मार्च 1966 में भारत की प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद इंदिरा गांधी अमेरिका गईं. हिन्दुस्तान में साधारण लिबास में रहने वालीं इंदिरा का अंदाज इस दौरे में ग्लैमरस था. राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन तो इंदिरा पर मोहित हो गए. राष्ट्रपति उनकी इतनी तारीफ़ करते थे कि उन्होंने प्रोटोकॉल भी तोड़ दिया, इसकी बड़ी चर्चा हुई. वे प्राइवेट पार्टियों में चक्कर लगाते, उन दावतों में भी जाते जहां उन्हें गेस्ट ऑफ़ ऑनर के तौर पर नहीं बुलाया गया था. इस दौरान उन्होंने खूब बोरबॉन बीयर गटके.
" एक ही चीज थी जो इंदिरा ने करने से मना कर दिया, वह थी व्हाइट हाउस के बैंक्वेट में अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ डांस फ्लोर पर नाचना, उन्होंने जॉनसन को समझाया कि इससे वह भारत में लोग उनके बारे में बातें बनाएंगे. जॉनसन ने अपनी तरफ से कहा कि वह यह देखना चाहते हैं कि 'इस लड़की को कोई नुकसान न हो'..." (इंदिरा: द लाइफ ऑफ इंदिरा नेहरू गांधी, कैथरीन फ्रैंक)।
लेकिन "वह लड़की" पहले से ही मुश्किल में थी.
वो संकट जो विरासत में मिली
जब जनवरी 1966 में इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनीं, तो उन्होंने दशकों से जमा हो रही आर्थिक तबाही विरासत में पाई.
भारत में खर्चा-पानी की स्थिति एक कागजी महल की तरह थी. थोड़ी सी हवा भी इसे ढहा सकती थी. 1965 तक हालात बेहद गंभीर हो चुके थे.
भारत का व्यापार घाटा 930 करोड़ रुपये से ज्यादा था (यानी कि निर्यात से अधिक आयाता). बजट घाटा कुल खर्च का लगभग 25% था, मुद्रास्फीति लगातार 5% से ऊपर बनी हुई थी. और देश सिर्फ विदेशी सहायता पर टिका हुआ था, विदेशी मदद रूकती तो इंडिया की कहानी डूबनी तय थी.
असली समस्या क्या थी
आज के उलट तब रुपये की कीमत मार्केट तय नहीं करता था. इसे आधिकारिक तौर पर एक डॉलर के मुकाबले 4.76 रुपये पर फिक्स किया गया था.
लेकिन यह सब तो कल्पना थी. भारत में महंगाई ज्यादा थी, खराब एक्सपोर्ट परफॉर्मेंस की वजह से रुपया कमज़ोर था और सहारे के बिना चल नहीं पा रहा था. सरकार असल में रुपये को डॉलर से उस रेट पर बदलने का वादा कर रही थी जिस पर अब बाज़ार को भरोसा नहीं था.
वर्ल्ड बैंक ने भारत के वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी को इस शर्त पर मदद की पेशकश की कि भारत रुपये का अवमूल्यन करे. कृष्णमाचारी को यह बात बुरी लगी और उन्होंने वर्ल्ड बैंक की शर्त मानने से इनकार कर दिया.
शास्त्री की चाल
1965 की लड़ाई के बाद रक्षा के मोर्चे पर खर्च बढ़ गया, महंगाई बढ़ गई और मदद मिलनी बंद हो गई क्योंकि अमेरिका और उसके सहयोगी, जो पाकिस्तान का साथ दे रहे थे चाहते थे कि भारत मुश्किलों में घिरा रहे.
पत्रकार टीएन नैनन लिखते हैं कि वर्ल्ड बैंक रुपये की बड़ी गिरावट पर ज़ोर दे रहा था. “इस मुद्दे पर 1965 में चर्चा हुई थी और अगर (अमेरिका में तत्कालीन भारतीय राजदूत) बी के नेहरू के बयान (नाइस गाइज़ फिनिश सेकंड) पर यकीन करें तो लाल बहादुर शास्त्री ने जनवरी 1966 में ताशकंद जाने से पहले ही रुपये की कीमत कम करने का फैसला कर लिया था; बल्कि इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड को तो घोषणा की तारीख (जून 1966) भी बता दी गई थी. इससे पहले एक और राजनीतिक घटनाक्रम हुआ. पिछले दिसंबर में शास्त्री ने अपने वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी को रुपये की कीमत कम करने का विरोध करने के लिए हटा दिया था.”
लेकिन फैसला सुनाए जाने से पहले ही शास्त्री की ताशकंद में मौत हो गई. और यह समस्या इंदिरा गांधी के पास चली गई.
1966: आखिरी तिनका
6 से 27 मई 1966 के बीच भारत की विदेशी मुद्रा भंडार में तेज़ी से गिरावट हुई. 19.13 करोड़ रुपये से घटकर सिर्फ़ 7.29 करोड़ रुपये. यानी 65% की भारी गिरावट.
इस बीच बीके नेहरू से एलके झा (प्रधानमंत्री के सचिव) को भेजे गए एक केबल ने डिवैल्यूएशन का रास्ता और भी साफ कर दिया. बीके नेहरू ने कहा- अगर भारत डिवैल्यूएशन नहीं करता है, तो उसे मदद नहीं मिल सकती है. क्योंकि भारत अपने कमिटमेंट नहीं बदल सकता था. (शॉर्टफॉल:प्रमित भट्टाचार्य)
विदेशी मुद्रा भंडार का गोता लगाना, वर्ल्ड बैंक और पश्चिम के दबाव के कारण भारत मुश्किलों के चक्रव्यूह में फंस चुका था. इंदिरा गांधी ने कई अर्थशास्त्रियों से सलाह ली, और उन्हें बताया गया कि विकल्प सीमित थे: आयात को आसान बनाना, भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धी बनाना, और रुपये को असली कीमत तक ले जाने के लिए उसका डिवैल्यूएशन करना.
इस तारीख को याद रखिए
5 जून का दिन इंदिरा गांधी की किस्मत से गहराई से जुड़ा हुआ है. 1984 में इसी तारीख को ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत उन्होंने भारतीय सेना को आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए गोल्डन टेंपल में घुसने का आदेश दिया था. इस फैसले का नतीजा दुखद रहा.
लेकिन बात इससे पहले की है. 5 जून 1966 को एक और ड्रामा शुरू होने वाला था. जिसका भी अंत सुखद नहीं होना था.
इंदिरा अपना मन पक्का कर चुकी थीं. इंदिरा गांधी ने अपना फैसला अपनी कैबिनेट को बताया. रुपये की कीमत 57% कम की जाएगी. अब इसे डॉलर के मुकाबले 7.5 (पहले 4.76) पर फिक्स किया जाएगा. यानी कि अब एक डॉलर की कीमत 4.76 रुपये से बढ़कर 7.5 रुपये होने जा रही थी. खबरों के मुताबिक सिर्फ तीन मंत्री उनसे सहमत थे – वित्त मंत्री सचिन चौधरी, कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम और योजना मंत्री अशोक मेहता. कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज को शुरू में इस बारे में कुछ नहीं बताया गया था.
राजनीतिक बवंडर
जब यह खबर फैली तो तुरंत ही इसका विरोध शुरू हो गया. इंदिरा गांधी को उम्मीद थी कि विपक्ष हंगामा करेगा, लेकिन वह अपने ही खेमे से होने वाले गुस्से के लिए तैयार नहीं थीं.
के. कामराज जो कांग्रेस के शक्तिशाली अध्यक्ष थे और उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई थी, इंदिरा के इस फैसले से बहुत गुस्से में थे. उनसे सलाह नहीं ली गई थी और उन्हें लगा कि यह कदम "पश्चिमी साम्राज्यवाद" के आगे आत्मसमर्पण है. कामराज के नेतृत्व में CWC ने अवमूल्यन के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया.
वामपंथियों ने इंदिरा को "विश्व बैंक की कठपुतली" कहा, जबकि दक्षिणपंथियों ने आर्थिक दिवालियापन स्वीकार करने के लिए सरकार का मज़ाक उड़ाया. नेहरू के समर्थकों को लगा कि इंदिरा ने अपने पिता की आत्मनिर्भरता की नीति के साथ धोखा किया है.
एक हफ़्ते बाद इंदिरा गांधी ने देश को संबोधित किया और इस फैसले का बचाव करते हुए इसे टाला न जा सकने वाला बताया. “हर देश के इतिहास में ऐसे समय आते हैं जब उसकी इच्छाशक्ति की परीक्षा होती है और उसका भविष्य मजबूत कार्रवाई और साहसिक फैसलों की क्षमता पर निर्भर करता है. भारत में यह ऐसा ही समय है... युद्ध और सूखे से बिगड़े हालात के कारण आर्थिक विकास अस्थायी रूप से धीमा हो गया है, और लगभग रुक गया है.देश में चीजों की कमी है. बैलेंस ऑफ़ पेमेंट्स संकट ने औद्योगिक क्षमता को बेकार कर दिया है और छंटनी के लिए मजबूर किया है. छोटे उद्योगों पर खास तौर पर बुरा असर पड़ा है. निर्यात रुक गया है. कीमतें तेज़ी से बढ़ी हैं. निराशा, बेचैनी और अनिश्चितता है.”
धोखा
जब इंदिरा गांधी कैमरों के सामने रुपये की नई कीमत का बचाव कर रही थीं, तो उद्योग भवन के गलियारों में एक शांत विद्रोह पनप रहा था. वाणिज्य मंत्री मनुभाई शाह, जो वर्ल्ड बैंक को शक की नज़र से देखते थे, सिर्फ़ नाखुश नहीं थे, बल्कि वह विरोध कर रहे थे.
दो महीने के अंदर शाह ने डिवैल्यूएशन के असर को खत्म करने के लिए एकतरफ़ा तौर पर व्यापार नीतियों को पलटने का फैसला किया. उन्हें सरकार के अंदर से और कामराज के नेतृत्व वाले सिंडिकेट से मज़बूत समर्थन मिला, जो यह देखकर हैरान थे कि इंदिरा गांधी वैसी कठपुतली नहीं थीं जैसा उन्होंने सोचा था.
इंदिरा गांधी को वर्ल्ड बैंक और जॉनसन एडमिनिस्ट्रेशन ने "कुछ लेने के बदले कुछ देने" का वादा किया था. रुपये की वैल्यू कम करो, और उसके बदले में भारी मात्रा में मदद और गेहूं (PL-480) मिलेगा. उन्होंने अपना वादा निभाया. अमेरिका ने नहीं.
900 मिलियन अमेरिकी डॉलर की पहली सहायता किश्त काफी देरी से आई. साथ हीभारत का एक्सपोर्ट कम हो गया और कर्ज की देनदारियां बढ़ गईं. डोनर्स ने अगली किश्त घटाकर 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर कर दी. भारत को एक और सूखे का सामना करना पड़ा. इसके बाद मंदी और खाने की कमी हो गई. भारत अब उदारीकरण की अपनी कोशिशों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा था.
एक कड़वी सीख
जैसा कि इकोनॉमिस्ट्स ने अनुमान लगाया था कि डिवैल्यूएशन से निर्यात बढ़ेगा, इस कदम से जरूरी आयात जैसे- फ्यूल और फर्टिलाइज़र की कीमत बढ़ गई. महंगाई डबल डिजिट में पहुंच गई और आम आदमी जो पहले से ही दो साल के सूखे से परेशान था, उसे खाने की चीज़ों की भारी कमी का सामना करना पड़ा.
1967 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा उसने कई राज्यों में अपनी मेजॉरिटी खो दी और लोकसभा में सिर्फ़ थोड़ी सी बढ़त बनाए रख पाई. इंदिरा ने तय किया कि उन्हें खेल बदलना होगा.
खोई हुई ज़मीन वापस पाने के लिए उन्होंने तेज़ी से लेफ्ट की ओर रुख किया. इसके बाद बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969) और प्रिवी पर्स को खत्म करने का रास्ता खुला.
सरकार और पार्टी के अंदर उन्होंने खुद को "गूंगी गुड़िया" से बदलकर गरीबों की चैंपियन और आयरन लेडी बना लिया. जल्द ही विरोधियों को बाहर निकाल दिया गया, सिंडिकेट को किनारे कर दिया गया और इंदिरा गांधी एक ऐसी नेता बन गईं जो असहमति बर्दाश्त नहीं करती थीं.
उन्होंने अपनी बाकी ज़िंदगी यह पक्का करने में बिताई कि चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति हों या उनकी अपनी पार्टी के बॉस कोई भी उन्हें फिर से वो लड़की न समझे जिसे 'प्रोटेक्शन' की जरूरत है.
1966 का डिवैल्यूएशन तकनीकी रूप से ज़रूरी था लेकिन राजनीतिक रूप से विनाशकारी रहा. 25 साल लग गए, 1991 का संकट आया तब जाकर किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने फिर से रुपये का काफी हद तक डिवैल्यूएशन करने और अर्थव्यवस्था को उदार बनाने का राजनीतिक साहस दिखाया.