
26 सितंबर, 1923 को जन्मे अभिनेता देव आनंद आज जीवित होते तो 97 वर्ष के होते. डैशिंग, रोमांटिक, एवरग्रीन. बॉलीवुड में सबसे लंबी एक्टिव पारी खेलने वाले इस लीजेंड का राजनीति से लगाव आम दिलचस्पी से कहीं ज्यादा था.
वे मुखर भी हो सकते थे. 1962 में 39 साल के देव ने जवाहर लाल नेहरू से सवाल किया था- “क्या यह सच है सर, आपकी तबाही वाली मुस्कान ने लेडी माउंटबेटन का दिल चुरा लिया था?”
देव आनंद की खुद की मुस्कान भी ऐसी थी जो लाखों दिलों में जोश भर देती थी. लेकिन जब उन्हें कोई उकसाता तो उनके चेहरे पर सख्त भाव भी आते थे. आपातकाल के दौरान ऐसा ही एक मौका आया. उन्हें संजय गांधी और युवा कांग्रेस की तारीफ में कुछ कहने के लिए कहा गया. देव आनंद ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उन्होंने इसकी वजह ‘जमीर की आवाज’ को बताया.
अभिनेता की फिल्मों को फिर टेलीविजन पर दिखाने पर रोक लगा दी गई. साथ ही ऑल इंडिया रेडियो पर उनके नाम के किसी भी संदर्भ पर भी मनाही थी.
जब 1977 के संसदीय चुनावों की घोषणा की गई, तो वकील राम जेठमलानी ने देव आनंद से इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के खिलाफ जनता पार्टी और उसके कैंपेन में शामिल होने का आग्रह किया. दुविधा में फंसे देव आनंद अपने निवास के पीछे बगीचे में चहलकदमी करते रहे. विचारों में खोए देव आखिरकार अपने बिस्तर पर गए. सुबह जब वे उठे तो अपना मन बना चुके थे.
जनता पार्टी के प्रयोग से मोहभंग
उन्होंने मोरारजी देसाई और जयप्रकाश नारायण के साथ मंच साझा करने के लिए सहमति जताई. इन दोनों के वे प्रशंसक थे. देव आनंद ने इंदिरा गांधी की आलोचना करते हुए एक छोटा भाषण भी दिया. हालांकि, जनता पार्टी के प्रयोग ने जल्द ही उनका मोहभंग कर दिया.
मोरारजी देसाई ने आंतरिक मतभेदों की वजह से जुलाई 1979 में इस्तीफा दे दिया. इसके कुछ हफ्ते बाद तक चली चरण सिंह सरकार से इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया. इससे 1980 के आम चुनाव का रास्ता साफ हुआ.
यही वो वक्त था जब देव आनंद ने ‘राजनेताओं को एक सबक’ सिखाने का फैसला किया. उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने का एलान किया. इस पार्टी का नाम रखा गया- नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया (NPI). देव आनंद ने एक ऐसी पार्टी की परिकल्पना की जिसमें देश के तेजस्वी व्यक्ति शामिल हों. उन्होंने अपने समर्थकों से कहा, "अगर एमजीआर तमिलनाडु में जादू बिखेर सकते हैं, तो मैं पूरे देश में क्यों नहीं?" उनके समर्थकों में जवाहरलाल नेहरू की बहन विजया लक्ष्मी पंडित भी शामिल थीं.
अभिनेता ने बाद में कहा, "हमने महसूस किया कि यह वक्त है जब बुद्धिमान, अच्छी तरह से सूचित (वेल इन्फॉर्म्ड), अच्छे बर्ताव वाले लोग संसद में भारतीय मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करें.”
इंदिरा ने भेजा था संदेश
मुंबई (तब बंबई) के ऐतिहासिक मैदान शिवाजी पार्क में एक रैली आयोजित की गई. देव आनंद के मतानुसार रैली को मिले भारी समर्थन ने इंदिरा गांधी को उनके पास संदेश भेजने के लिए मजबूर किया. संदेश ये था कि क्या देव आनंद उनके साथ हाथ मिलाना पसंद करेंगे. देव आनंद ने उस पेशकश को झिटक दिया. ये कहते हुए-"एक तानाशाह के साथ हाथ मिलाने का कोई सवाल ही नहीं उठता."
1980 के आम चुनाव की पूर्व संध्या पर देव आनंद बड़ा सपना देख रहे थे. विचार उनके दिमाग में घुमड़ रहे थे. देव आनंद ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखा, “प्राचीन सभ्यता को आधुनिक भारत के साथ जोड़ने के लिए आगे की तरफ एक लंबी छलांग की आवश्यकता है. क्या होगा अगर सभी गांव बिजली से चमकते हुए साफ-सुथरे छोटे शहरों में बदल जाएं और पानी की सुविधाओं के साथ आह्लादित हों... क्या होगा अगर सभी को अंग्रेजी सिखाई जाए और किसान, मजदूर, कुली और सभ्रांत लोग सभी कारों में घूमें, मिलनसारिता की भावना में एक-दूसरे की तरफ हाथ लहराएं. यह एक विजनरी का आदर्शवादी नजरिया था...और मैं इसे पूरा होते देखना चाहता था अगर मैं राजनीति में शामिल होता.”
देव आनंद की ऑटोबायोग्राफी को 26 सितंबर, 2007 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने जारी किया. संयोग से उस दिन अभिनेता 84वां जन्मदिन और डॉ सिंह का 75 वां जन्मदिन था.

कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी उस कार्यक्रम में उपस्थित थीं. वहां देव आनंद ने डॉ सिंह के साथ सोनिया की भी प्रशंसा की. देव आनंद ने तब दोनों के लिए कहा, "देश को आसमान की ऊंचाई की ओर ले जाने की उनकी क्षमता जिससे कि ये बाकी दुनिया के लिए ईर्ष्या का विषय बन जाए.”
देव आनंद के अध्यक्ष रहते नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया को कुछ ही महीनों में दुकान बंद करनी पड़ी. पहले नानी पालकीवाला और फिर विजया लक्ष्मी पंडित ने लोकसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया. प्रसिद्ध न्यायविद और अर्थशास्त्री पालकीवाला शिवाजी पार्क रैली में देव आनंद के साथ मंच पर उपस्थित रहे थे. बताया जाता है कि पालकीवाला ने देव आनंद को कथित संदेश भेजा था, जिसमें कहा गया कि वह राज्यसभा में शामिल होने के विचार के लिए खुले हैं, लेकिन निचले सदन में एक सीट के लिए चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं.
साथ छोड़ते चले गए साथी
देव आनंद ने अपना पार्टी घोषणापत्र तैयार किया, लेकिन बाद में पता चला कि उनके पार्टी सहयोगियों ने अभिनेता के कुछ अतिवादी सुझावों को संशोधित किया था. इसके अलावा, फंडिंग का भी अता-पता नहीं था, जिसका कि कुछ संपन्न व्यक्तियों ने उनसे वादा किया था. यहां तक कि 500 से अधिक लोकसभा सीटों के लिए उम्मीदवार ढूंढना भी भागीरथ कार्य साबित हुआ.
देव आनंद के खुद के शब्दों में, "शुरू में जो लोग काफी जोश दिखा रहे थे, उनमें काहिली दिखाई देने लगी... इसने मेरे उत्साह को भी ठंडा कर दिया... और यह नेशनल पार्टी का अंत था... यह एक महान विचार था जिसने शुरुआत में ही दम तोड़ दिया.”

भोपाल के एक पत्रकार और फिल्म इतिहासकार राजकुमार केसवानी के मुताबिक, देव आनंद की अगुवाई वाली पार्टी एक सोची-समझी फ्लॉप थी. केसवानी ने अप्रैल 2014 में आउटलुक पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख, “वन रील फॉर पॉलिटिक्स” में स्पष्टता के साथ इस बारे में लिखा है, “यह भारत के राजनीतिक इतिहास में एक अजीब लेकिन असल घटना थी. देव और उनके सहयोगियों ने जोश में अपनी पार्टी को देश के भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ एक 'धर्मयुद्ध' बताया. और ये धर्मयुद्ध लड़ने वाले और नहीं बल्कि हमारे अपने फिल्म जगत के लोग थे जो राजनेताओं को 'सबक सिखाना' चाहते थे. जिन्हें लगता था कि राजनेता लालची मूर्खों का झुंड हैं, हर वक्त अपना फायदा देखने वालों की भीड़ हैं.”
केसवानी 14 सितंबर, 1979 को बंबई के ताज में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में मौजूद रहे थे. उसी स्थान पर जहां देव आनंद ने नेशनल पार्टी आफ इंडिया को लॉन्च किया था और अपना घोषणा पत्र जारी किया था. केसवानी ने वहां कई फिल्मी हस्तियों को देखा था जिनमें व्ही शांताराम, रामानंद सागर, जीपी सिप्पी, श्रीराम बोहरा, आत्मा राम, आईएस जौहर के अलावा हेमा मालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा और संजीव कुमार जैसे कई सितारे भी देव आनंद की पार्टी को समर्थन देने के लिए वहां मौजूद थे.
केसवानी ने लेख में लिखा, "देव आनंद और उनके सहयोगियों ने कुछ टीमें बनाईं, उनमें देव के भाई विजय आनंद भी शामिल थे. ये टीमें पार्टी के संविधान का मसौदा तैयार करने, सदस्यता अभियान शुरू करने और चुनाव के लिए घोषणापत्र बनाने के लिए थीं."
देव आनंद उस वक्त खुद उम्मीद और भरोसे से लबरेज थे. अभिनेता ने उस वक्त की अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अपनी ऑटोबायोग्राफी में इन शब्दों का इस्तेमाल किया-"क्यों नहीं, एक बदलाव के लिए, और हम जिस देश से प्यार करते हैं, उसके लिए एक राजनीतिक पार्टी बनाते हैं, जो चीजों के बदसूरत गंदे आकार को बदल दे, इसकी जगह वो उसे किसी ग्रैंड फिल्म की तरह शानदार और चमकदार रूप दे?"
सदस्यता तब कोई समस्या नहीं थी. केसवानी का कहना है कि सदस्यता अभियान ने पूरे देश में एक सकारात्मक प्रतिक्रिया पैदा की. उन्होंने कहा “सभी ने सोचा कि वे सदस्यता शुल्क के रूप में एक रुपया देकर सितारों की कंपनी में होंगे. पार्टी के घोषणापत्र को जारी करते हुए, देव, हर इंच में एंग्री यंग मैन की मुद्रा में थे. उन्होंने मीडिया से कहा था कि वे एक धर्मयुद्ध शुरू करने जा रहे हैं... गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध... खुशहाल और तरक्कीपसंद समाज को बढ़ावा देने के लिए एक पार्टी.”
देव आनंद का वो भाषण देखा जाए तो उसमें कुछ अंशों में आज के परिदृश्य के नरेंद्र मोदी और कुछ अंशों में अरविंद केजरीवाल की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती थी. लेकिन तब मीडिया ने इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया. इसे सिर्फ एक और फिल्म प्रमोशन के रूप में खारिज कर दिया गया.
(ये लेखक के अपने विचार हैं. पत्रकार रशीद किदवई ‘24 अकबर रोड’ और ‘सोनिया: ए बायोग्राफी’ के लेखक हैं.)