दिल्ली लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन मशहूर सेक्स एजुकेटर और लेखिका सीमा आनंद ने अपनी नई किताब 'स्पीक ईजी' (Speak Easy) पर खुलकर बात की. इस दौरान उन्होंने आज के दौर में बढ़ती ऑनलाइन नफरत और सोशल मीडिया की चुनौतियों पर चर्चा की.
खुद झेली ट्रोलिंग, लेना पड़ा ब्रेक
सीमा आनंद ने अपना निजी अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्हें सेक्स पर खुलकर बात करने के ऑनलाइन ट्रोलिंग और धमकियों का सामना करना पड़ा. उन्होंने कहा कि स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि उन्हें कुछ समय के लिए सोशल मीडिया से दूरी बनानी पड़ी. उनके अनुसार, आज के समय में ट्रोलिंग एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है, जिससे हर उम्र और पेशे के लोग जूझ रहे हैं.
बच्चों को सिखाना होगा 'डिजिटल बचाव'
सीमा आनंद ने इस बात पर जोर दिया कि अब स्कूल और कॉलेज के छात्रों को डिजिटल साक्षरता सिखाना बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि छात्रों को सिखाया जाना चाहिए कि ऑनलाइन बदतमीजी या बुलीइंग का सामना कैसे करें. उन्होंने कहा कि नफरत भरे कमेंट्स का जवाब रचनात्मक तरीके से देना सीखना होगा. डिजिटल दुनिया में मानसिक रूप से मजबूत रहना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.
क्यों लिखी यह किताब?
सीमा आनंद ने बताया कि सोशल मीडिया की 60 सेकंड की रील्स (Reels) किसी मुद्दे पर चर्चा तो शुरू कर सकती हैं, लेकिन उनमें गहराई नहीं होती. लोग अक्सर पूरी बात समझे बिना ही रिएक्ट कर देते हैं. इसी कमी को दूर करने के लिए उन्होंने 'स्पीक ईजी' लिखी है, ताकि गंभीर विषयों पर विस्तार से और सही संदर्भ में बात की जा सके.
भारतीय बौद्धिक परंपरा में आनंद का स्थान
सीमा आनंद ने कहा कि समाज अक्सर “अच्छी महिला” को चुप और आज्ञाकारी मानता है. उनके अनुसार कहानियां महिलाओं की जिम्मेदारियां तय करती हैं, लेकिन उनके शरीर पर अधिकार और व्यक्तिगत इच्छा की बात कम करती हैं. उन्होंने बताया कि मातृत्व के शुरुआती दौर में उन्होंने महसूस किया कि महिलाओं के आनंद और आत्मनिर्णय की कहानियां मुख्यधारा में लगभग गायब हैं. इसी सवाल ने उन्हें कामसूत्र जैसे ग्रंथों को दार्शनिक और साहित्यिक नजरिये से दोबारा पढ़ने के लिए प्रेरित किया.
शास्त्रों और साहित्य में रूपक की परंपरा
सीमा आनंद ने कहा कि शुरुआत में कामसूत्र पढ़कर उन्हें ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर उन्हें शास्त्रों में रूपकों की समृद्ध परंपरा दिखाई दी. उनके अनुसार संस्कृत साहित्य में दो हजार साल से इन रूपकों का इस्तेमाल होता रहा है. कालिदास से लेकर भानुदत्त तक कई लेखकों ने इस संवेदनशील भाषा का उपयोग किया. छठी से आठवीं सदी के प्रेम आख्यानों में भी यह झलकता है, जिससे पता चलता है कि उस समय आनंद को बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन का आधार माना जाता था. उन्होंने मुस्कराते हुए खुद को “पैट्रन सेंट ऑफ प्लेजर” भी कहा.