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ED का बड़ा खुलासा... ₹12,000 करोड़ के नेटवर्क बेनकाब, क्रिप्टो और म्यूल अकाउंट से हो रही थी मनी लॉन्ड्रिंग

ईडी के संयुक्त निदेशक रॉबिन गुप्ता ने मंगलवार को सीबीआई और इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) द्वारा आयोजित ‘साइबर सक्षम धोखाधड़ी से निपटने’ पर राष्ट्रीय सम्मेलन में यह जानकारी दी.

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प्रवर्तन निदेशालय के संयुक्त निदेशक, रॉबिन गुप्ता. (Photo: ITG)
प्रवर्तन निदेशालय के संयुक्त निदेशक, रॉबिन गुप्ता. (Photo: ITG)

साइबर अपराध के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने हजारों करोड़ रुपये की साइबर ठगी से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का खुलासा किया है. ईडी के संयुक्त निदेशक रॉबिन गुप्ता ने मंगलवार को सीबीआई और इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) द्वारा आयोजित ‘साइबर सक्षम धोखाधड़ी से निपटने’ पर राष्ट्रीय सम्मेलन में यह जानकारी दी.

रॉबिन गुप्ता ने बताया कि ईडी की जांच में साइबर ठगी को एक संगठित कॉरपोरेट अपराध की तरह संचालित होते पाया गया है, जिसमें सिम सप्लायर, म्यूल अकाउंट ऑपरेटर, मानव तस्कर और क्रिप्टो हैंडलर अलग-अलग इकाइयों के रूप में काम करते हैं. ईडी अब तक साइबर अपराध से जुड़े कुल ₹12,229 करोड़ की अवैध कमाई को जब्त कर चुकी है.

जांच के दौरान एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर निवेश घोटाले का भी खुलासा हुआ है, जिसे थाईलैंड-लाओस-म्यांमार सीमा के गोल्डन ट्रायंगल क्षेत्र में स्थित स्कैम सेंटरों से संचालित किया जा रहा था. इस मामले में देशभर में दर्ज कई एफआईआर के आधार पर जांच की गई और आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया. आरोपी फर्जी आईपीओ और स्टॉक मार्केट निवेश ऐप के जरिए लोगों को मोटे मुनाफे का लालच देकर ठगी करते थे. इस तरह की ठगी को वैश्विक स्तर पर ‘पिग-बचेरिंग स्कैम’ कहा जाता है. जांच में यह भी सामने आया कि भारतीय युवाओं की तस्करी कर उन्हें इन स्कैम सेंटरों में जबरन साइबर ठगी में लगाया जाता था.

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ईडी के मुताबिक, मनी लॉन्ड्रिंग तीन चरणों में की जाती थी. पहले चरण में ठगी की रकम म्यूल अकाउंट या शेल कंपनियों में जमा की जाती थी. करीब ₹159 करोड़ ऐसे खातों से गुजरने का पता चला है. दूसरे चरण में रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर सैकड़ों खातों में ट्रांसफर किया जाता था ताकि जांच एजेंसियों की नजर से बचा जा सके. उदाहरण के तौर पर ₹9 करोड़ की रकम 200 से ज्यादा खातों में और ₹7 करोड़ 91 खातों में भेजी गई. तीसरे चरण में इस रकम को बाइनेंस जैसे पीयर-टू-पीयर प्लेटफॉर्म पर क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर विदेश भेज दिया जाता था.

जांच एजेंसियों ने 1,000 से ज्यादा म्यूल अकाउंट और शेल कंपनियों की पहचान की है और इनसे जुड़े ₹2.81 करोड़ फ्रीज किए हैं. ईडी के अनुसार, ऐसे खाते अक्सर टेलीग्राम चैनलों के जरिए खरीदे जाते हैं या फिर छात्रों, गरीब लोगों और बंद पड़ी कंपनियों के खातों का इस्तेमाल किया जाता है.

ईडी ने अपनी बड़ी कामयाबियों का भी जिक्र किया. बिटकनेक्ट क्रिप्टो पोंजी घोटाले में ₹2,057 करोड़ की क्रिप्टो संपत्ति जब्त कर एजेंसी के कोल्ड वॉलेट में ट्रांसफर की गई. वहीं ऑक्टा एफएक्स फॉरेक्स ट्रेडिंग घोटाले में ₹2,385 करोड़ की क्रिप्टो संपत्ति और 21 विदेशी संपत्तियों को अटैच किया गया. इस जांच को 2025 का ‘बेस्ट एगमोंट केस अवॉर्ड’ भी मिला.

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हालांकि जांच के दौरान कई चुनौतियां भी सामने आईं, जिनमें अलग-अलग बैंकों में फैले खातों की भारी संख्या, डेटा के अलग-अलग फॉर्मेट, केवाईसी जानकारी मिलने में देरी और तेज गति से होने वाले ट्रांजेक्शन शामिल हैं. इन चुनौतियों से निपटने के लिए ईडी आईआईटी कानपुर द्वारा विकसित क्रिप्टो विश्लेषण प्लेटफॉर्म और रियल टाइम डेटा समन्वय जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रही है.

रॉबिन गुप्ता ने म्यूल अकाउंट पहचानने के कुछ संकेत भी बताए, जिनमें अचानक निष्क्रिय खातों में बड़ी रकम आना, तुरंत निकासी, मोबाइल नंबर या ईमेल में बदलाव, एक ही आईपी से कई खातों का संचालन और ओटीपी फॉरवर्डिंग ऐप का इस्तेमाल शामिल है.

सम्मेलन में गृह मंत्री अमित शाह ने भी संबोधित करते हुए कहा कि साइबर अपराध रोकने के लिए कई सरकारी एजेंसियां मिलकर काम कर रही हैं. उन्होंने बताया कि I4C, राज्य पुलिस, सीबीआई, एनआईए, ईडी, दूरसंचार विभाग, बैंकिंग सेक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय, रिजर्व बैंक और न्यायपालिका मिलकर साइबर अपराध पर लगाम लगाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. हर संस्था की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है और सभी एजेंसियों के बीच समन्वय ही साइबर अपराध पर प्रभावी नियंत्रण का रास्ता है.

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