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Maharashtra Political Crisis: महाराष्ट्र जैसी तस्वीर पहले इन 5 राज्यों में भी दिखी, जानें कब-कब क्या हुआ

महाराष्ट्र की राजनीतिक उथल-पुथल जैसी स्थिति पहले भी कई राज्यों में सामने आ चुकी हैं. कई मामलों में राजनीतिक पार्टियों ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बुधवार देर शाम सरकारी बंगले को छोड़कर मातोश्री में शिफ्ट हो गए. -फोटो-PTI महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बुधवार देर शाम सरकारी बंगले को छोड़कर मातोश्री में शिफ्ट हो गए. -फोटो-PTI
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 1998 में राज्यपाल ने कल्याण सिंह को सीएम पद से हटा दिया था
  • सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में फ्लोर टेस्ट को माना है सही तरीका

महाराष्ट्र में राजनीति की वर्तमान तस्वीर पहले भी कई राज्यों में दिख चुकी है. अधिकतर राज्यों में कमजोर पड़ने वाली पार्टियों ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में जोर दिया है कि फ्लोर टेस्ट ही एकमात्र तरीका है, यह जानने का कि सत्ता में कौन रहेगा. हालांकि इस तरह के मामलों में राज्यपाल की शक्तियों के कुछ बड़े कानूनी और राजनीतिक मुद्दे, बागी विधायकों की सजा और दल-बदल विरोधी कानून का दायरा क्या होगा, जैसे सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं जो सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं.

जानें महाराष्ट्र जैसी स्थिति किन-किन राज्यों में कब-कब सामने आई...
 
उत्तर प्रदेश 

1998 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को उनके पद से हटा दिया था और कांग्रेस नेता जगदंबिका पाल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था. सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि यह निर्धारित करने के लिए कि कौन सत्ता पर काबिज होगा, तत्काल फ्लोर टेस्ट कराया जाना चाहिए. 

यह मुद्दा तब और बढ़ गया जब 12 विधायकों ने अपनी पार्टी के समर्थन के फैसले के खिलाफ सत्तारूढ़ भाजपा से समर्थन वापस ले लिया. दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनके खिलाफ कार्यवाही का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट में था, लेकिन अदालत ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने फ्लोर टेस्ट आयोजित करने से एक दिन पहले फ्लोर टेस्ट आयोजित करने के आदेश के बाद भी विधायकों की अयोग्यता को बरकरार रखा था.

झारखंड

सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में झारखंड में तत्काल फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था. उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में भाजपा की ओर से एक याचिका दायर की गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि तत्कालीन राज्यपाल ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री के रूप में बैठा दिया था, भले ही भाजपा ने बहुमत का दावा किया था. राज्यपाल ने एक जूनियर विधायक को प्रोटेम स्पीकर के रूप में भी नियुक्त किया था, जिसका याचिकाकर्ताओं ने भी विरोध किया था. बीजेपी के अर्जुन मुंडा और अजय कुमार झा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अदालत ने कहा था कि झारखंड विधानसभा का सत्र 10 मार्च को बुलाया गया था, जहां विधायकों के शपथ लेने की उम्मीद थी. कोर्ट ने निर्देश दिया कि 11 मार्च को फ्लोर टेस्ट कराया जाए.
 
अरुणाचल प्रदेश

2016 के नबाम रेबिया मामले में पांच जजों की बेंच ने बागी विधायकों और राज्यपाल की भूमिका पर सुनवाई की थी. मामले में सत्तारूढ़ कांग्रेस के 47 में से 21 विधायकों ने राज्यपाल से संपर्क कर दावा किया था कि उन्हें अपनी सीट से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जा रहा है क्योंकि उन्होंने मौजूदा मुख्यमंत्री नबाम तुकी का समर्थन नहीं किया है. कांग्रेस ने इन विधायकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और अयोग्यता की कार्यवाही शुरू की थी. 

तत्कालीन राज्यपाल ने जानकारी के बाद विधानसभा का एक सत्र बुलाया था और आदेश दिया था कि तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया को हटाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री या कैबिनेट की सिफारिश के बिना एजेंडे का हिस्सा होगा. इन फैसलों को कोर्ट में चुनौती दी गई थी.

पांच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि गवर्नर को किसी भी राजनीतिक खरीद-फरोख्त और राजनीतिक जोड़-तोड़ से दूर रहना चाहिए. किसी राजनीतिक दल का नेता कौन होना चाहिए या नहीं होना चाहिए, यह एक राजनीतिक प्रश्न है, जिसे निजी तौर पर राजनीतिक दलों द्वारा ही निपटाया और हल किया जाना चाहिए.

अदालत ने कहा था कि राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट के लिए नहीं बुलाया और न ही उन्होंने मुख्यमंत्री को सदन में बहुमत साबित करने की जरूरत समझी, इसलिए अदालत ने विधानसभा सत्र को स्थगित करने और तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष को उनके पद से हटाने के प्रस्ताव को पेश करने के निर्णय के संबंध में राज्यपाल द्वारा पारित आदेशों को रद्द कर दिया था.
 
गोवा

2017 के गोवा विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने के राज्यपाल के फैसले को चुनौती देते हुए कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. कांग्रेस का तर्क था कि भाजपा छोटे दलों के समर्थन का दावा कर रही थी लेकिन वे भाजपा का समर्थन नहीं कर रहे थे. कांग्रेस की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 24 घंटे के भीतर फ्लोर टेस्ट कराने का निर्देश दिया था.
 
कर्नाटक

2018 में कर्नाटक में भी इसी तरह की स्थिति पैदा हुई थी. तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने भाजपा के बीएस येदियुरप्पा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था और उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का समय दिया था. कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें दावा किया गया कि फ्लोर टेस्ट में देरी से खरीद-फरोख्त और भ्रष्टाचार होगा.

इस मुद्दे पर विचार करने के लिए आधी रात को सुनवाई हुई थी, जिसके बाद तीन जजों की बेंच ने तत्काल फ्लोर टेस्ट कराने को कहा था. कोर्ट ने कहा कि विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों ने अभी तक संविधान की अनुसूची III में निर्दिष्ट शपथ नहीं ली है और विधानसभा अध्यक्ष का भी चुनाव होना बाकी है.

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि इस तरह के मामले में, यह तय करने के लिए विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है कि प्रतिवादी संख्या 3 (येदियुरप्पा) को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने में राज्यपाल की कार्रवाई कानून में वैध थी या नहीं. चूंकि इसमें काफी समय लग सकता है और अंतिम निर्णय तुरंत नहीं दिया जा सकता है, हम इसे उचित समझते हैं कि एक या दूसरे समूह के बहुमत का पता लगाने के लिए फ्लोर टेस्ट तुरंत और बिना किसी देरी के आयोजित किया जाए.

राज्यपाल के कार्यों की वैधता का यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है और 19 मई 2018 को अदालत द्वारा फ्लोर टेस्ट की लाइव वीडियोग्राफी का आदेश पारित होने के बाद से इस मामले पर कोई सुनवाई नहीं हुई है.
 
महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में वर्तमान महाविकास अघाड़ी सरकार 2019 में राजनीतिक पैंतरेबाजी के बाद सत्ता में आई थी. मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी हुई थी. दरअसल, चुनाव परिणामों के बाद भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूट गया था. इसके बाद महाराष्ट्र के राज्यपाल ने पहले भाजपा को दावा पेश करने के लिए बुलाया था. इस बीच, एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस के बीच बातचीत से एमवीए बनाया जा रहा था. जब राज्यपाल ने भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस को दावा पेश करने और सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया, तो शिवसेना ने राज्यपाल के फैसले को रद्द करने और तत्काल फ्लोर टेस्ट के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. रविवार को मामले की विशेष सुनवाई हुई और सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने 24 घंटे के भीतर फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया.

हालांकि दिलचस्प बात यह है कि सरकार गठन के लिए एक पार्टी को आमंत्रित करने की राज्यपाल की शक्ति और राज्यपाल के फैसले की न्यायिक समीक्षा की सीमा के संबंध में मामले में उठाया गया बड़ा मुद्दा अभी भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है और अभी तक इसे सुना नहीं गया है.

मध्य प्रदेश

अप्रैल 2020 में कोरोना महामारी की शुरुआत के दौरान कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सरकार बनाने के लिए राज्यपाल के बुलाए जाने पर कई कांग्रेस विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में दावा किया गया था कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 174 और 175 के तहत मध्य प्रदेश के राज्यपाल का मुख्यमंत्री को बुलाना असंवैधानिक है. 

याचिका में दावा किया गया था कि भाजपा ने आठ मार्च 2020 को 19 विधायकों को बेंगलुरु ले जाने के लिए तीन चार्टर्ड विमानों की व्यवस्था की थी. कांग्रेस ने आगे आरोप लगाया कि 19 विधायकों में से छह कैबिनेट मंत्री हैं जिन्हें भाजपा ने बेंगलुरु के इकंपनीडो रिसॉर्ट में रखा है. कांग्रेस ने यह भी तर्क दिया कि राज्यपाल कैबिनेट की सिफारिश के बिना फ्लोर टेस्ट के लिए नहीं बुला सकते थे, खासकर तब जब विधायकों के इस्तीफे को स्पीकर ने स्वीकार नहीं किया था.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में विधायक दलबदल मामले का हवाला दिया और कहा कि विधानसभा अध्यक्ष इस्तीफा तभी खारिज कर सकते हैं जब जांच से पता चले कि यह स्वैच्छिक नहीं है. जांच यह सुनिश्चित करने तक सीमित होनी चाहिए कि क्या सदस्य अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपनी सदस्यता छोड़ने का इरादा रखता है. एक बार जब यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई सदस्य अपनी स्वतंत्र इच्छा से इस्तीफा देने को तैयार है, तो अध्यक्ष के पास इस्तीफा स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है. इस्तीफे पर विचार करते समय विधानसभा अध्यक्ष के लिए किसी अन्य बाहरी कारकों को ध्यान में रखना संवैधानिक रूप से ठीक नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को फ्लोर टेस्ट का आदेश देने की शक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है. हालांकि कोर्ट ने चेताया कि राज्यपाल के अधिकार का प्रयोग उस राजनीतिक व्यवस्था की सहायता के लिए नहीं किया जाना चाहिए जो उस समय की चुनी हुई सरकार को राजनीतिक विरोधी मानती है.

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