प्रयागराज संगम तट पर मौनी अमावस्या के दौरान विवाद हो गया. उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ (ज्योतिष पीठ) के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ अधिकारियों की झड़प हुई. बताया जा रहा है कि इस विवाद का कारण शंकराचार्य की पालकी रही, जिसे रोका गया था. तनाव के बीच शंकराचार्य का छत्र भी टूट गया. इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है और आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं, लेकिन विवाद से इतर ये जानना भी जरूरी है कि शंकराचार्यों की पालकी और छत्र की परंपरा क्या है?
आदिगुरु शंकराचार्य और चार पीठों की स्थापना
गौरतलब है कि आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत में पैदल ही घूम-घूमकर अद्वैत वेदांत परंपरा का प्रचार किया. सनातन के प्रचार के लिए उन्होंने चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की. इनमें शारदा मठ (द्वारका, पश्चिम), गोवर्धन मठ (पुरी, पूर्व), ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ, उत्तर) और श्रृंगेरी मठ (रामेश्वरम/कर्नाटक, दक्षिण) शामिल हैं. ये चारों मठ वैदिक सनातन परंपरा और ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए बनाए गए थे.
बात शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की करें तो वह उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ (ज्योतिष पीठ) के शंकराचार्य हैं. ज्योतिर्मठ उत्तराखण्ड के बद्रीकाश्रम में है. यहां दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ और ‘सागर’ विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है. इस पीठ का महावाक्य ‘अयमात्म ब्रह्म’ है. यहां अथर्ववेद-परम्परा का पालन किया जाता है.

पालकी और छत्र का क्या है महत्व?
अब इस पर आते हैं कि शंकराचार्य परंपरा में पालकी और छत्र का क्या महत्व है? असल में पालकी और छत्र केवल सत्ता या सम्मान के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि जगद्गुरु शंकराचार्यों की यात्रा (यात्रा या विहार) से जुड़े जरूरी धार्मिक अनुष्ठान हैं. ये परंपराएं सनातन धर्म की रक्षा और उसके विस्तार का प्रतीक मानी जाती हैं. इस परंपरा में शंकराचार्य को आदि शंकराचार्य का जीवित प्रतिनिधि माना जाता है और इन्हीं भावनाओं के साथ उनका सम्मान किया जाता है.
छत्र वैदिक परंपरा की रक्षा और आध्यात्मिक क्षेत्र में राजसत्ता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. यह शंकराचार्य के आसन के ऊपर या उनकी यात्रा के दौरान प्रमुख रूप से धारण किया जाता है. छत्र इस बात का प्रतीक है कि शंकराचार्य सनातन धर्म को छाया और सुरक्षा-संरक्षण देने वाले आचार्य हैं. इसी तरह पालकी उच्च कोटि के आध्यात्मिक गुरु की गरिमा और परंपरागत यात्रा विधि का प्रतीक है. इसके जरिये शंकराचार्य अपनी यात्राएं करते हैं, भक्तों से संवाद करते हैं और मठों की व्यवस्था का निरीक्षण करते हैं.
शंकराचार्य परंपरा में प्रतिनिधित्व का महत्व
ये दोनों प्रतीक इस तथ्य को सामने रखते हैं कि शंकराचार्य भले ही संन्यासी हों, लेकिन उन पर मानवता का मार्गदर्शन करने और धर्म की स्थापना की जिम्मेदारी है. संगम स्नान के अलावा भी जब उनकी पालकी यात्रा निकलती है तो उससे पहले शंकराचार्य की विधि-विधान से पूजा की जाती है. गांवों और नगरों में भक्त साष्टांग प्रणाम करते हैं और भेंट अर्पित करते हैं. ये भेंट एक मेज पर रखी जाती हैं, क्योंकि संन्यासी परंपरा के अनुसार शंकराचार्य निजी तौर पर किसी तरह के दान को छू नहीं सकते हैं.
यात्रा के दौरान शंकराचार्य पालकी में विराजमान होते हैं और उनके ऊपर छत्र धारण किया जाता है. इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चार गूंजते हैं. यह यात्रा केवल भौतिक आवागमन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा के संचार का माध्यम मानी जाती है.
अध्यात्म में क्या है पालकी का महत्व
पालकी अध्यात्म के उस भाव का प्रतीक है, जिसमें संन्यासी, शंकराचार्य या दिव्य व्यक्तित्व को धरती से कुछ ऊपर माना जाता है. उदाहरण के लिए देखें तो कई पौराणिक कहानियों में ऐसे जिक्र मिलते हैं कि किसी ऋषि के तप में इतना प्रभाव था कि जब वह चलते थे तो धरती से उनका पांव नहीं छूता था. इसे अध्यात्मिक ऊंचाई की स्थिति माना जाता रहा है. जैसे सत्य बोलने के व्रत के कारण युधिष्ठिर का रथ जमीन से चार अंगुल ऊपर उठकर चलता था. ऋषि वशिष्ठ और विश्वामित्र आकाशमार्ग से चलते थे. महर्षि वेदव्यास जल पर भी जमीन की तरह चल सकते थे और कई राजाओं के पास ऐसे रथ थे जो आकाश मार्ग से चलते थे.
अथर्ववेद मांत्रिक शक्तियों, तंत्र की परंपराओं और जादू जैसी ताकतों के ज्ञान का भंडार है. यह वेद जीवन के हर पहलू, उपचार, सुरक्षा, राजसी रीति-रिवाजों और आध्यात्मिक शक्तियों के लिए मंत्रों, जड़ी-बूटियों व यन्त्रों पर केंद्रित है, जहां आंतरिक यात्रा शुद्धि और ईश्वर से जुड़ाव पर जोर देती है. यह वेद ज्योतिर्मठ का मुख्य वेद है, इसलिए यहां की परंपराओं में इस तरह प्रतीकों का प्रयोग साफ तौर पर दिखाई देता है.

पालकी जैसी बाहरी यात्रा का आध्यात्मिक महत्व इस विचार से जुड़ा है कि सच्चा सुख और शांति बाहर नहीं, बल्कि भीतर आत्म-खोज और मन-वाणी की शुद्धि से मिलती है, जो अथर्ववेद के मूल दर्शन के अनुसार ही है. जहां बाहरी यात्राएं (जैसे पालकी) केवल एक माध्यम बन सकती हैं, पर लक्ष्य आत्म-ज्ञान है.
जैन परंपरा में अध्यात्मिक ऊंचाई का अर्थ
जैन परंपरा में जिनेंद्रिय जैन तीर्थंकरों की प्रतिमा का निर्माण जब किया जाता है तब उन्हें सीधे धरती पर बैठा हुआ नहीं दिखाते हैं, बल्कि धरती और उनके बीच में कुछ दूरी दिखाने के लिए कमल आदि बनाते हैं, ताकि प्रतिमाओं में भी उनका स्पर्श सीधे धरती से न हो. क्योंकि धरती पर टिके होना साधारण मनुष्य वाली स्थिति है, जबकि धरती से कुछ ऊंचाई पर होना अध्यात्मिक ऊंचाई का प्रतीक है.
शंकराचार्यों को उनके शिष्य पालकी पर इसीलिए ले जाते हैं क्योंकि पहले तो वह अपने गुरु को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में सम्मान देते हैं और उन्हें अपने कंधों पर उठाकर धार्मिक यात्राएं कराते हैं. दूसरा यह शंकराचार्य पद की अध्यात्मिक ऊंचाई का सम्मान है. यह उनके शिष्यों की ओर से अपनाई गई सम्मान की परंपरा है. शंकराचार्यों का पालकी और छत्र जैसी परंपरा (जिसे सामंती बताया जाता है) से सीधा कोई जुड़ाव नहीं है. बल्कि शंकराचार्य परंपरा के संस्थापक आदि शंकराचार्य ने तो पैदल ही पूरे भारत की यात्रा की थी.
पालकी, छत्र और ऐसे ही राजसी ठाठ को तब से अधिक अपनाया गया, जब बाहरी आक्रांताओं ने भारत की सनातनी परंपरा पर चोट पहुंचाई. तब नागा साधुओं ने खुद को सेना की तरह संगठित किया और शक्ति प्रदर्शन के लिए राजसी शान को अपनी अध्यात्मिक परंपरा से जोड़ा और इसके ठीक तरह से संचालन के लिए पदक्रम में भी शामिल किया. तभी से आसन, सिंहासन, पालकी, छत्र, चंवर जैसी परंपरा और प्रतीक संन्यासियों के साथ भी जुड़ गए. शंकराचार्य को पालकी में ले जाने की परंपरा भी इसीका एक हिस्सा है.