scorecardresearch
 

दुनिया में आ गया AI का बूम... क्या भारत अमीर देशों के साथ इस रेस में ट‍िक पाएगा?

दुनिया तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में प्रवेश कर चुकी है. भारत में भी AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है. छात्र, दुकानदार और प्रोफेशनल रोजमर्रा के कामों में इसका सहारा ले रहे हैं. लेकिन आंकड़े बता रहे हैं कि अमीर देश कहीं ज्यादा तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं. सवाल ये है कि क्या भारत इस तकनीकी रेस में बराबरी कर पाएगा, या बढ़ता फासला नई चुनौती बन जाएगा.

Advertisement
X
AI अपनाने में भारत मिडिल में, टॉप पर अमीर देश. (Representatonal image made with AI)
AI अपनाने में भारत मिडिल में, टॉप पर अमीर देश. (Representatonal image made with AI)

कोई स्टूडेंट चैट जीपीटी से अपना इंग्लिश होमवर्क सुधार रहा है तो कोई दुकानदार AI  से अपने प्रोडक्ट की लिस्टिंग लिख रहा है. कोडर चैटबॉट से अपनी ऐप की गड़बड़ी ठीक कर रहा है. मुंबई, बेंगलुरु और कई छोटे शहरों में भी, जिनका नाम आपने शायद कभी न सुना हो, वहां एआई अपनी पकड़ बना रहा है.

अब AI सिर्फ टेक ऑफिस तक सीमित नहीं है.ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है.साल 2025 में भारत ने एक नया मोड़ देखा. अब देश में करीब 16 फीसदी कामकाजी लोग AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.वहीं छह महीने पहले ये आंकड़ा 14 फीसदी था. 

पहली नजर में ये अच्छी खबर लगती है. लेकिन असली परेशानी ये है कि अमीर देश हमसे कहीं ज्यादा तेजी से AI अपना रहे हैं.

बढ़ता अंतर, बढ़ती चिंता

2025 की शुरुआत में अमीर और गरीब देशों के बीच AI के इस्तेमाल का अंतर 9.8 प्रतिशत अंक था. दिसंबर तक ये बढ़कर 10.6 प्रतिशत अंक हो गया और ये फासला लगातार बढ़ता जा रहा है.

आपको इसकी चिंता क्यों करनी चाहिए?

देख‍िए, AI कोई खेल या शौक नहीं है.ये अब पढ़ाई और काम करने का अहम टूल बनता जा रहा है. इसे शुरुआती दौर के स्मार्टफोन की तरह समझिए जो पहले कुछ लोगों के पास थे, फिर बिना स्मार्टफोन के कंपट‍िशन में टिकना मुश्किल हो गया.

Advertisement

आज AI भी उसी रास्ते पर है, बस कहीं ज्यादा तेजी से. बस समझने वाली बात ये है कि अगर अमीर देश AI पहले अपनाते हैं तो फायदा भी उन्हें पहले मिलेगा. उनके कर्मचारी ज्यादा प्रोडक्टिव होंगे, उनके छात्र तेजी से सीखेंगे, उनकी कंपनियां तेजी से बढ़ेंगी और बाकी देश धीरे-धीरे पीछे छूट जाएंगे.

आंकड़ों में पूरी तस्वीर

भारत: 2025 के आखिर में 15.7% कामकाजी लोग AI इस्तेमाल कर रहे थे (पहले 14.2%)
दुनिया: AI इस्तेमाल 15.1% से बढ़कर 16.3% हुआ
अमीर देश: सिर्फ छह महीने में 1.8 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी
गरीब देश: सिर्फ 1 प्रतिशत अंक यानी आधी रफ्तार
सबसे आगे देश: UAE- 64%, सिंगापुर-61%, नॉर्वे, आयरलैंड और फ्रांस- 44% से ऊपर
भारत की स्थिति: हम ज्यादातर गरीब देशों से आगे हैं लेकिन हर अमीर देश से पीछे हैं. 
रफ्तार: AI अपनाने में सबसे तेज बढ़त वाले टॉप 10 देश सभी अमीर अर्थव्यवस्थाएं हैं

ये अंतर क्यों है?

अमीर देशों के पास वो सुविधाएं हैं जो भारत में हर किसी तक नहीं पहुंची हैं. जैसे तेज इंटरनेट, सस्ता डेटा, हर हाथ में स्मार्टफोन और हर जगह चलने वाला डिजिटल पेमेंट सिस्टम अभी तक आम लोगों की पहुंच से दूर है. 

इसके अलावा ज्यादातर AI टूल्स अंग्रेजी में बेहतर काम करते हैं जिससे हिंदी, तमिल, बंगाली और मराठी बोलने वाले करोड़ों लोग पीछे रह जाते हैं. कई AI टूल्स के लिए क्रेडिट कार्ड जरूरी होता है, जबकि ज्यादातर भारतीयों के पास क्रेडिट कार्ड नहीं है. 

Advertisement

यही नहीं, अच्छे AI टूल्स महंगे हैं मसलन चैट जीपीट की कीमत करीब $20 महीना यानी लगभग 1700 रुपये है. फिर दूसरा पॉइंट कि महंगे फोन पर AI बेहतर चलता है, लेकिन ऐसे फोन हर कोई नहीं खरीद सकता. ये सारी रुकावटें मिलकर AI को अपनाने की रफ्तार धीमी कर देती हैं और अंतर और बढ़ जाता है.

क्या बदल सकता है?

भारत पहले भी ऐसा कर चुका है, वो भी दो बार. याद है जब मोबाइल डेटा 250 रुपये प्रति GB था? फिर Jio आया, दाम गिरे और इस्तेमाल बढ़ गया. याद है जब डिजिटल पेमेंट मुश्किल था? फिर UPI आया और आज सब्जी वाला भी UPI इस्तेमाल करता है.
AI के साथ भी ऐसा ही हो सकता है लेकिन इसके लिए कुछ जरूरी चीजें चाहिए. 

क्या होना जरूरी है

कम लागत: अभी फ्री AI टूल्स आ रहे हैं. डीप सीक इसका एक उदाहरण है, जे ओपन-सोर्स और बिना सब्सक्रिप्शन के हैं. 

लोकल भाषाएं: AI को हिंदी, तमिल, तेलुगु और बंगाली में भी उतना ही अच्छा काम करना होगा. 

आसान एक्सेस: न क्रेडिट कार्ड, न जटिल साइन अप, बस डाउनलोड करो और इस्तेमाल करो. 

काम के टूल्स: बिल बनाने के लिए AI, दस्तावेजों का अनुवाद, होमवर्क में मदद, कस्टमर सर्विस...अगर ये सब हुआ तो AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ सकता है.

Advertisement

दांव पर क्या है?

ये सिर्फ टेक्नोलॉजी की कहानी नहीं है. ये कहानी अर्थव्यवस्था की है. अगर अमीर देश AI का पूरा फायदा उठा लेते हैं तो उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी. उनकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी. उनके लोग ज्यादा कमाएंगे और बाकी देश पीछे रह जाएंगे. इसलिए नहीं कि उन्होंने कोशिश नहीं की,बल्कि इसलिए कि उन्होंने देर से शुरुआत की.

सीधे शब्दों में कहा जाए तो आज का डिजिटल डिवाइड कल का इनकम डिवाइड बन सकता है.

साउथ कोरिया से सबक

साउथ कोरिया में सिर्फ छह महीने में AI इस्तेमाल 26% से बढ़कर 31% पहुंच गया. इसकी वजह सरकार का इस पर जोर था. यहां बेहतर AI टूल्स लोगों ने तेजी से अपनाया. 

देखा जाए तो भारत AI की दौड़ से बाहर नहीं है. इसे 15.7% अपनाने का आंकड़ा तो यही बताता है. करोड़ों भारतीय पहले से AI इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन आंकड़े ये भी कहते हैं कि अमीर देश तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. अंतर बढ़ता जा रहा है और ये रफ्तार पकड़ने का मौका हमेशा नहीं रहेगा. भारत मोबाइल इंटरनेट में तेज़ चला.डिजिटल पेमेंट में भी तेज चला. अब सवाल ये है कि क्या भारत AI में भी उतनी ही रफ्तार दिखा पाएगा? घड़ी चल रही है.

(मेथडोलॉजी (तरीका): ये आंकड़े माइक्रोसॉफ्ट आई फॉर गुड लैब से लिए गए हैं. इस अध्ययन में 147 देशों में चैट जीपीटी, क्लाउड, जेमिनी और डीप सीक जैसे AI चैटबॉट्स के इस्तेमाल को ट्रैक किया गया. इसमें डिवाइस यूसेज, इंटरनेट की पहुंच और अलग-अलग प्लेटफॉर्म के मार्केट शेयर को ध्यान में रखते हुए हर देश में AI अपनाने का अनुमान लगाया गया. ये तरीका पूरी तरह परफेक्ट नहीं है, लेकिन फिलहाल देशों के बीच तुलना के लिए यही सबसे भरोसेमंद डेटा माना जा रहा है. यहां कामकाजी उम्र से मतलब 15 से 64 साल के लोगों से है. GDP के आंकड़े विश्व बैंक के 2024 के डेटा पर आधारित हैं. )

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement