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घड़ियालों के संरक्षण को लेकर ओडिशा ने रचा इतिहास, सतकोसिया में दिखा कुदरती बसेरा

महानदी के पास स्थित सतकोसिया अभयारण्य को चुना गया. मई 2021 में घड़ियाल संरक्षण की दिशा में उस वक्त अहम कामयाबी हाथ लगी जब सतकोसिया में अंडों से 28 घड़ियालों के निकलने का पता चला.

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ओडिशा में रंग लाती दिख रही कोशिशें
ओडिशा में रंग लाती दिख रही कोशिशें
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 45 साल से ज्यादा इंतजार के बाद अंडों से 28 घड़ियाल निकलने का पता चला 
  • घड़ियाल की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएंगे- बिस्वाजीत मोहंती

ओडिशा के सतकोसिया क्षेत्र ने घड़ियालों को लेकर बड़ी उपलब्धि अपने नाम दर्ज की है. यहां महानदी के पास 45 साल बाद घड़ियालों का कुदरती बसेरा देखा गया है. घड़ियालों के अंडे देने के लिए चार दशक से भी अधिक इंतजार करने के बाद अब अच्छे नतीजे सामने आए हैं.  

भारतीय घड़ियाल (Gavialis gangeticus)  के संरक्षण का सफर 1975 में तिकारपादा स्थित GRACU (घड़ियाल रिसर्च एंड कंज़रवेशन यूनिट) में शुरू हुआ. इसके लिए महानदी के पास स्थित सतकोसिया अभयारण्य को चुना गया. मई 2021 में घड़ियाल संरक्षण की दिशा में उस वक्त अहम कामयाबी हाथ लगी जब सतकोसिया में अंडों से 28 घड़ियालों के निकलने का पता चला.

ओडिशा में बढ़ रही घड़ियाल की संख्या
ओडिशा में बढ़ रही घड़ियाल की संख्या

खारे पानी में रहने वाले मगरमच्छ और मगर की तुलना में घड़ियाल को जेनेटिक तौर पर कमजोर माना जाता है. इस लुप्तप्राय प्राणी के अस्तित्व को सबसे अधिक नुकसान मानव अतिक्रमण की वजह से हुआ है. इसमें मछली पकड़ने की गतिविधियों के साथ कारोबारी मकसद से होने वाली बोटिंग भी शामिल है.  

ओडिशा देश का अकेला राज्य है जहां ऐसे तीनों तरह के सरीसृप (रेप्टाइल्स) पाए जाते हैं- ताजे पानी में रहने वाले घड़ियाल, मगर और खारे पानी में रहने वाले घड़ियाल. 21वीं सदी में सारी प्रजातियों को एक जगह संरक्षित नहीं किया जा सकता. लेकिन हाल में सतकोसिया में घड़ियाल की ब्रीडिंग की खोज से संरक्षण की एक लंबी यात्रा संपन्न हुई और एक इतिहास रचा गया.  

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ओडिशा में पाए जाते हैं तीनों तरह के रेप्टाइल्स
ओडिशा में पाए जाते हैं तीनों तरह के रेप्टाइल्स

1975 में सतकोसिया में घड़ियालों के संरक्षण के प्रोजेक्ट की शुरुआत करने वाले शख्स के तौर पर लाला अश्विनी कुमार सिंह का नाम लिया जाता है. सिंह क्रोकोडाइल इंस्टीट्यूट, हैदराबाद से जुड़े थे भारत सरकार में पूर्व OIC थे. ये प्रोजेक्ट ओडिशा सरकार ने केंद्र सरकार और संयुक्त राष्ट्र डेवेलपमेंट फंड (UNDP) के सहयोग से शुरू किया था.   

सतकोसिया फील्ड डायरेक्टर और क्षेत्रीय मुख्य संरक्षक प्रदीप राजकरात ने आजतक को बताया, “हमने जब 22 मई को अंडों से घड़ियाल निकलना शुरू होने को नोटिस किया तत्काल कैमरे के साथ एक अस्थायी कैंप स्थापित किया. चार्जिंग लगातार होती रहे इसके लिए सोलर सिस्टम का इंतजाम किया गया. सीसीटीवी कैमरे से बिना पास जाए लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है. पानी से भी दूरबीन के जरिए नजर रखी जा रही है. नदी के तट पर अंडे देने वाली मादा घड़ियाल की मौजूदगी वहां लगातार बनी हुई है.”

कई साल बाद दिखा ऐसा नजारा
कई साल बाद दिखा ऐसा नजारा

राष्ट्रीय वन्य जीवन परिषद के पूर्व सदस्य बिस्वाजीत मोहंती ने आजतक से कहा, 45 साल के इंतजार के बाद ऐसा हुआ. मैं उम्मीद करता हूं कि वन विभाग उनकी (घड़ियालों) की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर संभव उपाय करेगा. बस दिक्कत ये है कि दो नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां सतकोसिया में अब भी चल रही है. एक नदी किनारे टूरिस्ट रिजॉर्ट का निर्माण और दूसरा वन विभाग की ओर से टूरिज्म को मोटरबोट्स के जरिए प्रमोट किए जाना. अगर हम घड़ियालों को बचाने के लिए वाकई गंभीर हैं तो इन दोनों गतिविधियों पर रोक लगानी चाहिए.

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