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दुनिया की 25% जीडीपी, ट्रंप की दादागीरी को सीधा चैलेंज... भारत-EU समझौता यूं ही नहीं कहलाया 'मदर ऑफ ऑल डील्स'

भारत और 27 देशों के ब्लॉक यूरोपियन यूनियन ने 2007 में शुरू हुई एक ट्रेड डील को आखिरकार पूरा कर लिया है. अंतर्राष्ट्रीय हलकों में इस समझौते का 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहा जा रहा है. भारत-EU का ये डील न सिर्फ आंकड़ों में एक भारी भरकम समझौता है बल्कि भारत की स्वतंत्र विदेश और व्यापार नीति की उदघोषणा भी है. इसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ पैंतरे का माकूल जवाब भी कहा जा रहा है.

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इस ट्रेड डील की वजह से 93 फीसदी इंडियन शिपमेंट को EU में ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा. (Photo: ITG)
इस ट्रेड डील की वजह से 93 फीसदी इंडियन शिपमेंट को EU में ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा. (Photo: ITG)

भारत की 1.4 अरब आबादी और यूरोपीय संघ के 45 करोड़. कुल मिलाकर दुनिया के 2 अरब लोग. दुनिया की जीडीपी का 25 प्रतिशत हिंसा. विश्व में होने वाले व्यापार का एक तिहाई हिस्सा. ये आंकड़े सिर्फ संख्याएं नहीं है, बल्कि ये आत्मविश्वास से लबरेज भारत और यूरोप की बुलंद आवाज है. भारत और यूरोप के बीच 18 साल तक चले जद्दोजहद, व्यापार की जटिल वार्ताएं, दुनिया के बनते बिगड़ते समीकरण, किसानों की चिंताएं और छोटे उद्योगों का डर, सब कुछ पार कर भारत और यूरोपियन यूरोपियन ने आखिरकार 'मदर ऑफ ऑल डील्स' पर हस्ताक्षर कर ही दिया. यह कोई साधारण व्यापार समझौता नहीं है. यह दुनिया के आर्थिक नक्शे पर एक नया सितारा उभरने की घोषणा थी.

आइए पहले समझते हैं कि इंटरनेशनल ट्रेड की भाषा में ट्रेड डील, या फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) क्या होता है

ट्रेड डील दो या अधिक देशों के बीच कानूनी समझौता होता है, जो आयात शुल्क कम करने या हटाने, बाजार तक पहुंच बढ़ाने और व्यापार नियम तय करने के लिए किया जाता है. ट्रेड डील या फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) देशों के बीच व्यापार बाधाओं को कम करता है, जैसे टैरिफ घटाकर निर्यात-आयात आसान बनाना. इससे दोनों पक्षों को आर्थिक लाभ मिलता है, दोनों पक्षों को एक दूसरे के तकनीक का लाभ मिलता है. लेकिन संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा भी होती है. यूरोपियन यूनियन में इस वक्त 27 देश शामिल हैं.

साथ आईं दुनिया की दो दिग्गज अर्थव्यवस्थाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस डील के पूरे होने पर कहा कि दुनिया की दूसरी और चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच यह ऐतिहासिक डील अभूतपूर्व अवसर पैदा करने और विकास के साथ-साथ सहयोग के नए रास्ते खोलने का वादा करती है. इस डील से पूरे ग्लोबल समुदाय को फायदा होगा.

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यह प्रमुख सेक्टरों में अच्छी क्वालिटी की नौकरियां पैदा करने, हमारे युवाओं, प्रोफेशनल टैलेंट, छात्रों और रिसर्चर्स के लिए आगे बढ़ने के और मौके देने और डिजिटल युग की क्षमता को अनलॉक करने में मदद करेगी. सबसे जरूरी बात यह है कि यह इनोवेशन को बढ़ावा देगी और आपसी विकास के लिए आर्थिक संबंधों को मज़बूत करेगी.

93 फीसदी इंडियन शिपमेंट को EU में ड्यूटी-फ्री एक्सेस

कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने कहा कि उम्मीद है कि 2026 के अंदर तक इस डील को पूरी तरह से लागू कर दिया जाएगा. एक बार लागू होने के बाद, 93 प्रतिशत भारतीय शिपमेंट को यूरोपियन यूनियन में ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा, जबकि वहां से लग्जरी कारों और वाइन का इंपोर्ट भारत में सस्ता हो जाएगा. 

यह भी पढ़ें: 'ग्लोबल ऑर्डर में बड़ी उथल पुथल...', डील इंडिया-EU की हुई, लेकिन बड़ा मैसेज ट्रंप के लिए है!

उन्होंने कहा कि यह समझौता दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, भारत और दूसरे सबसे बड़े आर्थिक समूह, EU में लगभग 2 अरब लोगों का बाज़ार बनाएगा. उन्होंने कहा, "कुल मिलाकर भारत और EU मिलकर ग्लोबल GDP का 25 प्रतिशत और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार (लगभग USD 33 ट्रिलियन) का एक-तिहाई (लगभग USD 11 ट्रिलियन) हिस्सा हैं."

ट्रंप की ट्रेड दादागीरी को मैसेज देते हुए भारत के कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने कहा कि यूरोपियन यूनियन और भारत ने संवेदनशील मुद्दों को किनारे रखकर एक "संतुलित, न्यायसंगत और निष्पक्ष" फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किया है, जो भारत और यूरोपियन यूनियन दोनों में इंडस्ट्री के सभी सेक्टर्स के लिए फायदेमंद है. गोयल ने कहा कि इससे निवेश के कई मौके खुलेंगे. 

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बता दें कि भारत और अमेरिका के बीच का ट्रेड डील लगभग 8-9 महीनों से पेंडिंग है. ट्रंप भारत पर ट्रेड डील के लिए दबाव बनाने के लिए टैरिफ का  इस्तेमाल हथियार की तरह कर रहे हैं. 

सामान के मामले में EU भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर

एक ब्लॉक के तौर पर EU सामान के मामले में भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है. फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में EU के साथ भारत का कुल सामान का ट्रेड लगभग 136 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जिसमें एक्सपोर्ट लगभग 76 बिलियन अमेरिकी डॉलर और इंपोर्ट 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर था. 

EU का बाजार भारत के कुल एक्सपोर्ट का लगभग 17 प्रतिशत है, और इस ब्लॉक का भारत को एक्सपोर्ट उसके कुल विदेशी शिपमेंट का 9 प्रतिशत है. 

2023-24 में, भारत ने EU को 76 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सामान और 30 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सेवाएं एक्सपोर्ट कीं, जबकि EU ने भारत को 61.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सामान और 23 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सेवाएं एक्सपोर्ट कीं.

EU के अंदर, स्पेन, जर्मनी, बेल्जियम, पोलैंड और नीदरलैंड भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए मुख्य डेस्टिनेशन हैं.

व्यापारिक साझेदारी और रणनीतिक चाल

भारत-यूरोपियन यूनियन के बीच ये समझौता व्यापारिक समझौता तो है ही, ये जियोपॉलिटिक्स भी है. अमेरिका के लगातार ताने सह रहा यूरोप नए और भरोसेमंद मार्केट की तलाश कर रहा है. भारत इस समीकरण में सटीक बैठता है. भारत खुद को यूरोप में खुले मार्केट के तौर पर बेचने की कोशिश कर रहा है, जबकि अमेरिका टैरिफ लगाने में ज़्यादा दिलचस्पी दिखा रहा है. भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए खासकर अपैरल और फुटवियर जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स बहुत मायने रखती है. 

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ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी को जवाब

गौरतलब है कि भारत और यूरोपियन यूनियन 18 साल की लंबी और ठिठक ठिठक कर चल रही बातचीत के बाद इस व्यापार समझौते पर पहुंचे हैं. इस ट्रेड डील की टाइमिंग बहुत अहम है. 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ की धमकियों से सहयोगी देश परेशान हो गए हैं. यूरोप अमेरिका के बाजार से परे दूसरे विकल्प चाहता है और चीन से जुड़ी सप्लाई चेन में कम रुकावटें चाहता है. भारत जो अमेरिका के कड़े टैरिफ का सामना कर रहा है, उसके पास भी अपने व्यापार को फैलाने और कम संरक्षणवादी बनने का अपना कारण है. 

इस समझौते का मुख्य मुद्दा टैरिफ है. भारत यूरोप से आयात होने वाली कई चीज़ों - कार, शराब मशीनरी, केमिकल, दवाएं, स्टील और लोहा पर ड्यूटी कम कर रहा है, जबकि कुछ संवेदनशील सेक्टर को इससे बाहर रखेगा. इसके बदले में यूरोप भारतीय सामानों के लिए ज़्यादा जगह खोलने वाला है, जिसमें लेबर-इंटेंसिव एक्सपोर्ट भी शामिल हैं, जिन पर दूसरे देशों में टैरिफ बढ़ने पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है.   

बता दें कि इस समझौते की वजह से यूरोपियन यूनियन से ढाई लाख कारें हर साल भारत के बाजार में प्रवेश करेंगी. इन कारों पर ड्यूटी 110 प्रतिशत से घटकर 10 फीसदी हो जाएगा. 

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2007 में शुरू हुई वार्ता

भारत-यूरोपीय संघ FTA बातचीत 2007 में शुरू हुई थी. शुरू में 2007 से 2013 तक, बातचीत के कई दौर हुए लेकिन मार्केट एक्सेस, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स, लेबर स्टैंडर्ड और सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर असहमति के कारण इसमें रुकावट आईं. 

2013 तक बातचीत रुक गई. खासकर ऑटोमोबाइल, वाइन, स्पिरिट, भारतीय IT फर्मों के लिए डेटा सिक्योरिटी और पब्लिक प्रोक्योरमेंट पर टैरिफ को लेकर मतभेदों के कारण. 

2016 और 2020 के बीच बातचीत को फिर से शुरू करने की कोशिशों के बावजूद कोई खास प्रगति नहीं हुई. हालांकि 2020 के बाद भारत और यूरोपीय संघ दोनों ने बातचीत फिर से शुरू करने में नई दिलचस्पी दिखाई. 

जून 2022 में एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, एक इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन एग्रीमेंट और ज्योग्राफिकल इंडिकेशंस (GI) पर एक एग्रीमेंट के लिए बातचीत फिर से शुरू की गई. इसके बाद 2026 में ये बातचीत मुकम्मल हो सकी.

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