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सिर्फ भरत से नहीं जुड़ी दिल्ली की पॉलिटिक्स में चर्चित खड़ाऊं... भीष्म-द्रौपदी से चंद्रगुप्त और सम्राट अशोक के भी हैं प्रसंग!

भरत का श्रीराम की खड़ाऊं रखकर शासन चलाने का फैसला, सिर्फ उनका राम के प्रति सम्मान ही नहीं था, बल्कि जनभावना का भी सम्मान था और लोकतंत्र कभी भी किसी की निजी निष्ठा को महत्व नहीं देता है, वह सिर्फ जनता की भावना को महत्व देता है. जनमत को ही सबसे ऊंचा मानता है. 

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सांकेतिक तस्वीर.
सांकेतिक तस्वीर.

दिल्ली की राजनीति में मंगलवार को सिलसिलेवार घटनाक्रम के तहत बड़ा राजनीतिक फेरबदल हो गया. दो दिन पहले किए ऐलान के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और फिर अब तक दिल्ली सरकार में कई मंत्रालयों को संभाल रहीं आतिशी, इस केंद्र शासित प्रदेश की नई और तीसरी महिला सीएम होंगी. यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन AAP सरकार में मंत्री सौरभ भारद्वाज ने इसी बीच ऐसी बात कह दी, जिसे 'सेल्फ गोल' की तरह लिया जा रहा है. 

उन्होंने कहा 'ये बात मायने नहीं रखती की सीएम की कुर्सी पर कौन बैठेगा. जनता ने तो केजरीवाल को चुना था. कुर्सी तो केजरीवाल की है और आगे भी रहेगी. सिर्फ चुनाव तक इस कुर्सी पर भरत की तरह राम की खड़ाऊं रखकर एक व्यक्ति बैठेगा.'

खड़ाऊं पॉलिटिक्स का इतिहास

सौरभ भारद्वाज का ये बयान जैसे ही सामने आया, सियासत में 'खड़ाऊं पॉलिटिक्स' शब्द चर्चा में आ गया. वैसे बता दें कि भारतीय राजनीति के केंद्र में 'खड़ाऊं' की मौजूदगी कोई नई नहीं है. पौराणिक काल में श्रीराम की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर भरत ने शासन चलाया था, ये कथा तो आम है, इसके साथ ही कई ऐसे उदाहरण भी हैं जब पैर में पहनने वाली इस वस्तु की तवज्जो सिर पर पहने जाने वाले मुकुट से ज्यादा आंकी गई है. रामायण, महाभारत, अशोक, चंद्रगुप्त के अलावा लोककथाओं-लोकोत्तियों में ऐसे सैकड़ों उदाहरण दर्ज हैं, जहां खड़ाऊं, मोजड़ी, जूते 'विरासत वाली सियासत' की पहचान बन गए हैं. 

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जब भरत ने श्रीराम की खड़ाऊं रखकर चलाया शासन

त्रेतायुग की ही बात करें, जब श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास मिला तो भरत उन्हें मनाने चित्रकूट पहुंचे. उस समय सिर्फ भरत ने ही नहीं, बल्कि अयोध्या की सारी जनता ने राम को मनाने में पूरा जोर लगा दिया. आखिरकार जब श्रीराम नहीं माने तब भरत ने उनकी जगह 14 वर्षों तक शासन संभालने की जिम्मेदारी तो ली, लेकिन सिर्फ राम के प्रतिनिधि के तौर पर. इस प्रतिनिधित्व का प्रतीक उन्होंने खड़ाऊं को चुना. सवाल ये है कि उन्होंने खड़ाऊं को ही क्यों चुना? मुकुट भी चुन सकते थे. 

असल में खड़ाऊं आधार का प्रतीक है. पूरे शरीर का भार पैरों पर होता है और खड़ाऊं पैरों के नीचे होती है. भरत, श्रीराम को मनाने जाने से पहले ही जनभावना को समझ चुके थे. इतनी बड़ी संख्या में अयोध्यावासी उनके साथ श्रीराम को मनाने गए थे, इसलिए अगर भरत ने पूरे विधि-विधान और राजाओं वाले ठाठ-बाट से शासन संभाला होता तो जनता में विद्रोह भी हो सकता था. रामकथा में जिक्र भी है, जब राजा दशरथ ने रानी कैकेयी के कहने पर श्रीराम को वनवास दिया तो लोग आपस में बात करते हुए सुने जाते हैं कि 'ऐसे राजा के प्रति विद्रोह कर दिया जाना चाहिए जो स्त्री की बातों में आ गया.' 

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संत तुलसीदास मानस में लिखते हैं...

का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा॥
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥
एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥2॥
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी॥
एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥

(राम वनगमन की बात सुनकर अयोध्या के नागरिक कह रहे हैं कि, 'विधाता ने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजा ने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयी को विचारकर वर नहीं दिया. इस वर से वह स्वयं सब दुःखों के पात्र हो गए. स्त्री के वश में होने के कारण उन्होंने ऐसा अघोर फैसला कर लिया, इसी बीच किसी नगरवासी ने तो यह भी शंका जताई कि कहीं इन सब कुचालों में भरत की भी मिलीभगत तो नहीं.)

भरत का श्रीराम की खड़ाऊं रखकर शासन चलाने का फैसला, सिर्फ उनका राम के प्रति सम्मान ही नहीं था, बल्कि जनभावना का भी सम्मान था और लोकतंत्र कभी भी किसी की निजी निष्ठा को महत्व नहीं देता है, वह सिर्फ जनता की भावना को महत्व देता है. जनमत को ही सबसे ऊंचा मानता है. 

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खड़ाऊं का एक दूसरा प्रसंग भी रामकथा से ही मिलता है. जब विभीषण की बातों से क्रोध में आकर रावण उसे लात मारकर निकाल देता है तब विभीषण लंका छोड़ने का फैसला कर लेते हैं. इससे पहले वह अपनी मां कैकसी से मिलने जाते हैं. तब कैकसी उनसे कहती है कि 'मैंने सुना है कि श्रीराम का भाई भरत उनका खड़ाऊं लेकर गया है और उनके नाम पर ही राज संभाल रहा है, और यहां एक भाई, अपने ही भाई को लात मारकर निकाल रहा है.'  कैकसी की इस बात के जरिए लेखक ने राम और रावण के बीच के वैचारिक स्तर को दिखाया है.  

महाभारत में भी प्रासंगिक रही खड़ाऊं

रामकथा के बाद युग बदल जाता है. त्रेतायुग के बाद द्वापर आ जाता है, युग भले ही बदल गया लेकिन नहीं बदली तो खड़ाऊं. महाभारत काल में भी 'खड़ाऊं' अपनी मौजूदगी कई बार दर्ज कराती है. हस्तिनापुर सम्राट महाराज भरत जब चक्रवर्ती हो गए तब उनके सामने उत्तराधिकार का प्रश्न आया. उन्हें दुख था कि उनके आठ पुत्रों में से कोई एक भी हस्तिनापुर जैसे बड़े विशाल साम्राज्य की बागडोर थामने के योग्य नहीं था. ऐसे में राज्य दें तो दें किसे. इसी उधेड़बुन में वह एक बार ऋषि कण्व के आश्रम में पहुंचे.

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ऋषि कण्व, महान ऋषि और राजनीति शास्त्र के पुरोधा तो थे ही, साथ ही सम्राट भरत के नाना भी थे. जब मेनका ने नवजात शकुंतला को उनके आश्रम के बाहर छोड़ दिया था, तब उन्होंने शकुंतला का पालन-पोषण किया था. सम्राट ने अपने नाना कण्व ऋषि के आगे उत्तराधिकार का यही प्रश्न रखा, तब कण्व ऋषि ने कहा कि 'तुम चक्रवर्ती जरूर हो गए हो लेकिन अपना मन नहीं जीत सके हो, वह कहते हैं कि 'याद रखो सम्राट, साम्राज्य तुम्हारे पैर की खड़ाऊं नहीं है, जो तुम यूं ही किसी को उपभोग करने के लिए दे दो. वे तुम्हारे प्रिय पुत्र जरूर हो सकते हैं, लेकिन अच्छे प्रजापालक हैं या नहीं, यह जांचने-परखने के लिए उनकी परीक्षा लो और फिर तय करो.'

तब हस्तिनापुर सम्राट भरत ने अपने आठों पुत्रों को अयोग्य पाया और फिर भारद्वाज पुत्र भूमन्यू की योग्यता को समझकर उन्हें सम्राट घोषित किया. इस तरह मुकुट के बजाय खड़ाऊं यहां भी राजनीति  की केंद्रीय भूमिका में रही. सम्राट भरत की ये कहानी, हस्तिनापुर में कौरव-पांडवों की प्रसिद्ध महाभारत वाली कहानी से बहुत पहले की है और इसे पौराणिक कथाओं में लोकतंत्र का महत्व बताने वाली कहानी के तौर पर देखा जाता है.

भरत और भीष्म की प्रतिज्ञा में अंतर

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इसी हस्तिनापुर में आगे चलकर महाराज शांतनु हुए. उन्होंने अपने पुत्र देवव्रत को हर तरह से योग्य उत्तराधिकारी मानकर युवराज और अगला राजा घोषित कर दिया था, लेकिन इसी बीच उन्हें सत्यवती नाम की एक मछुआरिन से प्रेम हो गया. सत्यवती के पिता ने जब विवाह के लिए यह शर्त रखी कि सत्यवती के ही पुत्र आगे चलकर हस्तिनापुर के राजा बनें तब देवव्रत आगे आए और उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा उठा ली. इसी प्रतिज्ञा के बाद वह भीष्म कहलाए, लेकिन भीष्म की प्रतिज्ञा सिर्फ इतनी सी ही नहीं थी, उन्होंने यह भी कहा था कि 'जो भी कोई हस्तिनापुर के इस सिंहासन पर बैठेगा, उसमें वह अपने पिता महाराज शांतनु की ही छवि देखेंगे,जैसे उनके चरणों की सेवा करते रहे वैसे ही करेंगे. उसके पदचिह्नों में पिता के पदचिह्न और खड़ाऊं की चाप में पिता की पदचाप सुनेंगे.'

महाभारत की कथा के आगे के प्रसंग बताते हैं कि भीष्म की यह प्रतिज्ञा आगे चलकर उन्हें बहुत भारी पड़ी. रामायण में जो लोग भरत की 'खड़ाऊं प्रतिज्ञा' का उदाहरण देकर फूले नहीं समाते हैं, वही लोग भीष्म की 'खड़ाऊं प्रतिज्ञा' को बहुत व्यावहारिक नहीं मानते और इसकी बहुत अधिक प्रशंसा नहीं करते हैं, बल्कि लोग यह कहते सुने जाते हैं कि भीष्म ने ऐसी प्रतिज्ञा नहीं ली होती तो महाभारत होती ही नहीं. यहां सारा खेल जनभावना का ही है. भरत ने जनभावना की कद्र करते हुए खड़ाऊं पॉलिटिक्स की, लेकिन भीष्म ने जनभावना के उलट जाकर.

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श्रीकृष्ण की नीति में शामिल रही खड़ाऊं

खुद श्रीकृष्ण भी एक मौके पर भीष्म को उनकी इस प्रतिज्ञा के लिए लताड़ते नजर आते हैं. वह कहते हैं कि आपने जो सोचकर यह प्रतिज्ञा ली थी क्या सबकुछ उसके अनुसार ही हो रहा है? आपने यह कैसे मान लिया था कि हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठने वाला हर राजा आपके पिता की ही तरह न्यायप्रिय और न्यायशील ही होगा. भीष्म इस बात को अपने आखिरी समय में समझ भी जाते हैं, इसलिए महाभारत के शांतिपर्व में वह जब युधिष्ठिर को राजनीति का अंतिम ज्ञान देते हैं तो कहते हैं कि 'संसार में प्रतिज्ञा, धरती से भी भारी है. इसे बहुत सोच-समझकर लेना.'

श्रीकृष्ण का जिक्र निकल आया है तो उनकी ही ओर चलते हैं. नीति निर्माण के पुरोधा और राजनीति को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले महाभारत के इस महानायक ने भी कई बार 'खड़ाऊं' का प्रयोग राजनीति को साधने के लिए किया है. पांडवों ने जब इंद्रप्रस्थ बसाया और अपने नए राज्य का निर्माण कर लिया तब उन्होंने राजसूय यज्ञ करने की ठानी. उनके द्वारा लिए गए इस निर्णय से हस्तिनापुर से लेकर हर ओर हलचल मच गई. दो तरह के मत सामने आए कि, जिसमें से एक कहता था कि पांडव भले ही अलग राज्य बना चुके हैं, लेकिन वह हस्तिनापुर से अलग नहीं हैं. उनके ताऊ धृतराष्ट्र के जीवित रहते उन्हें राजसूय यज्ञ करना सही नहीं रहेगा. उस समय राजाओं के राज्य संचालन में ऋषियों की बड़ी भूमिका थी. 

श्रीकृष्ण ने इस तरह के मतों को सुना और बोले राजसूय यज्ञ का आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाए और इससे पहले पांडव ऋषि पूजा का संकल्प लें. जब यज्ञ के लिए सभी को दायित्व बांटे जा रहे थे तो श्रीकृष्ण ने अपने लिए काम चुना, 'वह ऋषियों की खड़ाऊं उतारेंगे, उनके पैर धुलवाएंगे और भोजन के बाद जूठी पत्तलें उठाएंगे.' जब सभी ऋषि आए तो श्रीकृष्ण ने ऐसा ही किया, पांडवों ने भी उनका सहयोग किया. द्वारिकाधीष को इस तरह निर्लिप्त भाव से सेवा करते देखकर ऋषि समाज बहुत प्रसन्न हुआ और उन्होंने वरदान मांगने को कहा. श्रीकृष्ण ने इसी समय ऋषियों से पांडवों के लिए  राजसूय यज्ञ करने की आज्ञा मांग ली. प्रसन्न ऋषियों ने पांडवों को राजसूय यज्ञ करने की आज्ञा दी और उसमें सफल होने का आशीर्वाद भी दिया. इस तरह पांडवों का राजसूय यज्ञ पूरा हुआ.

जब द्रौपदी की खड़ाऊं ने दिलवाया पांडवों को अभयदान

श्रीकृष्ण की खड़ाऊं नीति का जिक्र महाभारत के युद्ध में भी मिलता है. युद्ध के दौरान एक दिन भीष्म पितामह ने अर्जुन को मारने और युधिष्ठिर को बन्दी बनाने की शपथ ले ली थी. इस प्रतिज्ञा की कोई काट नहीं थी, क्योंकि सभी जानते थे कि अगर पितामह भीष्म ने प्रतिज्ञा ली है तो वह जरूर पूरा करेंगे. तब श्रीकृष्ण ने एक योजना बनाई. उन्होंने द्रौपदी से कहा कि ग्वालिन के वस्त्र पहन लो और चेहरा पूरी तरह ढक लो. फिर वे द्रौपदी को ब्रह्म मुहूर्त से पहले छिपाकर भीष्म पितामह के शिविर में ले जा रहे थे. 

योजना ये थी कि पितामह भीष्म ब्रह्म मुहूर्त में उठकर साधना करते थे और जब पूजा समाप्ति होती थी उस दौरान द्वार पर कोई आ जाए वह खाली हाथ नहीं लौटता था. जब श्रीकृष्ण द्रौपदी को छिपते-छिपाते ले जा रहे थे तो रास्ते में चलते हुए द्रौपदी की खड़ाऊं बज रही थी. इससे गुप्तचरों को आभास हो जाता, इसलिए श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की खड़ाऊं निकलवाकर अपने हाथ में उठा ली. द्रौपदी छुपकर भीष्म के शिविर के बाहर पहुंची और वहीं बैठकर सुबकने लगी. 

जब भीष्म ने स्त्री के रोने का स्वर सुना तो बाहर आए और उनसे रोने का कारण पूछा. तब ग्वालिन बनी द्रौपदी ने कहा, मेरे पति और उनके भाई युद्ध में शामिल हैं, मुझे उनके प्राणों का संकट है. मुझे आपसे उनके लिए अभयदान चाहिए. भीष्म ने कहा कि युद्ध में प्राणहानि होने का खतरा तो रहता ही है. तब द्रौपदी ने कहा कि अगर आप आश्वासन दे देंगे तो मुझे ये डर नहीं रह जाएगा. वचन से बंधे भीष्म पितामह ने ग्वालिन बनी द्रौपदी को उसके पति और भाइयों को अभयदान दे दिया. फिर उन्होंने पूछा कि तुम्हारे पति कितने भाई हैं. द्रौपदी ने कहा- पांच... ये सुनकर भीष्म चौंक गए. 

भीष्म समझ गए कि जरूर ये बुद्धि किसी और की है, उन्होंने कहा, मैं तुम्हारे पतियों को अभयदान देता हूं, लेकिन अपना परिचय दो और उसे बुलाओ जो तुम्हें लेकर आया है. ये सुनते ही द्रौपदी ने अपना पल्लू उठा लिया और इतने में ही श्रीकृष्ण अंदर आ गए. उन्होंने पितामह को प्रणाम करने के लिए जैसे ही हाथ जोड़े तो उनके दोनों हाथों में द्रौपदी की खड़ाऊं बज गई. भीष्म ने अपने आसन से उठकर कृष्ण के हाथ पकड़ लिए और बोले, जिसे बचाने के लिए तीनों लोक के अधिपति खड़ाऊं उठाने को तैयार हैं , तो उसे कौन मार सकता है. इस तरह कृष्ण ने सिर्फ एक खेल के जरिए पांडवों की जान बचा ली. 

चंद्रगुप्त के पैरों में मगध सम्राट की खड़ाऊं

खड़ाऊं सिर्फ पौराणिक कहानियों में ही राजनीति के साथ नहीं चली है, बल्कि भारतीय इतिहास के कई राजाओं के साथ भी मौजूद रही है. जब चाणक्य, अपने शिष्य चंद्रगुप्त को मगध के खिलाफ तैयार कर रहे थे तो उस दौरान चंद्रगुप्त मगध की सेना में ही घनानंद के सैनिक थे. एक दिन दरबार लगा हुआ था और इसी दौरान सिंहासन से पीछे की ओर आग लग गई. इससे अफरा-तफरी मच गई. थोड़ी देर बाद जब सबकुछ शांत हुआ तो घनानंद की नजर सैनिक चंद्रगुप्त के पांव पर गई, जिनमें उसकी खड़ाऊं थीं. असल में ये सब चाणक्य का किया धरा था, जो एक संकेत था कि मगध इसी तरह विद्रोह की आग में जलने वाला है और जैसे ये खड़ाऊं चंद्रगुप्त के पैरों में है, पूरे राज्य की जमीन भी घनानंद के पैरों तले खिसक जाएगी.

खड़ाऊं और सम्राट अशोक की विरासत

अशोक के साम्राज्य में भी 'विरासत वाली खड़ाऊं' का जिक्र मिलता है. कई इतिहासकार मानते हैं कि अशोक ने अपने 99 भाइयों को मारकर राज्य पर अधिकार किया था, इसलिए उसे चंड अशोक का नाम दिया जाता है, लेकिन कलिंग युद्ध के बाद वह बदल गया था और उसने खुद को चंड से देवानामं प्रियं अशोक में बदलने के लिए राज्य में बहुत परमार्थ के कार्य कराए. उस पर बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का बहुत प्रभाव पड़ा और आए दिन बौद्ध भिक्षु, अशोक के दरबार में मठ आदि की व्यवस्था के लिए आते रहते थे. अशोक का एक भाई और भी था जिसका नाम था तिस्सा. एक दिन कुछ बौद्ध भिक्षु मठ के लिए अशोक के पास सहायता मांगने आए तब तिस्सा ने भरे दरबार में उनकी आलोचना की और उन्हें बहरूपिया तक कहा. वह मदिरा के नशे में था और इस बात से नाराज था कि बौद्ध भिक्षुओं के आने से सम्राट अशोक ने नर्तकियों का नृत्य तुरंत रोक दिया था. 

अशोक ने उस समय तो तिस्सा को कुछ नहीं कहा, लेकिन अपने एक मंत्री को जो कि तिस्सा का मित्र भी था, उसे कुछ योजना समझायी. एक दिन दरबार के बाद अशोक ने मुकुट उतारकर सिंहासन के पास रखा और वहां से चला गया. तिस्सा अपने मंत्री मित्र के साथ दरबार में ही बैठा था. अशोक के जाते ही मंत्री ने तिस्सा से कहा, 'तिस्सा मुझे कभी-कभी लगता है कि ये मुकुट तुम्हारे सिर पर कितना सुंदर जंचता. तिस्सा ने कहा, अरे नहीं- मुझे यह नहीं चाहिए. तब मंत्री ने उकसाते हुए कहा- एक बार पहन कर देखने में क्या हर्ज है? तिस्सा उसकी बातों में आ गया और मुकुट पहनकर देखने लगा. अभी उसने मुकुट पहना ही था कि योजना के अनुसार अशोक वापस आ गया. 

उसने तिस्सा को मुकुट पहने देखकर डांटा और राजद्रोही करार दिया. राजद्रोह की एक ही सजा थी मृत्युदंड. अशोक ने कहा कि आज से सात दिन बाद तुम्हें मृत्युदंड दिया जाएगा, लेकिन तुम मेरे भाई भी हो और तुम्हारी आखिरी इच्छा भी पूरी करना मेरा धर्म है. तुम्हें मुकुट पहनने की लालसा थी न, तो ये लो ये मुकुट सात दिनों के लिए तुम्हारा, तुम मेरा ये चंवर और छत्र भी लो और इसके नीचे बैठो. मैं तुम्हें अपना अंगरखा भी देता हूं जो इस साम्राज्य के फैलाव का प्रतीक है, और ये लो मेरी खडाऊं, जो इस भूमि पर मेरे आधार और अधिकार संकेत है, यह भी तुम्हें देता हूं. अशोक ने तिस्सा को सात दिन का सम्राट बनाया, लेकिन तिस्सा इसे पूरे पल को एक बार भी महसूस नहीं कर सका. सात दिन बाद जब उसकी मृत्यु का समय आया तो अशोक ने उससे पूछा कि ये सात दिन कैसे रहे. 

तब तिस्सा कहता है कि ये मुकुट आकाश से भी भारी था, ये अंगरखा मुझे सातों दिन जलाता रहा है और ये खड़ाऊं, क्या ये आपको कंकड़-कांटे चुभने से बचाती है? मुझे तो खुद इसी ने पांव में काट लिया है, और तिस्सा ने अपने पांव के घाव दिखाए. तिस्सा ने कहा कि मैं सातों दिन रोज मरा हूं, आज बस रस्म अदायगी होनी है, और अब आप जल्द इसे पूरा कीजिए. तब अशोक कहता है कि, जो मैं तुम्हें समझाना चाहता था वो तुम समझ चुके हो तिस्सा... राज्य सिर्फ राजा की खड़ाऊं नहीं है जो उसके अधिकार और सुरक्षा के लिए है. इसलिए अब तुम ही इस बड़े राज्य को संभालों, क्योंकि तुम योग्य राजा बन गए हो. मैंने सिर्फ मृत्युदंड का खेल खेला था. ये सुनकर तिस्सा कहता है कि मैं अब जीवन से मुक्त हो चुका हूं, इसलिए इस जीवन में वापस नहीं लौटूंगा. ये लीजिए मुकुट, अंगरखा और खड़ाऊं... इसके बाद तिस्सा ने राज्य छोड़ दिया. कहते हैं कि वह कहां गया कोई नहीं जानता, लेकिन कुछ कहते हैं कि वह भी बौद्ध हो गया. बुद्ध के समान हो गया. लालसा से मुक्त.

ये कथाएं, किस्से-कहानियां इतिहास में दर्ज कुछ प्रसंग भर नहीं हैं, ये अपने आप में दस्तावेज हैं, जो न सिर्फ मानवता का मूल मंत्र हैं, बल्कि राजनीति और राज्य के लिए तंत्र भी हैं. यह लोकतंत्र की जरूरत और उसकी शक्ति को स्थापित करते हैं और खड़ाऊं इस शक्ति के सबसे बड़े प्रतीक रहे हैं. खड़ाऊं के जोड़े राजा और प्रजा का संबंध स्थापित करते हैं और ये बताते हैं कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए दोनों के बीच सामंजस्य बेहद जरूरी है. जैसे एक खड़ाऊं खराब हो, या खो जाए तो व्यक्ति एक कदम नहीं चल सकता वैसे ही राज्य भी प्रगति नहीं कर सकता है. 16 संस्कारों में से एक उपनयन के दौरान इसीलिए शिखा बांधने, जनेऊ पहनाने, लंगोट कसने और अंगवस्त्र ओढ़ने के साथ खड़ाऊं देने की मान्यता है और यह जीवन में संतुलन की परिभाषा भी है. इसलिए राजनीति में मुकुट से अधिक खड़ाऊं प्रासंगिक रही है.

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