
दिल्ली के कई इलाकों में सरकारी पाइपलाइनों के जरिए सीवर मिला काला और जहरीला पानी घरों तक पहुंच रहा है. पश्चिमी दिल्ली की नामधारी कॉलोनी और पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार फेस-2 में हजारों लोग इस प्रदूषित पानी के कारण गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं. पिछले कई महीनों से नलों से बदबूदार और झाग वाला पानी आ रहा है, क्योंकि पुरानी पाइपलाइनों में सीवर का पानी मिल रहा है. दिल्ली जल बोर्ड के डॉक्यूमेंट्स और अक्टूबर से दिसंबर 2025 के आंकड़े भी द्वारका और नांगलोई जैसे इलाकों में पानी के दूषित होने की पुष्टि कर रहे हैं.
दिल्ली में दूषित पानी की समस्या के बीच इंडिया टुडे/आजतक की टीम ने रमेश नगर की नामधारी कॉलोनी और मयूर विहार फेज-2 का दौरा किया और जमीनी स्तर पर हालातों को समझने की कोशिश की, लेकिन सभी जगहों पर एक ही कहानी- गंदा पानी, बढ़ती बीमारियां और एक ऐसी व्यवस्था जो संकट की भयावहता को स्वीकार करने से इनकार करती है. वहीं, जब इस बारे में अधिकारियों से पूछा जाता है तो वह वही पुराना जवाब- काम चल रहा है या दिल्ली जल बोर्ड की रिपोर्ट लाओ.
पीने लायक नहीं है सप्लाई का पानी
नामधारी कॉलोनी के घरों में आने वाला पानी अब पीने के लायक बिल्कुल नहीं बचा है. यहां पानी का रंग पूरी तरह काला है और उस पर सफेद झाग तैरते रहते हैं. महिलाएं अपने घरों के बाहर गंदा पानी लेकर खड़ी हैं और प्रशासन से समाधान की गुहार लगा रही हैं. वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर रही हैं और प्रशासन को सबूत दे रही हैं. उनका कहना है कि बार-बार शिकायतें दर्ज कराई गई हैं, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है.

एक महिला ने बताया कि उन्हें साइनस की समस्या है, इसलिए वह हर सुबह दूसरों से पूछती हैं कि क्या पानी से बदबू आ रही है. एक अन्य महिला का कहना है कि इलाके में पेट में इन्फेक्शन की समस्या इतनी आम हो गई है कि लोगों को अब बीमार पड़ना सामान्य लगने लगा है.
खर्चा बना पानी खरीदना
हमारी टीम ने घरों के अंदर बोतल बंद पानी और सरकारी सप्लाई के पानी में जमीन-आसमान का अंतर साफ दिखता है. एक तरफ पारदर्शी पानी है तो दूसरी तरफ काला दूषित तरल था.
एक किडनी की मरीज ने बताया कि वह डर के कारण इस सरकारी पानी से नहाने तक से कतराती हैं और रोज पीने का पानी खरीदने को मजबूर हैं. कई मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए हर दिन पानी खरीदना एक ऐसा खर्च बन गया है, जिसे वे वहन नहीं कर सकते, लेकिन जिंदा रहने के लिए उन्हें ये मजबूरी झेलनी पड़ रही है. क्योंकि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है.
सरकारी डॉक्यूमेंट्स में भी खुलासा
हैरानी की बात ये है कि निवासियों के दावों को सरकारी आंकड़े ही सच साबित कर रहे हैं. इंडिया टुडे/आजतक को मिले डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, दिल्ली जल बोर्ड ने इस इलाके में पानी के दूषित होने की बात स्वीकार की है और उन पाइपलाइनों की पहचान की है, जिन्हें तत्काल मरम्मत की जरूरत है. अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच द्वारका और नांगलोई में लिए गए पानी के नमूने सबसे ज्यादा खराब पाए गए हैं. ये कोई बाहरी आरोप नहीं हैं, बल्कि जल बोर्ड के अपने डेटा हैं जो शहर के जल संकट की भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं.

NGT ने दिए थे सख्त निर्देश
दिल्ली में पहले भी ऐसी स्थिति आ चुकी है. पिछले साल जुलाई में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को बताया था कि जनकपुरी के ए-ब्लॉक से लिए गए छह नमूनों में से पांच में टोटल कोलीफॉर्म और ई. कोलाई की मौजूदगी पाई गई जो सीवेज और मल-मूत्र की मौजूदगी के स्पष्ट संकेत थे. ये स्थिति निवासियों के लिए सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने के एनजीटी के सख्त निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ और आज भी लोग वही जहरीला पानी पीने को विवश हैं.
40 साल पुरानी पाइपलाइनें
पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार फेस 2 में तो सरकारी सप्लाई के पानी पर से लोगों का भरोसा पूरी तरह उठ चुका है. यहां की पाइपलाइनें 40 साल से भी ज्यादा पुरानी हैं, जिन्हें कभी बदला ही नहीं गया.
निवासियों का कहना है कि यहां का पानी इतना गंदा और बदबूदार है कि उसे छूना भी असुरक्षित लगता है. कई लोग चालीस साल से अधिक पुरानी पाइपलाइनों की ओर इशारा करते हैं जिन्हें कभी बदला नहीं गया है.
निवासियों का कहना है कि पिछले पांच वर्षों में स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो गई है. लोग अपने घरों में सीवर का पानी घुसने के डर से मोटर चालू करने से भी हिचकिचाते हैं. इंदौर की घटना की याद ने इस डर को और बढ़ा दिया है, जहां दूषित पानी से कई लोगों की मौत हो गई थी.

स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस पानी को पीने के बाद लोग बीमार पड़ रहे हैं और कुछ को कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती कराना पड़ रहा है. एक निवासी का दावा है कि पानी में कीड़े पाए गए हैं. उनकी अपील बेहद ज़रूरी और भावुक है- दिल्ली में ऐसी ही त्रासदी होने से पहले तुरंत कार्रवाई करें.
क्या इंदौर जैसी त्रासदी का इंतजार है?
इलाके के लोगों के मन में इंदौर की उस त्रासदी की यादें ताजा हैं, जहां दूषित पानी के कारण मौतें हुई थीं. निवासियों का दावा है कि कभी-कभी सप्लाई के पानी में कीड़े तक निकलते हैं. यह संकट केवल बुनियादी ढांचे की विफलता नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की लापरवाही है जो समस्या जानकर भी चुप बैठा है.
ये संकट अब केवल बुनियादी ढांचे की छिटपुट विफलताओं का मामला नहीं है. ये एक ऐसी व्यवस्था का मामला है जो समस्या के अस्तित्व को जानती है, उसके प्रमाण के रूप में डेटा भी मौजूद है, फिर भी तत्काल कार्रवाई करने में विफल रहती है. ये विखंडित शासन, टूटे हुए समन्वय और त्रासदी घटित होने के बाद ही सामने आने वाली जवाबदेही को दिखाता है.
अब सवाल ये उठता है कि क्या दिल्ली लोगों की जान जाने से पहले कार्रवाई करेगी या जवाबदेही तय करने के लिए एक और त्रासदी की जरूरत होगी?