यादा गंभीर लेना शुरू कर दिया बल्कि संघ के अंदर भी उनका सम्मान और ज्यादा बढ गया. 

एक दिन डॉ हेडगेवार वर्धा पहुंचे और अप्पाजी को कहा कि एक क्रांतिकारी की सहायता करने चलना है. ये आधी रात का वक्त था, दोनों वहां से बाबा वेश में रह रहे क्रांतिकारी गंगा प्रसाद पांडे के घर से पिस्तौल हटाने जा पहुंचें, लेकिन एक जासूस उनके पीछे लग चुका था. जैसे ही गंगा प्रसाद पांडे ने अपनी पिस्तौल डॉ हेडगेवार को सौंपी, पुलिस का वो जासूस बीच में कूद पड़ा. हेडगेवार ने फौरन पिस्तौल को लेकर अप्पाजी को भगा दिया. दरअसल एक लूट कांड में उस पिस्तौल के प्रयोग का शक था. उसके बाद इस केस को भी अप्पाजी जोशी ने ही खत्म करवाया था. 

RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

जब हेडगेवार ने जंगल सत्याग्रह के लिए सरसंघचालक पद डॉ परांजपे को देने का इरादा किया तो अप्पाजी जोशी ने तय किया कि वो भी डॉक्टरजी के साथ जेल जाएंग और गए भी. लेकिन उनको जेल में सी ग्रेड की कारागार मिली, जिसमें उन्हें काफी परेशान रहना पड़ा था. अप्पाजी हेडगेवार को कितना मानते थे ये आपको लैटर पैड की रोजाना की शुरूआती लाइंस से भी जाना जा सकता है. उनके लैटर पैड पर “मना तथा घेई? राही केशवा से पाई” हमेशा लिखी रहती थीं. जिनका मतलब था, ‘मन चाहे कहीं भी दौड़े, रहे सदा केशव चरणों में’. 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के बाद उनका पहला आनुसांगिक संगठन जो शुरू हुआ था, वो था राष्ट्र सेविका समिति. 1936 में अपने स्वयंसेवक बेटों कि चिंता करते हुए कि शाखा में कौन कौन होता है, वो डॉ हेडगेवार से मिलीं तो अप्पाजी जोशी के घर पर ही मिली थीं. ये 1936 की बात है. अप्पाजी के घर पर कई बार की बैठकों के बाद लक्ष्मीबाई केलकर डॉ हेडगेवार को राजी कर पाई थीं कि राष्ट्र सेविका समिति नाम का संगठन शुरु करना है.        

गुरूजी के भी दाएं हाथ

डॉ हेडगेवार को भी पता था कि उनके उत्तराधिकारी के लिए भी लाइन में कई नाम होंगे. मन ही मन वो गुरु गोलवलकर को पसंद कर चुके थे, लेकिन बाकियों को भी नाराज नहीं देखना चाहते थे. उन्होंने अप्पाजी के मन की भी थाह ये कहकर लेने की कोशिश की कि, “मेरे स्थान पर श्री गुरूजी को सरसंघचालक बना दिया जाए तो कैसा रहेगा?” अगले ही क्षण अप्पाजी का जवाब था कि, “ये तो आपने मेरे मन की बात ही कर दी डॉक्टर जी”. 1940 में जब डॉक्टर हेडगेवार अपने उपचार के लिए राजगीर (बिहार) गए तो अपने साथ अप्पाजी को भी ले गए थे. लेकिन उनको सरसंघचालक नहीं बनाया गया तो उनके कुछ समर्थक नाराज हो गए थे. अप्पाजी से अपने मन की बात रखी तो अप्पाजी का जवाब था कि, “मैं ड़ॉक्टरजी का दाहिना हाथ था ये सत्य है, परंतु गुरूजी तो डॉक्टरजी का हृदय हैं. ये उचित ही हुआ कि वे सरसंघचालक बने, वे ही अपने ड़ॉक्टर हेडगेवार हैं. मैं डॉक्टरजी का दाहिना हाथ था और नए सरसंघचालक का भी मैं दाहिना हाथ ही हूं”

बैठक ना छोड़नी पड़े, इसलिए नवासी का अंतिम संस्कार रात में ही कर लिया

संगठन कितना जरूरी होता है, और अप्पाजी के लिए कितना जरुरी था, उसे आप उनकी बेटी इंदुमती लाभे के शब्दों में ही जान सकते हैं. संघ नींव में विसर्जित पुस्तक के लेखक वीरेश्वर दिवेदी को इंदुमती लाभे ने बताया था कि, सन 1956 की बात है, मेरी 3 साल की बेटी सुवर्णा को टाइफाइज हो गया था. इलाज भी चल रहा था. एक दिन अचानक उसी हालत बहुत बिगड़ गई तो मैं घबरा गई. ऊपर अप्पाजी स्वयंसेवकों के साथ बैठक कर रहे थे. बीच में बैठक कैसे रोकी जाए, इस चक्कर में ही पांच से दस मिनट गुजर गए, फिर उन्हें समाचार देना ही पड़ा. अप्पा जी ने फौरन बैठक भंग की और डॉक्टर को बुलाया. लेकिन ड़ॉक्टर ने उन्हें आश्वस्त किया कि कुछ नहीं होगा. लेकिन लड़की बच नहीं पाई, रात 9 बजे चल बसी. डेढ़ घंटे तक आस पास के लोग, रिश्तेदार आदि आते जाते रहे. 

फिर अप्पाजी ने अपने सहयोगी गोपाल को कहा कि अब आगे की व्यवस्थाओं में लगो, मतलब कल उन्हें अमरावती सुबह साढे आठ बजे की ट्रेन से जाना था, वो उसी की तैयारियों की बात कर रहे थे. बोले- अब जो होना शा, सो हो चुका. अब बैठक रोकने से क्या होगा? अप्पाजी ने बच्ची के अंतिम संस्कार के लिए तैयारी करने को कहा और रात में सारी क्रियाएं करके सुबह वाली ट्रेन से अमरावती निकल भी गए. इस तरह के कर्मठ कार्यकर्ता को शिखर पर पहुंचने से कौन रोक सकता था. उन्हें 1946 में सरकार्यवाह का दायित्व दिया भी गया था. एक ग्रहस्थ होते हुए भी संघ के शीर्ष पदों पर पहुंचने वाले दो-तीन ही विरले हुए हैं.  

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