दिवाली पटाखों का त्यौहार है और मिलेनियल्स इसे मनाने के लिए कमर कस चुके हैं, वो भी तब जब पटाखों पर बैन है. यंग दिल्ली ने इंतजाम भी कर लिया है. कुछ ने NCR के शहरों से पटाखे खरीदकर भी जमा कर लिए हैं, जिससे दीवाली के दिन फोड़ा जा सके. दिल्ली में सभी तरह के पटाखों पर पूरी तरह से बैन है. दिवाली तो पटाखों का त्यौहार है लेकिन बैन की वजह से कई मिलेनियल वातावरण को लेकर क्रेजी भी हैं इसलिए ग्रीन पटाखों को खरीदकर रख लिया है, जिसे दीवाली पर छोड़ सकें.
केशवपुरम में रहने वाले छात्र निशांत शास्त्री का कहना है कि दिल्ली के मधुर भारद्वाज ने कहा कि इस बार ग्रीन दिवाली बनाएंगे, बजाय इसके कि हम बम या फिर पटाखे जलाएं. दिवाली बिना पटाखों की नहीं हो सकती इसलिए ग्रीन पटाखे खरीद कर रखे हैं और वही जलाएंगे. दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण की वजह से दीवाली शुरू होने से पहले ही पटाखों पर बैन होने की वजह से दीवाली का क्रेज भी कम भी होता जा रहा है.
ऋषभ सिसोदिया ने कहा कि यंग दिल्ली इस बार इकोफ्रेंडली दिवाली मनाएगी. पटाखों पर बंदी की वजह से वातावरण को ध्यान में रखते हुए दिवाली को सस्टेनेबल बनाएंगे.
'AQI में खतरनाक बढ़ोतरी...'
हाल के वर्षों में, खासकर दिवाली जैसे त्यौहारों के दौरान पटाखों पर प्रतिबंध, चर्चा का एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है, खासकर दिल्ली जैसे शहरी इलाके में. यह प्रतिबंध मुख्य रूप से त्यौहारों के मौसम में शहरों में होने वाले गंभीर वायु प्रदूषण को दूर करने के मकसद से लगाया गया है. पटाखों के जलने से वातावरण में काफी मात्रा में हानिकारक प्रदूषक निकलते हैं, जिससे वायु गुणवत्ता सूचकांक के स्तर में खतरनाक बढ़ोतरी होती है. स्टडी से पता चला है कि पटाखों से निकलने वाले कण और जहरीली गैसें लोगों में सांस संबंधी समस्याओं, हृदय संबंधी बीमारियों और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों जैसे कमजोर समूहों को प्रभावित करती हैं.
इसके अलावा, पटाखों का पर्यावरण पर प्रभाव वायु गुणवत्ता से कहीं आगे तक फैला हुआ है. त्योहारों के दौरान उत्पन्न होने वाला ध्वनि प्रदूषण वन्यजीवों को परेशान कर सकता है और निवासियों के दैनिक जीवन को बाधित कर सकता है. कई पालतू और जंगली जानवर पटाखों से जुड़ी तेज आवाजों की वजह से तनाव और चिंता का अनुभव करते हैं. यह प्रतिबंध ज्यादा टिकाऊ और शांतिपूर्ण वातावरण बनाने की दिशा में एक कदम है, जो लोगों को ऐसे तरीकों से जश्न मनाने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो स्वास्थ्य और प्रकृति दोनों के लिए कम हानिकारक हों.
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पटाखे फोड़ने की परंपरा सांस्कृतिक समारोहों में गहराई से निहित है, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा की जरूरत ने अधिकारियों को प्रतिबंध लागू करने के लिए प्रेरित किया है. इस कदम का मकसद न केवल प्रदूषण और उसके प्रतिकूल प्रभावों को कम करना है, बल्कि त्योहारों को मनाने के ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल और अभिनव तरीकों की ओर बदलाव को भी प्रोत्साहित करना है. उत्सव के वैकल्पिक रूपों को अपनाकर, समाज परंपराओं का सम्मान कर सकता है और साथ ही भविष्य की पीढ़ियों के लिए पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए कदम उठा सकता है.
अनिल ने कहा कि देश बहुत तेजी से बदल रहा है, सभी त्योहार अलग ही रूप लेते जा रहे हैं. पशु पक्षी जीव, जंतु एवं प्रकृति इस प्रदूषण से बहुत आहत होते हैं, दिवाली खुशियों का त्यौहार है, इस त्यौहार को बनाते हुए मै ध्यान रखूंगा कि दिवाली के नाम पर गंदगी न फैले इसे बंद करना चाहिए.
द्वारका की रहने वाली सविता ने कहा कि दिया बायो डिग्रेडेबल इसलिए दिया जलाएंगे और बिजली बचाएंगे. दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले निखिल ने बताया कि पटाखे नहीं जलाएंगे क्योंकि ये स्मोक और साउंड पैदा करते हैं, जबकि हम फूल पत्ती का इस्तेमाल करेंगे प्लास्टिक डेकोरेशन से दूर रहेंगे.