शीश पर जटा, मस्तक पर त्रिपुंड, भगवा वस्त्र, हाथ में चिमटा या त्रिशूल और हर-हर महादेव का उद्घोष. महाकुंभ-2025 के इस विशाल आयोजन की ओर चलें तो प्रयागराज में संगम तट की ओर जाते रास्तों में ये नजारा आम है. साधु वेश धारी, बाघंबरी लपेटे और डमरू आदि बजाते गंगा तट की ओर जत्थे के जत्थे चले जा रहे हैं. एक-दूसरे से मिलते हैं तो दोनों हाथ उठाकर जोर से कहते हैं अलख निरंजन और फिर आगे बढ़ जाते हैं. लंबी घनी दाढ़ी सहित चेहरे पर तेज लिए और गठीले-कसरती बदन वाले ये लोग कोई आम लोग नहीं है. ये कम से कम 8000 साल पुरानी मान्य भारतीय सभ्यता की सबसे पुख्ता निशानी हैं. ये साधु परंपरा के निर्वाहक हैं. संस्कृति के रक्षक हैं और वैदिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने वाले संदेशवाहक भी हैं.
वैदिक सभ्यता से जुड़ा है अखाड़ों का इतिहास
इन साधुओं को देखते ही एक प्रश्न जेहन में उभरता है, ये किस अखाड़े से जुड़े हैं? यही सवाल महाकुंभ जैसे विशाल आयोजन की सार्थकता है. किसी साधु का अखाड़ा जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि अखाड़ा क्या होता है? इसका इतिहास क्या है और यह कैसे सनातन संस्कृति का अहम हिस्सा बना हुआ है.
क्या आश्रम व्यवस्था से हुआ अखाड़ों का आरंभ
अखाड़ों के निर्माण की जड़ें वैदिक युग से जुड़ी पाई जाती हैं. वेदों कब लिखे गए, इसको लेकर वैसे तो ये मान्यता है कि इन्हें सतयुग के सबसे आरंभ में लिखा गया है. इसके इतर कई विद्वानों तकरीबन 7000 साल पहले के समय को ऋग्वैदिक काल का समय मानते हैं. यह वह समय है, जब ऋग्वेद लिखा गया था. कुछ इतिहासकार इसका समय 1500 से 1000 ईसा पूर्व भी बताते हैं. हालांकि यह विवादास्पद है. फिर भी भारतीय पौराणिक कथाओं में आश्रम व्यवस्था का जिक्र रहा है. संभवतः यही आश्रम व्यवस्था आगे चलकर अखाड़ा में बदल गई होगी.
ऋषि परशुराम ने बनाई थी ब्राह्मण योद्धाओं की सेना
इसका सबसे बड़ा उदाहरण त्रेतायुग के समय में मिलता है. भगवान विष्णु के सातवें अवतार के तौर पर पहचान रखने वाले महर्षि परशुराम एक ब्राह्मण योद्धा के तौर पर भी जाने जाते हैं. उन्होंने ब्राह्मणों को शास्त्र के साथ-साथ ही शस्त्र विद्या में पारंगत किया था और उनकी सेना भी संगठित की थी. इसके पहले तक ऋषि-महर्षि सिर्फ क्षत्रिय योद्धाओं को ही शस्त्र विद्या सिखाते थे. इसका सीधा उद्देश्य ये था कि क्षत्रियों को समाज का रक्षक माना जाता था, लेकिन परशुराम के समय में क्षत्रियों और राजाओं में बहुत विसंगतियां आ गई थीं. यह राजा अभिमानी थी और आमजन तो क्या ऋषियों पर भी अत्याचार करने से नहीं चूकते थे.
धरती को 21 बार क्षत्रिय विहीन करने का उदाहरण
परशुराम द्वारा धरती को 21 बार क्षत्रिय विहीन कर देने का प्रसंग इसी बात का सबसे बड़ा उदाहरण है. उन्होंने सहस्त्रार्जुन के साथ युद्ध किया और उसका वध करके ऋषि समाज को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई. इस तरह अखाड़ों की जड़ें वैदिक युग में देखी जा सकती हैं. ऋग्वेद और अन्य वैदिक ग्रंथों में ऐसे समाजों का उल्लेख है, जो धर्म और अध्यात्म के प्रसार में लगे हुए थे. उस समय गुरुकुल प्रणाली के माध्यम से साधु शिष्यों को वेद, धर्म, और शस्त्रों की शिक्षा देते थे. उत्तर वैदिक काल तक इस तरह की आश्रम परंपरा काफी लंबी चली, जिसमें शस्त्र के साथ शास्त्र की शिक्षा दी जाती थी.
द्रोणाचार्य-कृपाचार्य भी थे ब्राह्नण योद्धा
महाभारत काल में द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे ब्राह्मण योद्धा इसी परंपरा के तहत शिक्षण पाए ब्राह्मण थे. ये ऋषि और योगी भी थे और योद्धा भी. द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ने तो कौरवों की सेना का सेनापति बनकर महाभारत का युद्ध भी लड़ा था. अश्वत्थामा भी ब्राह्मण योद्धा ही था. संभवतः यही पौराणिक काल के आश्रम, बाद के दिनों में अखाड़ों के नाम से जाने गए हों. क्योंकि ऋषि और साधु भी शारीरिक सौष्ठव का ध्यान रखते थे, व्यायाम करते थे और मल्लयुद्ध (कुश्ती जैसे खेल) का अभ्यास करते थे. ये सभी शारीरिक क्रियाएं अखाड़ों में होती थीं और धीरे-धीरे अखाड़े ही प्रचलित तौर पर अस्तित्व में आ गए. हालांकि ब्राह्मण होना और साधु होना दो अलग बातें हैं.
आदि शंकराचार्य ने रखी थी अखाड़ों की नींव
आधुनिक काल के अखाड़ों का गठन आदिगुरु शंकराचार्य (788-820 ईस्वी) के समय में हुआ. उन्होंने सनातन धर्म की रक्षा के लिए चार मठों की स्थापना की और साधुओं को संगठित करने के लिए अखाड़ों की परंपरा शुरू की. उन्होंने शैव और वैष्णव परंपराओं को संगठित करने के लिए साधुओं को अखाड़ों में बांटा था. शुरुआत में केवल 4 ही अखाड़े बने थे. मध्यकाल (13वीं - 18वीं शताब्दी) में जब धार्मिक और सांस्कृतिक संघर्ष सामने आए तब अखाड़ों की भूमिका खास तौर पर सामने आई थी. मुगल और अन्य विदेशी आक्रमणों के समय अखाड़े धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए योद्धा समूहों में बदल गए. इस दौरान नागा साधुओं ने इस दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. नागा साधुओं को धर्म और समाज की रक्षा के लिए शस्त्र और युद्ध कौशल में प्रशिक्षित किया गया था.
शुरुआत में बने थे केवल 4 अखाड़े
आरंभ में मात्र 4 अखाड़े ही बने थे, लेकिन अभी इनकी संख्या 14 हो चुकी है. जूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़े पुराने माने जाते हैं. वर्ष 2019 में जब प्रयागराज में कुंभ का आयोजन हुआ था तो किन्नर अखाड़े को आधिकारिक रूप से शामिल करने के बाद अखाड़ों की संख्या 14 हो गई थी. इससे पहले 8वीं सदी में बने और फिर 14वीं सदी से अब तक की परंपरा में चले आ रहे 13 अखाड़े ही प्रमुख थे.
मुगल काल में हरिद्वार और प्रयागराज कुंभ मेलों में अखाड़ों ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया था. इसका जिक्र कई किताबों में मिलता है. आधुनिक काल (19वीं शताब्दी के पुनर्जागरण काल से वर्तमान तक) में अखाड़े धार्मिक आयोजनों, विशेष रूप से कुंभ मेले, में एक प्रमुख भूमिका निभाते आ रहे हैं और समाज में धर्म, योग, और सनातन के प्रसार में योगदान दे रहे हैं.
भारतीय संस्कृति और सनातन पद्धति में अखाड़े राष्ट्र रक्षा और धर्म रक्षा के लिए तत्पर रहे हैं. इस प्रकार के संकट से राष्ट्र और धर्म दोनों की रक्षा के लिए अखाड़े के साधु अपनी अस्त्र-शस्त्र विद्या का उपयोग भी किया करते थे. इसी लिए अखाड़े के अन्तर्गत पहलवानों के लिए एक मैदान होता था जिसमें सभी अखाड़े के सदस्य शरीर को सुदृढ़ रखने और संकट के समय में सुरक्षा की दृष्टि से खुद को एक से बढ़कर एक दांव-पेच का अभ्यास किया करते थे.
क्या प्राचीन शब्द अक्षवाट ही अखाड़ा है?
अखाड़ा को लेकर एक कॉन्सेप्ट ये भी है कि यह एक प्राचीन संस्कृत शब्द अक्षवाट का ही बदला हुआ स्वरूप है. राजा अपने दरबार से परे एक बड़ा घिरा हुआ मैदान बनवाते थे. इन मैदानों में शारीरिक खेल प्रतियोगिताएं होती थीं, जिन्हें देखकर राजा आनंद उठाते थे. इसके अलावा राजाओं के बीच द्यूत और चौपड़ खेलने का भी चलन था. इसके लिए भी जो क्रीड़ांगन (खेलने की जगह) बनवाई जाती थी, उसे अक्षवाट कहते थे. अक्षवाट में शारीरिक खेल और कुश्ती जैसे दांव-पेंच होते रहते थे. कालांतर में यही बदलकर अक्खवाट बना. अक्खवाट से अखाड़ा कहलाने लगा.
अखाड़ों के नाम
परंपरा के मुताबिक शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के मान्यता प्राप्त कुल 13 अखाड़े हैं.
शैव संन्यासी संप्रदाय के 7 अखाड़े
1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी- दारागंज प्रयाग
2. श्री पंच अटल अखाड़ा- चैक हनुमान, वाराणसी
3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी-दारागंज, प्रयाग
4.श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती – त्रंब्यकेश्वर, नासिक
5.श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा- बाबा हनुमान घाट, वाराणसी
6.श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा- दशाश्वमेघ घाट, वाराणसी
7.श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा- गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़
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बैरागी वैष्णव संप्रदाय के 3 अखाड़े
8. श्री दिगम्बर अनी अखाड़ा- शामलाजी खाकचौक मंदिर, सांभर कांथा
9. श्री निर्वानी आनी अखाड़ा- हनुमान गढ़ी, अयोध्या
10.श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा- धीर समीर मंदिर बंसीवट, वृंदावन, मथुरा
उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े
11. श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग
12. श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन- कनखल, हरिद्वार
13.श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा- कनखल, हरिद्वार
इसके अलावा किन्नर अखाड़े को भी अब साधु परिषद से आधिकारिक मान्यता मिल चुकी है. इस तरह अखाड़ों की आधिकारिक संख्या अब 14 हो चुकी है.